अखरोट का पेड़
अखरोट का पेड़
कश्मीर की पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में, एक पुराने अखरोट के पेड़ की घनी छांव के नीचे आठ साल की अस्मा और उसका बारह साल का बड़ा भाई फहीम बैठे थे। हवा स्थिर थी। आसमान धुएं और खामोशी के बोझ से झुका हुआ था। अपने घर के पीछे की पत्थर की दीवार पर बैठे, वे दूर तक जाती हुई सड़क को देख सकते थे—जहाँ केवल एक फौजी जीप खड़ी थी।
सुबह फिर से कर्फ्यू लग गया था। उनकी अम्मी ने उन्हें सख्त हिदायत दी थी कि घर के दरवाज़े से बाहर न जाना। लेकिन बगीचा तो उनका अपना था—महफूज़, जाना-पहचाना।
अस्मा ने अपने पैर लटकाए और ऊपर अखरोट के पेड़ की ओर देखा।
“भाई,” उसने कहा, “अखरोट कब गिरते हैं?”
फहीम, जो खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश कर रहा था, बोला, “शायद जब ऊपरवाला समझता है कि अब वक्त हो गया है।”
अस्मा थोड़ी देर चुप रही, फिर बोली, “तो फिर लोग वक्त से पहले क्यों गिर जाते हैं?”
फहीम ने नजरें फेर लीं।
पहाड़ी के उस पार से एक तेज़ धमाका हुआ।
अस्मा सहम गई। फहीम ने उसका कंधा थामा। “दूर है,” वह फुसफुसाया।
अस्मा की भौंहें सिकुड़ गईं। “ये लोग इतना क्यों लड़ते हैं? क्या इनके पास भी मां नहीं होती?”
फहीम की आँखें कुछ पल झपकीं। “शायद भूल गए हैं,” उसने धीरे से कहा।
अखरोट के पत्तों के बीच से सूरज की हल्की किरणें छन रही थीं। गाँव के कोने में खड़ी पुरानी लकड़ी की मस्जिद खामोश थी, उसकी अज़ान को पिछली रात ही सेना की लाउडस्पीकर ने दबा दिया था।
“क्या अब्बू आज घर आ जाएंगे?” अस्मा ने पूछा।
फहीम थोड़ा रुका। “कह रहे थे, कोशिश करेंगे।”
अस्मा ने धीरे से सिर हिलाया, अस्मा के अबू एक दुकानदार थे। कर्फ्यू की वजह से उन्हें अपनी दुकान कई महीनों तक बंद रखनी पड़ी। कई महीनों बाद उन्हें शॉल और ऊन सूट्स का एक ऑर्डर मिला, लेकिन इसके लिए उन्हें दूसरे शहर जाना पड़ा ताकि वो उन्हें बेच सकें। इसलिए वे अनंतनाग के लिए रवाना हुए, कुछ बिक्री की उम्मीद में। लेकिन वादी में तनाव और बढ़ गया और वहां जाकर वे बीमार पड़ गए,इस वजह से वे वहीं फँस गए। फ़हीम हर रोज़ अस्मा को दिलासा देता था कि अबू जल्द ही लौट आएंगे, और अस्मा उस पर खुशी-खुशी यक़ीन कर लेती थी। यह सुनकर उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति आ जाती थी, जो उसके बड़े भाई की बातों से मिलती थी।
“क्या गोलियों को पता होता है कि कौन अच्छा है और कौन बुरा?”
“नहीं,” फहीम बोला। “गोलियों की आंखें नहीं होतीं।”
अस्मा चुप हो गई, और एक कौवे को पेड़ पर उतरते हुए देखने लगी। फिर बोली, “जब मैं बड़ी हो जाऊंगी, तो दुनिया को धीरे बोलना सिखाऊंगी।”
फहीम हल्के से मुस्कराया। “और मैं बर्फ की दीवार बनाऊंगा, जिसे कोई गोली पार न कर सके।”
वो हँसी। “पर बर्फ तो पिघल जाती है।”
“तो फिर मैं हर जगह अखरोट के पेड़ लगाऊंगा। ये लंबे जीते हैं, और राज़ छुपा सकते हैं।”इस छोटी सी हँसी के साथ दोनों भाई-बहन बाग़ में खेलने लगे, वर्तमान को भूलकर। वे एक-दूसरे के पीछे दौड़ने लगे, फूलों की क्यारी में लगे सारे खूबसूरत फूलों को छूते हुए।
एक और गोली चली—इस बार पहले से पास। कहीं से एक पतली सी चीख सुनाई दी।
दोनों बच्चों ने पहाड़ की तरफ देखा।
अस्मा फुसफुसाई, “क्या उन्हें पता है कि हम बच्चे हैं?”
फहीम ने उसे बाँहों में ले लिया। “शायद अगर हम प्यार से थोड़ा ऊँचा बोलें, तो उन्हें याद आ जाए।” कौवा उड़ गया।
और उस अखरोट के पेड़ के नीचे, उनकी हँसी फिर ना लौटी, उस डर भरी वादी में एक झिलमिलाती सी रौशनी जैसी, इन दो छोटे बच्चों के चेहरों से छोटी-छोटी हँसियाँ गायब होती जा रही थीं।"
एक भयानक गोली की आवाज़ ने आसमान को चीर दिया — पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ और पास। धरती जैसे कांप उठी। अस्मा और फहीम झटके से पत्थर की दीवार से कूद पड़े।
“भागो!” फहीम चिल्लाया, उसका हाथ पकड़ते हुए और उसे आगे की ओर धक्का देते हुए। “घर की तरफ भागो!”
आवाज़ और तेज़ हो रही थी — और ज़्यादा ग़ुस्से वाली।
अस्मा की छोटी टांगें, जो अक्सर लड़खड़ाती थीं, इस बार हवा की तरह चलने लगीं। उसके भाई ने हमेशा कहा था, “जब आसमान ऐसे गरजे, तो चिनार के पत्तों की तरह उड़ जाना।” और वह वैसा ही कर रही थी।
इस बार, वह तेज़ थी। पहली बार उसने घर का लकड़ी का दरवाज़ा पहले छू लिया — हांफती हुई, गाल लाल, दिल डर और गर्व दोनों से धड़कता हुआ।
वह अंदर भागी, आँखों में एक अजीब सी जीत और चिंता की चमक। “अम्मी!” उसने आवाज़ लगाई, सांस उखड़ी हुई थी। “फहीम पीछे रह गया! मैं जीत गई इस बार! मैं उससे पहले पहुँच गई!”
उसकी अम्मी, जो चूल्हे के पास बैठी थी, ने केतली गिरा दी। उनका चेहरा जैसे जम गया, फिर पिघलता हुआ बिखर गया।
उन्होंने कुछ नहीं पूछा — बस भागीं।
अस्मा के पास से भागीं।
खुले दरवाज़े की तरफ भागीं।
उस सन्नाटे की तरफ भागीं, जो आखिरी धमाके के बाद छा गया था।
अस्मा जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई, हैरान और उलझन में। अब हवा भारी लग रही थी — जैसे भीगे हुए कम्बल में लिपटी हो। उसे अपने भाई के कदमों की आवाज़ नहीं सुनाई दी। लेकिन कुछ और सुनाई दे रहा था।
कराहें।
दूर से नहीं। पास से। उनके दरवाज़े से। उनकी अम्मी से।
अस्मा धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ी, उसके छोटे हाथ काँप रहे थे। गाँव, जो पहले ही अपनी आवाज़ खो चुका था, अब उस आवाज़ से भर गया था जिसे कोई कभी नहीं सुनना चाहता — एक माँ की टूटी हुई चीखें, जैसे काँच बिखरता हो।
अस्मा सब कुछ नहीं समझ पाई।
लेकिन वह ये समझ गई कि इस दौड़ में... इस दौड़ में... वो कभी नहीं जीतना चाहती थी।
