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Neha Yusuf

Abstract Drama

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Neha Yusuf

Abstract Drama

अल्लाह के बंदे

अल्लाह के बंदे

6 mins
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 फ़िज़ा जुमेरात की दोपहर को अपनी नमाज़ अदा कर रही थी. जुमेरात हफ़्ते का एक मुक़द्दस दिन होता है और ज़ोहर की नमाज़ हमेशा से ही ख़ास मानी जाती थी. उसने ख़ास ग़ुस्ल किया, जुमेरात के लिए नए कपड़े पहने. अपनी नमाज़ ख़त्म होने के क़रीब ही थी कि उसकी मलेशियाई फ़्लैटमेट सूर्या उसके सामने से गुज़र गई.

फ़िज़ा ग़ुस्से से लाल हो गई और जैसे ही उसने अपनी नमाज़ पूरी की, उसने अपनी दुआएँ भी नहीं माँगीं, बल्कि सूर्या पर बरस पड़ी, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे सामने से गुज़रने की जब मैं नमाज़ पढ़ रही थी, तुम्हें नहीं पता यह हराम है. तुमने मेरी नमाज़ ख़राब कर दी." सूर्या, फ़िज़ा को इतना ग़ुस्से में देखकर डर गई, उसने पूरे दिल से बार-बार माफ़ी माँगी.असल में, फ़िज़ा हमेशा से सूर्या को नीचा दिखाती थी, क्योंकि वह बहुत खुले कपड़े पहनती थी और पार्टियों में जाती थी.  उसके परिवार में औरतें हमेशा हिजाब पहनती थीं, और ऐसे कपड़े पहनना हमेशा ग़लत ही समझा जाता था. फ़िज़ा की नज़र में सूर्या कुछ ग़लत काम कर रही थी. कई बार जब वह परिवार से वीडियो कॉल पर होती, तो उनके आस-पास होने पर वीडियो से बचती थी. उसे डर लगता था कि कहीं परिवार वाले कुछ झलकें देख लें और फिर उसे तुरंत वह फ्लैट छोड़ने का निर्देश दें. वह कहाँ जाएगी, आख़िरकार इतनी मेहनत से उसे यह फ्लैट अपने बजट में मिला था, इसी वजह से वह घर ज़्यादा पैसे भेज पा रही थी. लेकिन कोई यह नहीं समझेगा, और उसे उनकी बात माननी ही पड़ती.

इसी हताशा और क्रोध में उसने आगे बढ़कर सूर्या से चिल्लाते हुए यहाँ तक कह दिया था कि "तुम जैसे लोगों को ख़ुदा या नमाज़ क्या होती है, पता ही नहीं." और उसके बाद वह काफ़ी देर तक बुदबुदाती रही कि ऐसे लोग कितने नापाक होते हैं और दूसरों की शांति भंग करते हैं.सूर्या चुपचाप सुनती रही और अपने कमरे में वापस चली गई. शाम होते-होते फ़िज़ा ठीक हो गई, उसने घर पर अपने परिवार वालों को फ़ोन किया और उनसे बात की. आज उसकी काम से छुट्टी थी. उसे दुबई में रहते हुए लगभग दो साल होने वाले थे, दुबई बहुत महंगा था और 3500 दिरहम की तनख्वाह में किराया, निजी खर्चे और घर पैसे भेजना बहुत मुश्किल था. फ़िज़ा ज़्यादातर ख़ुद में ही रहती थी, वह अपनी रूममेट अमीना से बस थोड़ा-बहुत ही बात करती थी. अमीना एक फार्मेसी में काम करती थी और फ़िज़ा कार रेंटल कंपनी में. वह सूर्या से तो मुश्किल से ही बात करती थी, जो उसी फ्लैट में अगले कमरे में रहती थी. तो उसे सूर्या के बारे में जानने का तो सवाल ही नहीं था, बस कभी-कभार हाय-हैलो हो जाती थी. आज जो कुछ हुआ, उसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी. अमीना ने फ़िज़ा से यह भी कहा कि उसने ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया दी थी, लेकिन फ़िज़ा न तो धीमे पड़ने के मूड में थी और न ही सूर्या को माफ़ करने के. उसे लगा कि वह अपने धर्म और संस्कृति का बचाव करने में पूरी तरह सही थी. एक नेक मज़हबी शख़्स भी ऐसा ही करेगाअगले कुछ दिनों तक फ़िज़ा का बर्ताव रूखा रहा और वह सूर्या के प्रति अपनी नाराज़गी साफ़ ज़ाहिर कर रही थी. ख़ासकर रसोई में काम करते समय, वह जानबूझकर ज़्यादातर जगह घेर लेती थी ताकि सूर्या को इंतज़ार करना पड़े. वह अपनी आँखों के कोने से देखती रहती थी कि सूर्या उसके काम ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही है ताकि वह अपना खाना बना सके.

 इस घटना के कुछ दिनों बाद, फ़िज़ा काम से लौट रही थी और बेहद थकी हुई थी. उसमें घर जाकर खाना बनाने की ज़रा भी हिम्मत नहीं थी, लेकिन वह सुपरमार्केट से कुछ भी खरीदने में झिझक रही थी, क्योंकि इससे उसका बजट बिगड़ जाता. इसलिए निराशा के साथ वह अपने कदम घसीटती हुई घर की ओर बढ़ी. वहाँ पहुँचकर उसने अपना कमरा खोला, अमीना अभी तक काम से नहीं लौटी थी. फ़िज़ा ने अपना बैग और दुपट्टा साइड टेबल पर रखा और बिना किसी ताक़त के बिस्तर पर गिर पड़ी. अचानक उसे अपने दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक सुनाई दी. पहले तो उसने इसे अनदेखा किया, सोचा शायद कोई ग़लतफ़हमी होगी. लेकिन फिर से ज़ोरदार दस्तक हुई. इस बार उसे बिस्तर से उठकर देखना पड़ा कि कौन है. जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसने सूर्या को अपने हाथ में एक बड़ा-सा पार्सल लिए खड़ा देखा. उसमें से जन्नत जैसी ख़ुशबू आ रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे उसमें ढेर सारा ग्रिल्ड और बारबेक्यू किया हुआ खाना हो. वह उत्साह से कमरे में दाखिल हुई और फ़िज़ा से रात के खाने में शामिल होने को कहा. वह शुक्रवार को हुई अपनी ग़लती के बाद फ़िज़ा के लिए कुछ करना चाहती थी, तो खाने से बेहतर और क्या हो सकता था. 

इससे पहले कि फ़िज़ा कुछ कह पाती, सूर्या ने बड़े सलीक़े से रात के खाने के लिए लाई गई डिशें बिछाईं और फ़र्श पर बैठ गई. फ़िज़ा को फ़ौरन एहसास हुआ कि उसे कम से कम कुछ तकिए तो रखने चाहिए ताकि ठंडी खुरदरी ज़मीन से बचा जा सके. जब फ़िज़ा अभी भी यह समझने की कोशिश कर रही थी कि अभी-अभी क्या हुआ है, तभी अमीना कमरे में दाखिल हुई. कमरे में पूरा बुफ़े देखकर वह इतनी हैरान हुई कि ख़ुशी से उछल पड़ी और बोली, "वाह, पार्टी चल रही है!" सूर्या पीछे मुड़ी और कहा, "हाँ, कृपया हमसे जुड़ें, यह फ़िज़ा से मेरी छोटी सी माफ़ी है." अमीना ख़ुशी-ख़ुशी शामिल हो गई. तीनों ने खाने, संस्कृति, फ़िल्मों और मेकअप के बारे में बातें साझा कीं. खाने के बाद फ़िज़ा ने सबके लिए सुलेमानी चाय बनाई. बचे हुए खाने को उन्होंने फ़्रिज में रख दिया और यह सब करते हुए वे बीच-बीच में मज़ाकिया चुटकुले सुनाती रहीं.

बिस्तर में घुसते हुए अमीना ने कहा, "सूर्या कितनी अच्छी है, उसका स्वभाव कितना ख़ुशमिज़ाज है." इस पर फ़िज़ा ने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया. उसे नहीं पता था कि वह दोषी महसूस कर रही थी या ख़ुद पर गुस्सा थी, क्योंकि आज वह भी अपनी ही नज़रों में छोटी हो गई थी.

 उस रात, फ़िज़ा ने अपनी नमाज़ के बाद दिल से महसूस किया कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत और बाहरी दिखावे का नाम नहीं है, बल्कि यह विनम्रता, दया और दूसरों के प्रति सम्मान सिखाता है. सूर्या की बेग़र्ज़ दयालुता और माफ़ी ने फ़िज़ा की आँखों पर पड़ा परदा हटा दिया था. उसने समझा कि किसी को उसके पहनावे या जीवनशैली से आंकना, उसके धर्म की शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है. अगले कुछ दिनों में, फ़िज़ा ने धीरे-धीरे सूर्या के प्रति अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया. अब वह उससे बात करने में हिचकिचाती नहीं थी, और न ही रसोई में जानबूझकर उसे परेशान करती थी. छोटी-छोटी मुलाक़ातें बातचीत में बदल गईं, और तीनों लड़कियाँ - फ़िज़ा, अमीना और सूर्या - धीरे-धीरे एक-दूसरे को बेहतर समझने लगीं. खाने, फ़िल्मों और जीवन के संघर्षों को साझा करते हुए, उनकी दोस्ती मज़बूत होती गई.

फ़िज़ा को एहसास हुआ कि दुबई में उसका यह घर सिर्फ़ एक किराए का फ्लैट नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी जगह बन गया था जहाँ अलग-अलग संस्कृतियों और विचारों के लोग प्यार और समझ के साथ एक-दूसरे को अपना रहे थे. सूर्या की 'ग़लती' ने दरअसल फ़िज़ा को एक अहम सबक़ सिखाया था - कि असली इंसानियत दिलों को जोड़ती है, न कि उन्हें अलग करती है. सूर्या अल्लाह की सच्ची बंदी निकली.




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