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Neha Yusuf

Abstract Drama Classics

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Neha Yusuf

Abstract Drama Classics

बिन बुलाई मेहमान

बिन बुलाई मेहमान

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काड़ाके की सर्दी में अगर खिलखिलाती धुप पूरे एक हफ्ते बाद अपना दिदार दे , तो भला कौन खुश ना होगा। घर की औरतो ने आज ऊनी कपड़े और कम्बल को छत पर फैला दिया था। बड़े दिनों के बिना धुले कपड़े आज लोहे की तारो पर डले सुख रहे थे।
मुन्नी की फूलो वाली फ्रॉक , दादा जी की जुराबे , नए फैशन की झलक देती भैया की बुश शर्ट , दादी की कलफ चढ़ी कोटा डोरिया की साड़ी और मम्मी , चाची के ब्लाउज पेटीकोट। हमारी छत से दूर दूर तक दिखती सभी छतो का यही नज़ारा था। हमारे घर में भी आज बड़ी गहमा गहमी थी , हर शख्स को धुप जो सेकनी थी , हर कोई अपना काम ख़तम करके छत पे जाना चाहता। चाचा जी , पूरे दो हफ्ते बाद बाद आज गुसलखाने में नहाने घुसे थे ,चाची ने तौलिया पकड़ाई और हल्दी सुखाने छत पर चढ़ गई। मेरे घने बालो में नारियल का तेल डालती हुए  बढ़ बढ़ कर रही थी ,कितने उलझे बाल है। मेरे बालो को देखो आज तक रेशम की डोर जैसे है, काले और लंबे। रोज़ एल्युमीनियम की एक छोटी सी पतीली में रीठा ,आंवला और शीकाकाई एक साथ भिगोई जाती, और फिर उससे बाल धोये जाते। ठीक शाम ४ बजे नारियल का तेल लगाया जाता, और कसके चोटी बनाई जाती, उसे काले रिबन से बंधा जाता। यह छोटी पतली, लम्बी, बेल रूपी होती, जिसके अंत में रिबन क एक फूल खिला हुआ होता,एक भी बाल की हिम्मत नहीं थी की उस चोटी में से ताका झांकी कर ले, यह दादी का रोज़ का नियम था, मेरे उलझे हुए बाल देख कर तो उनका पारा आसमान ही छूना था।  

में इसी दिमागी मुशाहिदी में गुम थी की तभी ज़ीनो पे से धाम धाम की आवाज़ आई, और ज़ोरदार पटक की साथ संजीदा घर में दाखिल होगई। हाफति हुए कुछ बोल रही थी, मगर उसके बड़े दाँत और मोठे होठ उसके अल्फाज़ो को जैसे पीछे ढकेल रहे थे। दादी की ऊपर चढ़ी हुए भवे और तल्ख़ लिए बोल यह समझ ने के लिए काफी थे की संजीदा उनको कितनी नागवार है ।. "पहेली पानी पीलो, "इतनी सर्दी में भी तुमको सुकून नहीं है, दादी ने तन्ज़ कसते हुए कहा। संजीदा मटके के पास खड़ी स्टील की गिलास से गटागट पानी पिए जा रही थी, उसकी कान पे जैसे कोई जूँ न रेंगी। दादी के ज़हरीले बोल सुन कर भी उसके मुँह के बड़े दाँत अंदर न जा सके और वह उनको लिए मुस्कुराती खड़ी रही। मुझे थोड़ी सकपकाहट हुई , लेकिन संजीदा की हाव् भाव में कोई फरक न पड़ा। लम्बी पूरी कद काठी की, साँवली रंगत और दुबला सा शरीर लिए यह लड़की मेरे लिए एक सवाल ही रही. हमारे घर का सारा काम करना इसको भाता और यह किसी की आँख भी न सुहाती । पान मसाला हमेशा मुँह में दबाए हुए यह मलंग रहती , दुप्पटे के कोने से सुपारी का टुकड़ा हमेशा बंधा रहता। वह हमारे घर के पीछे बसी कसाईयो के मोहल्ले में रहती थी। उसके अब्बा की गोश्त की दुकान सड़क के कोने पे होती, मैंने आज तक उसका घर ना देखा था, पर उसका चक्कर रोज़ लगता हमारे घर का। एक दिन ट्यूशन से घर आते वक़्त उसने मुझे रास्ते पर देख लिया और वह दौड़ के मेरे पास आगयी। उस के साथ एक दरमियानी कद की खातून भी थी, जो हरा रंग का ज़रीदार जोड़ा एक मटमैले दुप्पटे के साथ पहनी हुए थी। उसके कुर्ते पर सालन और तेल के दाग़ मौजूद थे, शायद अभी अभी देगची चला कर आई थी।

दोनों जब मेरे बिलकुल करीब आ पुहंची तो , संजीदा के चेहरे पर एक छोर से दूसरी छोर तक मुस्कान फैल गई । जिसमे उसके काले दाग दार दांत बेशरमाई से दिखयी पड़ते थे। " चलो मेरे घर वोह रहा सामने" उसके अल्फाज़ो ने मेरी सोच में खलल डाला, मैंने माना किआ पर वह न मानी और उसने इशारो में अपनी साथ वाली खातून को घर जाकर नाश्ते की तैयारी करने की ताकीद दे डाली। वह संजीदा से उम्र में बड़ी थी पर उसका का हुक्म सुनते ही उसने रफ़्तार पकड़ ली। उसकी गली में जैसे लोग उसके इशारो में दौड़ना जानते थे। मैं अभी उसके साथ आना कानी में लगी ही थी की दूर से मुझी चाचा आते दिखाई दिए और में समझ गई की आज तो खैर नहीं । मैं उनको संजीदा के साथ उसके मोहल्ले में जो खड़ी दिखाई दे गई थी। दादी के सामने एक की चार खूब लगाई , और मुझ पर बहुत सी डाँट पड़ी , मुझे याद दिलवाया गया मेरा आला खानदान और शिजरा। दादी ने गरजते हुए बोला " उसके घर बड़े छोटे का कोई लिहाज़ नहीं है, सब आपस में बैठ के मज़ाक करते है। कोई रोक टोक भी नहीं है, जैसे सब बे लगाम है, ज़ोर ज़ोर से हॅसना कोई सलीका ही नहीं उनको। अपने बच्चो की खातिर किसी से भी लड़ाई मोल लेते है"। ऐसे जाहिल लोग तौबा , यह उनकी खानदान की वजाहत करीब एक पौने घंटा चली। मुझे समझ नहीं आरहा था की , यह उनकी खुशमिजाज़ी और पारिवारिक एकता का बखान कर रही है या हमारे आला खानदान की झूठी शान की। क्या हम संजीदा को वाक़ई इतना ना पसंद करते थे, या हम उसकी आज़ाद परवरिश से जलते थे, में काफी सोच में पड़ गई ।
आज फिर संजीदा हमारे घर आई,  हमारे कोई भी काम करने को आतुर रहती थी , यह बताने घर आई थी की चाची ने जो बच्चो के स्कूल, के सफ़ेद जुराबे बाजार से लाने को बोला था ,वह दूकान पर नहीं थे लेकिन वह दुकानदार को खूब ताकीद करके आई है ,की कल वह ज़रूर मंगवा ले। एक सिलेटी रंग की थैली हाथ में थी, जिसमे निम्बू, हरा धनिया, पोदीना लेकर आई थी , बोली मैंने फ्रिज में देखा था, ख़तम होने लगे थे , ले आई , चाची और माँ ने जैसे राहत की साँस ली की अब खाना पकाने में कोई खलल न पड़ेगा, बेवकूफ उसको क्या पता हम उसको कितना ना पसंद करते है। उसकी यादाश्त हमारे लिए बड़ी ही सटीक थी, मसालों से लेकर सब्जी तक उसको सब पता था, क्या है, क्या लाना है। उसने हमारे घर में किसी रिश्ते का नाम नहीं बदला, वह उनको वही पुकारती थी जो की मैं ,कोई सुने या न सुने वह फिर भी अपनी सी बन कर पराये लोगो को अपनी दिन भर की दास्तान सुनाती जाती थी, बाजार में किआ मोल भाव , मोहल्ले की बहस, दिन भर बाजार में घूमना, मिलना जुलना, अपनी पसंद की इमली, गटा गट की गोलियां खरीद कर खाना और घर भी लाना, हमको देने के लिए। जिसे दादी इशारे से फेंकने को बोल देती थी। उसकी ये कहानियाँ सुनकर मुझे जलन भी होती, शायद उसको मेरे आला खानदान की ललक थी और मुझे उसकी आज़ादी की । यह सब बखान करते करते घर का आज का काम वह कर चुकी थी, मटर छील कर कर रख दिए थे, पालक मेथी साफ़ कर दी थी, और छत से कपड़े उतर के तेह कर के रख दिए थे। 

 दादी अब तक नाह दोहकर गुसलखाने से निकल चुकी थी, उन्होने संजीदा को सर से पैर तक घूर के देखा और बोली तुम जुराबे दे कर गई नहीं अब तक , हाँ बस जा ही रही हूँ, वह मुस्कुरा कर बोली और दरवाज़े की तरफ मुड़ गई। तभी चाची के छोटे बच्चो ने दस्तक दी , वह स्कूल से वापिस आगये थे और अब संजीदा उनको निलहा कर कपड़े बदलवायेगी , खाना खिलाएगी और दादी का मिज़ाज कुछ देर और सड़ेगा ,पर वह अपने बड़े बड़े दाँतो तले मुस्कुरा कर सारा काम करती रहेगी, उसके मुँह से निकले और तंभाखु से ख़राब हुए दाँत , मुझे सर्दी में धुप की तरह लगते। वह जब ज़ोर ज़ोर से ज़ीने चढ़ के घर आती तू घर के कामो में गटत हो जाती , और घर की औरतो को सुकून आजाता। हम कल फिर उसका इंतज़ार नहीं करेंगे और वह ज़रूर आएगी , बिलकुल बिन बुलाये मेहमान की तरह जिसकी कोई खातिरदारी नहीं होगी । 





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