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Neha Yusuf

Abstract Inspirational

4.2  

Neha Yusuf

Abstract Inspirational

"अब सबका घर है"

"अब सबका घर है"

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 सुबह, सूरज निकलने से पहले अब केवल एक औरत नहीं जागती। क्योंकि उसने अपने परिवार को सिखाया है कि देखभाल करना एक लिंग का काम नहीं है। बर्तन, बच्चों, ऑफिस और सपनों की ज़िम्मेदारी — ये सब मिलकर निभाई जाती हैं, अकेले नहीं।
 अब वो जल्दी-जल्दी बाल नहीं बाँधती — अब वो आराम से तैयार होती है, क्योंकि दुनिया को उठाना सिर्फ उसी की जिम्मेदारी नहीं रही। किटली अब भी सीटी देती है, लेकिन अब चाय उसके पति बनाते हैं, बेटा मेज़ लगाता है, और बेटी — वो कंबल तह करती है क्योंकि अब उसने परवाह दोनों माँ-बाप से देखी है, सिर्फ माँ से नहीं।
 “अपना कमरा साफ करो,” वो अब भी कहती है — लेकिन अब उसके साथ होता है: “और देखो तुम्हारा भाई भी मदद चाहता हो तो करो।”
वो सिर्फ बेटा-बेटी नहीं, इंसान बड़ा कर रही है — संवेदनशील, मेहनती और बराबरी पसंद इंसान। नाश्ता अब टीमवर्क है।

वो अपने ओट्स स्वाद से खाती है — न कि इसलिए क्योंकि कुछ और बर्बाद न हो जाए। और अगर किसी को आलू पराठा चाहिए, तो उसे बेलना भी आना चाहिए। "देखो और सीखो," वो हँसकर कहती है — सेवा नहीं, समझदारी सिखाती है। सुबह की हलचल अब भी होती है — लेकिन अब वो शोर सिर्फ उसका नहीं, सबका होता है।
 "मेरी चाबी कहाँ है?" कोई चिल्लाता है, “मैं घर की गूगल नहीं हूँ,” वो बोली, गरम चाय की चुस्की लेते हुए — क्योंकि अब उसकी चाय ठंडी नहीं होती, और न ही उसका आत्म-सम्मान।
 अब वो घर की अनदेखी मैनेजर नहीं है — वो संतुलन की कप्तान है। अब वो घर नहीं, हालात संभालती है — पूरे गर्व और बेझिझक अंदाज़ में।
 वो अब चुप्पी में शांति नहीं ढूंढती — वो समय और जगह खुद के लिए तय करती है। वो "ना" कहती है जब ज़रूरत हो, और "हाँ" सिर्फ तब, जब दिल से निकले।
 
तालियाँ? अब ज़रूरी नहीं हैं।
क्योंकि अब उसका परिवार सिर्फ लेने वाला नहीं — देने वाला भी है। अब धन्यवाद कहते हैं — इसलिए नहीं कि वो सुपरवुमन है, बल्कि इसलिए कि उसने दिखाया कि इंसान होना मतलब है — साथ निभाना। वो मंच से उतरी नहीं — उसने मंच को दोबारा डिज़ाइन किया। अब औरत सिर्फ एक शांत इंजन नहीं है — वो ईंधन है, ड्राइवर है, और नक्शा भी वही है। और अब बाकी सबको भी कभी-कभी स्टेयरिंग पकड़ना होगा।  


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