विश्वासघात--भाग(२०)
विश्वासघात--भाग(२०)
दूसरे दिन कुसुम की रिहर्सल शुरु हुई,बुआ बनने के लिए,नकली विग मँगाई गई,एक चश्मा मँगाया गया और एक सफ़ेद साड़ी भी मँगाई गई,जिसे पहनकर कुसुम तैयार हुई,अब समय था अभिनय का,कुसुम कोशिश तो कर रही थी लेकिन उससे कहीं ना कहीं गड़बढ़ हो ही जाती,उनके पास समय भी ज्यादा नहीं बचा था क्योंकि शाम को नटराज के यहाँ डिनर पर जाना था।
जैसे तैसे कुसुम ने बूढ़ो वाले हाव भाव सीख ही लिए,उसे थोड़ा खड़ूस भी दिखना था,जो उससे हो नहीं पा रहा था,संदीप बोला____
" बस,तुम इतना रहने दो,वहाँ ज्यादा बोलना नहीं ,मुँह बंद रखना।"
"तो तुम अकेले ही चले जाओ,मुझे कहीं नहीं जाना,एक तो सुबह से लगी हुईं हूँ,नही बन पा रहा मुझसे तो क्या करूँ?अब मै खड़ूस नही हूँ तो कैसे खड़ूस दिखूँ भला! "कुसुम गुस्से से बोल पड़ी।
"अच्छा! बाबा! गुस्सा मत करो,तुमसे जैसे बने तो करना,बाक़ी अंकल सम्भाल लेंगें",संदीप बोला।
शाम हुई,करीब़ सात बजे सब मोटर में बैठकर नटराज के घर की ओर निकल पड़े,
नटराज के घर पहुँचे_____
"आइए...आइए....जमींदार साहब! आपका स्वागत है,आप भी आइए नाह़र सिंह जी"नटराज बोला।
"जी,ये हैं नाहर की बुआ कुमुदिनी देवीं जी",शक्तिसिंह जी बोले।
"ओहो...तो आप हैं इनकी बुआ,माशाअल्लाह अभी तक बुढ़ापा आपको तनिक भी छू नहीं गया,त्वचा तो देखिए,छोटे बच्चों सी है नर्म और मुलायमनटराज बोला।
"वो क्या है ना! कुमुदिनी बहुत बड़ी जमीदारी सम्भालती हैं,इनका एक बंगला लन्दन में भी है,वहाँ भी आना जाना लगा रहता है,हमेशा चार नौकर आगे पीछे लगे ही रहते हैं,कष्ट तो जैसे क्या होता है ?ये तो इन्होंने कभी जाना ही नहीं,इसलिए इनकी त्वचा इतनी चम़कदार है",शक्तिसिंह जी बोलें।
"अच्छा...अच्छा...आप लोग तशरीफ़ रखें,मैं अभी आया"और इतना कहकर नटराज चला गया।
" अंकल! आपको नहीं लगता कि आप कुछ ज्यादा ही फेंक रहे हैं,इतना मत फेंकिए कि लपेटा ना हो",संदीप बोला।
"तुझे क्या पता? दुनियादारी,तू बस तमाशा देख और चुपचाप बैठा रह",शक्तिसिंह जी बोले।
तभी नटराज अंदर से साधना और मधु को लेकर आ पहुँचा,साधना ने शक्तिसिंह को देखते ही कहा___
" अरे,भाईसाहब आप!"
"जी,बहनजी! नमस्ते! "शक्तिसिंह ,साधना से बोले।
"तो आप लोग एक दूसरे को जानते हैं',नटराज ने पूछा।
"जी,उस दिन हम इनके ही घर गए थे पार्टी में',साधना बोली।
"तब तो बहुत बढ़िया"नटराज बोला।
मधु ने भी सबसे नमस्ते की और बुआ बनी कुसुम को देखकर बोली आप तो बिल्कुल कु....
बस मधु इतना ही कह पाई थी कि शक्तिसिंह जी बीच में बोल पड़े___
"हाँ,ये कुमुदिनी देवी हैं,नाहर की बुआ जी,आपने इन्हें कहीं ना कहीं देखा होगा,अक्सर मैगजीन्स और न्यूसपेपर्स में इनकी तस्वीरे छपतीं रहतीं हैं,ये इतनी अमीर जो हैं',शक्तिसिंह जी बोले।
"अच्छा....अच्छा...तभी मैं सोच रही थी कि इनका चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लगता है,मधु बोली।
"ठीक है मैं अभी चाय नाश्ते का इंतज़ाम करती हूँ,मधु तू भी मेरी कुछ मदद करा दे,साधना बोली।
"अच्छा,चलो माँ! मधु बोली और दोनों माँ बेटी चाय नाश्ते का इंतजाम करने चलीं गईं।
और कुमुदिनी जी,कुछ और बताइएं आपके बारें में,नटराज बोला।
" बस,कुछ नहीं,बहुत दुखभरी कहानी है कुमुदिनी जी,सोलह साल की उम्र में विवाह हो गया था,अच्छी ख़ासी जमींदारी थीं,रिश्तेदार ही दुश्मन बन बैठे,सत्रह साल की उम्र में एक बेटा भी हो गया था लेकिन जायदाद और हवेली के लालच में आकर एक रात इनके पति और बेटे का कत्ल कर दिया गया,इन बेचारी को गाँव छोड़ना पड़ा,जो कुछ साथ में लाते बना वो ले आई और शहर की बैंक में पति बहुत रूपया जम़ा करके गए थे,तब उसी रूपए से इन्होंने अपना कारोबार शुरु किया लेकिन दूसरी शादी नहीं की,लोगों की मदद की ,उन्हें रोजगार दिया,बस दूसरों की भलाई में ही सारी उम्र गुज़ार दी,शक्तिसिंह जी बोले।
" वैसे किस चीज़ का कारोबार है आपका"नटराज ने पूछा।
"बस,यही अचार, पापड़ और बड़ियों का"शक्तिसिंह जी बोले।
"वाह.....जमींदार साहब! सारी बातों के जवाब बस आप ही दिए चले जा रहे हैं लगता है बहुत क़रीब से जानते हैं आप कुमुदिनी देवी को,कुछ इन्हें भी बोलने दीजिए,हम भी तो सुनें कि इनकी आवाज़ कितनी मधुर है",नटराज ने चुटकी लेते हुए कहा।
"बहुत पुरानी जान पहचान है,इनकी ससुराल मेरे गाँव के करीब थी,अक्सर इनके गाँव आना जाना लगा रहता था और अग़र आपको एत़राज़ है तो मैं कुछ नहीं बोलता भाई! कुमुदिनी देवी! अब आप ही इनकी सवालों के जवाब दें,हमें बख़्श दीजिए"शक्तिसिंह जी बोलें।
"ये कैसी बातें कर रहें हैं अंकल! लगता है आप बुरा मान गए",नाहरसिंह बने संदीप ने कहा।
"इन जनाब़! ने बात ही कुछ ऐसी की है",शक्तिसिंह जी नाराज़गी भरे अन्द़ाज में बोले।
"अरे ,इनकी तरफ़ से मैं आपसे माफ़ी माँगता हूँ,आप अपनी बात ज़ारी रखिए",नाहर सिंह बने संदीप ने कहा।
" नाराज़ ना हो जमींदार साहब! गलती हो गई",नटराज बोला।
"तब तक साधना और मधु चाय नाश्ता लेकर आ पहुँचीं,साधना ने कुमुदिनी देवी से कहा___
"बहनजी! चाय लीजिए।"
"जी,मैं भी लिए लेती ,आप भी तो लीजिए"कुमुदिनी बनी कुसुम ने कहा।
"आपकी आवाज़ तो किसी से मिलती जुलती लगती है लेकिन याद नहीं आ रहा"साधना बोली।
"आवाज तो बहुत से लोगों से बहुत से लोगों की मिलती जुलती रहतीं है,इसमे कोई बड़ी बात नहीं है आण्टी जी",नाहर बने संदीप ने कहा।
"वैसे बहनजी !आपकी ये सिल्क की साड़ी और ये पाँच लडिय़ों वाला मोतियों का हार काफ़ी महँगा लगता है",साधना बोली।
"जी आँटी जी! बुआ जी की साड़ियाँ तो ख़ास बनारस से मँगवाईं जातीं हैं और ये हार तो खानदानी है",नाहरसिंह बने संदीप ने कहा।
ये सब सुनकर कुमुदिनी बनी कुसुम सकपकाई जा रही थी,उसे लग रहा था कि अच्छा हुआ ये सब जवाब दे रहें हैं,मुझे तो कुछ पता ही नहीं,जिन्दगी भर तो झोपड़पट्टियों में पली बढ़ी हूँ,मैं क्या जानू? ये शान और शौकत।
ऐसे ही इधर उधर की बातें चलती रहें और फिर खाने का समय हो गया,
साधना बोली__ आप सब डाइनिंग टेबल पर चलिए,डिनर तैयार है।
और सब डाइनिंग टेबल पर हाज़िर हो गए।
साधना ने डिनर में बहुत कुछ बनाया था,मलाई कोफ्ता,दाल मक्खनी,शाही पनीर,वेज पुलाव,भरवाँ नान और मीठे में मूँग का हलवा,सबने दिल से खाना खाया,खाना वाकई में बहुत अच्छा बना था।
वाह...बहनजी! क्या लज्जतदार खाना बनाया है आपने,म़जा ही आ गया,शक्तिसिंह जी बोलें।
शुक्रिया भाईसाहब! साधना बोली।
डिनर करने के बाद कुछ देर बातें हुई और सब आने लगें तभी नटराज कुमुदिनी से बोला___
कुमुदिनी देवी! आपसे एक बात कहना चाहता हूँ,अगर आप बुरा ना मानें तो।
जी सिघांनिया साहब! कहिए,भला ऐसी भी कौन सी बुरा मानने वाली बात है,कुमुदिनी बनी कुसुम ने कहा।
वो ये है,कुमुदिनी देवी! अगर आपको कोई एत़राज़ ना हो तो आपका भतीजा नाहर मुझे अपनी मधु के लिए जँच गया है,,भला ऐसा ऊँचा खानदान हमें अपनी मधु के लिए और कहाँ मिलेगा?नटराज बोला।
ये सुनकर कुमुदिनी बनी कुसुम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई,अब वो बोले तो क्या बोले?महँगा पड़ गया उसे बुआ बनना,उसका होने वाला दूल्हा उससे ही माँगा जा रहा था किसी और से ब्याहने के लिए,ये सुनकर वो सोच में पड़ गई।
आपने जवाब नही दिया कुमुदिनी जी,नटराज ने फिर कहा।
ऐसी बातें सबके सलाह मशविरे से होतीं हैं,हम आपको बाद में जवाब देते हैं,शक्तिसिंह ने बात को सम्भालते हुए कहा। यही हाल मधु का भी हो रहा था इस बात को सुनकर,वो भी उदास होकर अपने कमरे में चली गईं और इस बात को साधना भाँप गई।
शक्तिसिंह ने इतना कहकर घर जाने के लिए विदा ली,सब मोटर में बैठे और चल दिए घर की ओर,रास्तें में कुसुम भड़क उठी और बोली,लो भाई! मियाँ की जूती मियाँ के ही सर!! और बाबा! आपको क्या जुरूरत थी इतनी लम्बी चौड़ी हाँकने की॥
हाँ,अंकल! आपने तो आज बहुत ही हाँक दिया,संदीप बोला।
जनाब़! आप भी कुछ कम नहीं हैं,साड़ियाँ बनारस से आतीं हैं,ये खानदानी हार हैं...वगैरह...वगैरह...,कुसुम गुस्से से बोली।
अब तो बुरे फँसे,अगर नटराज ने सच में मधु से शादी करने को कहा तो,शक्तिसिंह जी बोले।
आप ही तो इस महारानी को कुमुदिनी बुआ बनाकर ले गए थे,कुछ बना नहीं ऊपर से बिगाड़कर और चली आई,संदीप बोला।
मैने बिगाड़ा....मैने बिगाड़ा...मेरी वज़ह से कुछ नहीं हुआ है,जनाब़ को इतना सँज सँवर के जाने की क्या जुरूरत थी,अब भुगतो,कुसुम बोली।
अरे,तुमलोग तो बच्चों जैसे झगड़ रहे हो,घर चलकर सोचते हैं कि क्या करना है?शक्तिसिंह जी बोले।
सब घर पहुँचे और लीला से सब बताया।
लीला बोली___
अब तो एक ही रास्ता है कि मधु और साधना से इस विषय में सब कुछ बता दो,तभी फायदा है।
लेकिन अगर उन्होंने कुछ गलत सोचा तो,संदीप बोला।
साधना बहुत अच्छी है,वो हमारी परेशानी जरूर समझेगी,लीला बोली।
लेकिन ये सच्चाई उन्हें बताएगा कौन,कुसुम बोली।
देखती हूँ,कुछ सोचने दो,एक दो दिन के बाद बताती हूँ और चलो अभी सब सो जाओ,सुबह बात करेंगें इस बारें में,लीला बोली।
और सब सोने चले गए।
और उधर मधु के घर में___
क्या हुआ? मधु! तू ऐसे मुँह फुलाकर नीचें से क्यों चली आई,साधना ने पूछा।
माँ! मैं उस नाहर से शादी नहीं करूँगी,वो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं,मधु बोली।
तो कौन पसंद है हमारी बिटिया को प्रदीप ,साधना ने हँसते हुए कहा।
तुमने ये कैसे जाना माँ! मधु ने साधना से पूछा।
मैं तेरी माँ हूँ और माँ अपने बच्चे के मन की सब बातें समझ जाती है,साधना बोली।
तो माँ! अब क्या होगा? मधु बोली।
कुछ नहीं,तू ये सब कल काँलेज मे प्रदीप से कहना फिर देखते हैं आगे क्या करना है,साधना बोली।
ठीक है माँ! कल ही प्रदीप को बताती हूँ।दूसरे दिन काँलेज में मधु का उतरा हुआ चेहरा देखकर प्रदीप ने पूछा___
क्या हुआ मधु! इतनी उदास क्यों हो?
अरे,डैडी मेरी शादी तय करना चाहते हैं,मधु बोली।
लेकिन किसके साथ,प्रदीप ने पूछा।
अरे,उसी के साथ,जो तुम्हारी सालगिरह में सबसे ज्यादा उछल रहा था,वो बेवकूफ सा दिखने वाला नाहर सिंह,मधु बोली।
क्या? नाहर भइया से,प्रदीप बोला।
हाँ,उसी बेवकूफ से,वो ,उनकी बुआ और शक्ति अंकल कल रात हमारे यहाँ खाने पर आए थे और वहीं ये सब तय हुआ,मधु बोली।
तो नाहर भइया को कोई एत़राज़ नहीं हुआ,प्रदीप ने पूछा।
वो घोंचू जैसा खड़ा रहा और कुछ भी नहीं बोला,मधु बोली।
अच्छा! तुम फिकर मत करो,मैं कुछ देखता हूँ।
और प्रदीप गुस्से से अपने कमरें पहुँचा लेकिन तब तक संदीप, शक्तिसिंह जी के घर से नहीं लौटा था और कुछ देर बाद जब संदीप लौटा तो प्रदीप ने संदीप से कोई बात ना की,ये देखकर संदीप ने प्रदीप से पूछा___
" क्या बात है ? रे! "बोलता क्यों नहीं?
"क्यों ?मेरे बोलने से क्या फरक पड़ता है,अब तो तुम अमीर बन जाओगें तो मुझे थोड़े ही पूछेगो',प्रदीप बोला।
'अमीर! तेरा मतल़ब क्या है रे! साफ साफ बता',संदीप बोला।
'ये कि अब तो तुम नटराज के दमाद बनने वाले हो,"प्रदीप बोला।
"अच्छा तो ये बात है,तुझ तक भी बात आखिर पहुँच ही गई,तुझे किसने बताया",संदीप ने पूछा।
"मधु ने,वो ये शादी नहीं करना चाहती",प्रदीप बोला।
"तो वो किसी और को पसंद करती है"संदीप ने पूछा।
' हाँ,"प्रदीप बोला।
"कौन है वो,जरा मैं भी तो सुनूँ,"संदीप बोला।
"ना जाने कौन है? मुझे क्या पता?"प्रदीप बोला।
"कहीं तू तो नहीं है वो और मुझे पता है तू ही है वो,उस दिन पार्टी में मैने सब देखा था",संदीप बोला।
" तो तुमने इनकार क्यों ना किया शादी से",प्रदीप बोला।
"वो सही समय और सही जगह नहीं थी और वैसे भी कुमुदिनी बुआ मेरी शादी मधु से थोड़े ही होने देंगीं,वो मेरा खून पी लेंगीं",संदीप बोला।
और दोनों भाई ठहाका मारकर हँस पड़े.......
क्रमशः___
