Sushma s Chundawat

Tragedy


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Sushma s Chundawat

Tragedy


विचार-विमर्श

विचार-विमर्श

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कुछ दिनों से मैं काफी परेशान थी। परेशानी की वज़ह अखबार में छपी खबर थी, शहर के एक प्रसिद्ध स्कूल में पढ़ते कुछ छात्रों की खबर !

स्कूल अच्छी थी, पढ़ाई के साथ-साथ दूसरी एक्टीविटीज़ भी करवायी जाती थी पर एक दिन पढ़ा कि स्कूल के कुछ छात्र सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक ग्रुप बनाकर लड़कियों के ऊपर भद्दे व अश्लील कमेन्ट कर रहे थे, साथ ही उनकी वास्तविक तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ करते हुए अश्लील तस्वीरें बनाकर उन्हें भी ग्रुप में शेयर किया जा रहा था। पुलिस ने उनमें से एक को गिरफ्तार कर लिया था और बाकियों की भी खोज जारी है।


यह सुनकर मैं सन्न रह गयी। स्कूली छात्र और ऐसी हरकतें ! यह उम्र तो वैसे ही कई कारणों की वजह से बदनाम है..माता-पिता का कहा नहीं मानना, उदण्डता, शारीरिक और मानसिक परिवर्तन का दौर, संवेगों की उथल-पुथल आदि, पर ये सब ऐसे विषय नहीं है जो मेरे मन-मस्तिष्क को उद्वेलित कर दे ! मुद्दा यह है कि मात्र तेरह से सत्रह साल के बच्चों की ऐसी विकृत मानसिकता !! ऐसे बच्चे जो 'मासूम' की श्रेणी में आते हैं, उनमें इस प्रकार के मानसिक विकार कि किसी लड़की की इज़्ज़त को तार-तार करना उनके लिए मनोरंजन का साधन हो, यकीनन चिंताजनक है।

पतिदेव ने मुझे चिंतित देखा तो बोले- " इस प्रकार की हरकतें पहली बार हुई है , ऐसा तो नहीं है। देश की राजधानी में हुए दुखद रेप केस में एक नाबालिग भी शामिल था, जिसने सबसे ज्यादा दरिंदगी दिखायी थी।

साधुओं की हत्या में कुछ नाबालिग भी थे जिन्होंने लाठी पीटी थी, कई फिल्में भी बनी जिनमें अठारह वर्ष से कम उम्र का बच्चा अपराधिक गतिविधियों का हिस्सा बनते दिखाया गया।"


मैं फिर से सोच में डूब गयी- "आखिर क्यों इतना आक्रोश, गुस्सा, इतना वहशीपन आज के किशोरों में देखा जा रहा है ?

क्या ये मानसिक दिवालिया हो गये हैं जिन्हें सही-गलत का फर्क समझ नहीं आ रहा या फिर ऐसे मानसिक रोगी जिसे अच्छा-बुरा कुछ ज्ञात नहीं। ना परिणामों की चिंता ना सज़ा का भय, बस मन का करना है इन्हें।

वर्तमान युग की शिक्षा प्रणाली का दोष है या कानून व्यवस्था का या फिर कलयुग का ! जवाब नहीं सूझ रहा था।


"गलती किसकी है, समझ नहीं आ रहा..पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, दादा-दादी का अटूट प्यार और उनकी नैतिक मूल्यों पर आधारित छोटी-छोटी अनगिनत शिक्षाप्रद कहानियां हमेशा बच्चों के साथ थी जिसकी वजह से विद्यालय जाने से पूर्व ही वे नैतिकता का पाठ पढ़ चुके होते थे, घर पर अपने ताऊजी, पिताजी, चाचाजी को दादाजी का आदर करते देखते थे तो वहीं ताईजी, माँ, चाचीजी दादी का पूरा सम्मान करती थी।

परिवार एक इन्द्रधनुष के समान था, सभी अलग-अलग रंग, हर एक रंग का अपना वजूद पर सबका साथ जीवन के कैनवास पर रंगों की मनोहर छवि अंकित करता था।


अब तो हर रिश्ता अंकल और आंटी शब्दों में सीमित हो गया है !

अब दादाजी-दादीजी साथ नहीं रहते, या तो वे किसी वृद्धाश्रम में रह रहे होते हैं या घर के किसी एक कोने में उनकी कोठरी बनी होती है, जहाँ बच्चों का जाना वर्जित होता है !" -मैंने अपने विचार रखे।


पतिदेव मेरी बातों से सहमत होते हुए बोले- सच है, पहले सब छोटे-बडे सारे भाई-बहन भी साथ खेलते, खाते-पीते बड़े होते। सबका आदर करना, झूठ नहीं बोलना, संयम से रहना ये सभी गुण विरासत में प्राप्त होते थे पर आजकल एकल परिवार का प्रचलन बढ़ गया है, सिर्फ एक बच्चा और उसे भी माता- पिता सुबह-सुबह नौकरों के भरोसे छोड़कर दफ़्तर की ओर भागते हैं, पैसों की अंधी दौड़ में लगे ओवरटाइम करते हैं और रात को देर से लौटते हैं। बच्चे के लिए वक्त ही कहाँ है ! शहर की सबसे बड़ी स्कूल में दाखिला करवा कर वे अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं।

विद्यालय भी कहाँ एक-एक बच्चे पर ध्यान दे ! कक्षा में अंग्रेजी में पाठ पढाकर ढेर सारा होमवर्क बच्चों पर थोप दिया जाता है। शिक्षक को अंग्रेजी बोलनी आनी चाहिए, हिन्दी भाषा का टीचर भी इंग्लिश में वार्तालाप करे, बस यह नियम आवश्यक है, वरना नौकरी से बर्खास्त। शिक्षकों की कमी थोड़े ही है, तीन-चार हजार में ही मिल जाते हैं आसानी से ! अब ये टीचर अपना रिजल्ट रखने के लिये रटना सिखाएं या नैतिक मूल्यों का ज्ञान बांटते फिरे !!"


मेरी सासू मां भी वार्तालाप का हिस्सा बन गयी और बोली- " इधर घर पर भी माता-पिता के पास समय नहीं होता कि बच्चे के साथ सर खपाये इसलिए उसे कोचिंग, हाॅबी क्लासेज़ के भंवर में डाल दिया जाता है।

पर अफसोस ! संस्कार, मानवीय मूल्य, नैतिकता सिखाने के लिए कोई कोचिंग नहीं।

बच्चा फस्ट्रेशन में आकर क्षणिक सुख की ओर आकर्षित हो जाता है, वो क्षणिक सुख- शराब, सिगरेट, ड्रग्स, अश्लील साहित्य या अश्लील विडियो कुछ भी हो सकता है।

और एक बार इनकी लत लग गयी, फिर चाहे फटकारो, सजा दो या बालसुधार गृह भेजो, सुधरना बहुत मुश्किल है। "


"सच कहा आपने, इस पर इंटरनेट की सहज सुलभता ने आग में घी डालने का काम बहुत अच्छे से किया है, चार-पांच साल का बच्चा बड़ी आसानी से सोशल मीडिया का उपयोग करना सीख जाता है और माँ बाप गौरवान्वित महसूस करते हैं कि उनकी औलाद कितनी टेलैण्टेड़ है ! अब ऐसे बच्चे उम्र से पहले ही परिपक्व हो जाते हैं, जिस विषय का ज्ञान उन्हें सत्रह,अठारह वर्ष की आयु में होना चाहिए वो ग्यारह-बारह वर्ष में ही आसानी से प्राप्त हो जाता है।"- ससुर जी ने भी अपना मत व्यक्त किया।


"आपने नोटिस किया क्या मम्मा, आजकल के छोटे-छोटे बच्चों के चेहरों से मासूमियत नहीं टपकती बल्कि चालाकी झलकती है। समय से पहले बड़े होते बच्चे अपनी मासूमियत खो चुके हैं। "- किंडरगार्टन स्कूल में नौकरी कर रही मेरी बेटी उदास स्वर में बोली।


"और ऊपर से ऐसे टीवी प्रोग्राम या कॉमेडी शो जिनमें खुले आम गालियाँ देना कूल समझा जाता है ! लड़के, लड़कियाँ सभी बिंदास गालियाँ देते हैं और दर्शक हंसते रहते हैं" - बड़़े बेटे ने भी विचार रखे।


"हाँ,जब ऐसे माहौल में बच्चे रहेंगे तो ये सब ही तो सिखेंगे। हमारे जमाने में कई धार्मिक प्रोग्राम्स, भक्ति गीत आया करते थे जो मन में पवित्रता जगाते थे और आजकल गानों के नाम पर द्विअर्थी बोलों और अंग्रेजी गालियों से भरे फूहड़ मनोरंजन को तवज्जों दी जा रही है। ज्यादातर फिल्में परिवार के साथ बैठकर नहीं देखी जा सकती है। ऐसे दृश्य देखकर कच्चे मन पर बुरा असर ही पड़ेगा ना ! फिर उनसे संस्कारों और नैतिकता की उम्मीद व्यर्थ है। "- पतिदेव बोले।


"दादाजी जैसे अभी लाॅकडाउन हुआ और रामायण पुनः प्रसारित हुई, लोगों ने इसे काफी पसंद भी किया तो

सरकार को चाहिए कि वह साल में एक लाॅकडाउन अनिवार्य कर दे ताकि बच्चों को अपने माता-पिता का समय और साथ मिल सके, ज्यादा नहीं सात से लेकर दस दिन का लाॅकडाउन और इस समय में कोई बाहर नहीं निकले, घर पर सभी के साथ समय बिताये।"- दोनों बच्चों का प्रस्ताव आया।


"बेटा, ये सब अपने हाथ में नहीं है, सरकार को जो सही लगेगा, वो ही होगा पर माता पिता का यह कर्तव्य जरुर है कि वह अपनी संतान के बारे में सचेत रहे।

उनकी संगत, गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखे।

उन्हें समय-समय पर बताये कि किसी बालसुधार गृह का अंधेरा कमरा कितना भयावह होता है। सस्ते मनोरंजन या क्षणिक सुख के पीछे वो अपने भविष्य में आने वाले रंग-बिरंगे इन्द्रधनुष को हमेशा के लिए खो सकते हैं !

और स्कूलों में भी किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिक मूल्य शिक्षा प्राथमिक स्तर से ही देनी शुरू कर दी जाये तो उत्तम है। इसके लिए जरूरत है, योग्य व गुणी अध्यापक गण की, जो दण्ड़ या रटन्त प्रणाली से नहीं बल्कि प्रेम और विश्वास से बच्चों के कोमल मन में संस्कारों का बीजारोपण करे।

माइनस मार्किंग के बावजूद नौकरी प्राप्त व्यक्ति या सिर्फ टाइम पास करने के लिए स्कूल जाॅइन करने वाला व्यक्ति शिक्षा के महत्व को कभी नहीं समझ सकता अतः सरकार को भी चाहिए कि देश के भविष्य के साथ पढ़ाई को लेकर बेहूदा मज़ाक ना हो। सही और योग्य अभ्यर्थी को ही शिक्षक का पद मिले ताकि बच्चों को सही मार्गदर्शन मिलता रहे और तब शायद वे भटकने से बच जाएँ।"- मेरे ससुर जी ने ठण्डी सांस भरते हुए जवाब दिया और हम सब किशोरवय बच्चों के सुनहरे भविष्य की मंगलकामना करने लगे।



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