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Sadhana Mishra samishra

Drama Tragedy


3.8  

Sadhana Mishra samishra

Drama Tragedy


वह आखिरी चिठ्ठी

वह आखिरी चिठ्ठी

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दिन के बारह बजते ही रत्तो बेचैन हो जाती थी, तुरंत अपने बक्से की तरफ झपटती थी और एक चिठ्ठी निकाल कर अमरैया की तरफ दौड़ पड़ती थी। आज भी बारह बजते ही उसने ऐसा ही किया। आँगन में बैठी माँ उसे देखकर भी अनजान बन गई और रत्तो के दरवाजे से बाहर जाते ही अपने पल्लू से अपनी आँखों में उमड़ते आँसुओं को पोंछने लगी।

यही वह समय होता था जब डाकिया अपनी साइकिल पर चिठ्ठियों से भरा बस्ता रखकर अमरैया के सामने की पगडंडी से गुजरता था। रत्तो रोज आशा भरी नजरों से डाकिया बाबू को इस उम्मीद से देखती थी कि हो सकता है कि कभी चाचा उसे कोई चिठ्ठी पकड़ा कर कहें कि बिटिया यह लो, आज तो तुम्हारे नाम पवन बाबू की चिठ्ठी आई है। वह दौर गुजरे साल से ऊपर बीत चुका था जब यही चाचा हर हफ्ते उसे एक चिठ्ठी लाकर देते थे और बड़े प्यार से पुकारते थे- "रत्तो बिटिया, दामाद बाबू का सनेसा आ गया है तैयारी कर लो ससुराल जाने की।"

और फिर माँ से हँसते हुए कहते थे- "बड़ी भाग्यशाली हो भौजी, हीरा जैसे दामाद खोज कर लाई हो, कितना प्यार करते हैं हमारी बिटिया से।"

रत्तो के गाल यह बात सुनते ही गुलनार हो जाते थे। हाथ से ओढ़नी का पल्लू पकड़ शरमाई-शरमाई सी वहाँ से भाग कर कोठरी में समा जाती थी। पाँचवी तक पढ़ी थी रत्तो, सो चिठ्ठी पढने में बहुत दिक्कत नहीं होती थी। जोड़ कर पति की वह प्रेम की पाती को पढ़ लेती थी।

उफ....कैसी-कैसी प्यार की शायरी से भरी होती थी वे चिठ्ठियाँ, लगता था कि पवन बाबू ने दिल ही चीर कर रख दिया है सामने। न जाने कितने वादे साथ जीने मरने के, जाने प्यार की कितनी कसमों से भरी रहती थीं वे बतियाँ। सदा लिखते थे कि तुम मेरे दिल की रानी हो, सात जन्मों का नाता है मेरा तुम्हारा, मैं तो चौदह जन्मों तक तुम्हारा ही रहूँगा रत्तो, बिना तुम्हारे मेरा कुछ नहीं ।

उन्हीं चिठ्ठीयों को छाती से लगाए सोती थी रत्तो, उन्हीं चिठ्ठीयों को पकड़ रात भर रोती थी रत्तो। पति के साथ बिताए वही दिन तो बेचैन कर रहें हैं रत्तो के आज को।

आज आँखों से आँसुओं की निर्झर नदी सैलाब बनकर बह रही है। कभी इन्हीं चिठ्ठीयों को सखियों संग बैठ पढ़ती थी रत्तो, उनकी छेड़खानिओं का मजा लेती थी रत्तो। वे पढ़-पढ़कर कितनी चुटकियाँ लेती थी चिठ्ठी में लिखी शायरिओं पर। जितनी चुटकी उतने ही गाल दहकते थे रत्तो के, आँखें लज्जा से झुक जाती थीं पर मन ही मन मुस्काती ही रहती थी रत्तो।

अब डाकिया चाचा का इंतजार वह रोज करती थी बारह बजे। चाचा भी जानते थे कि रत्तो किस उम्मीद पर बैठी रहती है रोज पर अब वह आवाज नहीं लगाते थे कि बिटिया तुम्हारी चिठ्ठी आई है पवन बाबू की। वह उसी पगडंडी से रोज गुजरते थे दिल पर बोझ लेकर। भरसक प्रयास करते थे कि रत्तो की आँखों की उम्मीद से उनकी आँखें न टकरा जायें।

वह सिर नीचा किए जल्दी से जल्दी वहाँ से गुजरने की कोशिश करते थे। जानते थे कि जब तक वे दिखेंगे तब तक रत्तो की आँखें उनका पीछा करेंगी। कितनी बार लिख चुके हैं महकमें में कि यहाँ से उनका तबादला करवा दें पर न तो तबादला ही हो रहा है और न रत्तो की आँखों की वीरानी झेली जा रही थी। यहाँ बैठकर रत्तो तो अपने ब्याह की यादों के समुंदर में डूबी जा रही थी रोज की तरह।

पाँचवी में पढ़ती थी रत्तो जब बापू ने माँ को खुश खबरी सुनाई थीं कि शहर में रहने वाले मनोहरलाल श्रीवास्तव जी के सुपुत्र चिरंजीव पवन कुमार के साथ रत्तो का ब्याह तय हो गया है। पवन कुमार उस समय दसवीं में पढ़ते थे। और दो माह बाद रत्तो का ब्याह हो गया। रत्तो बहुत खुश थी अपने ब्याह पर, नये-नये गहने, नये-नये कपड़े, जाने कितनी मिठाई छुप-छुप कर खाई थी सखियों संग, कोई हिसाब नहीं ।

गौने की रस्म तीसरे साल की ठहरी और वह नन्हीं सी रत्तो, श्रीमति रत्तो बन गईं । ब्याह के बाद माँ ने पढ़ाई छुडवा दी, यह कहते हुए कि अब ब्याह हो गया है तो गृहस्थी के काम सीखना है। ससुराल में यही विद्या काम आयेगी। तीसरे बरस गौना हुआ, बांका छैल छबीला पति पाकर रत्तो निहाल हो गई।

उस पर पवन का इतना प्यार कि वह बलि -बलि जाती थी। पवन भी सुगढ़, अपूर्व सुंदरी पत्नी के रंग में रंग गया।

बालक वर, बालिका वधू। पढ़ाई- लिखाई छोड़ कर पवन बाबू दिन भर पत्नी के आगे पीछे डोलने लगा। मूंछ की रेख तो अभी निकलनी ही शुरु हुई थी। दोनों ही नासमझी के उस दौर में थे कि कुछ सुध-बुध नहीं रही, बस रत्तो दिन भर ठुमकती और पवन बाबू निहाल होते रहते। माँ की आँखों से बचकर सारे दिन पवन बाबू का वह प्यार का गागर ही तो मन में फाँस की तरह चुभता है। यादों की वह गठरी दिल से निकलने का नाम ही नहीं लेती है।

वह सोने से दिन थे, चाँदी सी रातें थी, जब दो नौजवान होती धड़कनें किसी बंधन को नहीं मानना चाहती थी।

माँ की सतत निगरानी फेल हो जाती थी। दोनों हर मिले मौके में दिन-रात एक-दूसरे में खोए रहते थे।

दिन-रात प्रेम के झूलों की पेंग भरने का नतीजा यह निकला कि पवन बाबू बारहवीं की परीक्षा में फेल हो गये।

मनोहरलाल श्रीवास्तव जी को लगने लगा कि नासमझ बहू के रहते पवन बाबू की पढ़ाई-लिखाई तो चौपट हो जायेगी, तुरंत रत्तो के बापू को बुलाया गया। सब बातें समझाई गई, फिर कहा गया कि पढाई पूरी होने तक रत्तो मायके में ही रहेगी, उसके उपरांत उसे ससुराल बुला लिया जायेगा।

दोनों नवागंतुक प्रेम के दीवानों पर यह फैसला गाज बनकर गिरा। न तो किसी ने ब्याह में मर्जी पूछी और न दोनों को दूर करते समय। यही दौर था जब पवन बाबू प्रेम रस की धार बहाते हुई चिठ्ठी लिखा करते थे। पहले हर हफ्ते चिठ्ठी आती रही। फिर महीने में एक बार, फिर छठे-छमाहे।

पाँच साल बाद पवन बाबू परीक्षा पास करते ही ऑफिसर की नौकरी पा गये। रत्तो की आँखों में सुनहरे सपने सजने लगे कि अब वह पति के पास होगी। प्यार का सुनहरा संसार बसेगा कि वह गाज फिर गिरा जिसकी कल्पना भी रत्तो ने नहीं की थी।

चिठ्ठियों के बढ़ते अंतराल को वह पवन बाबू की बढ़ती व्यस्तता को मानती रही। वह यह नहीं समझ पाई कि यह दूरियाँ अब मन की दूरियों में तब्दील हो चुकी है। आज उस आखिरी चिठ्ठी को आए छह माह गुजर गये हैं जिसमें पवन बाबू ने लिखा है कि अब वे ऑफीसर की कैटेगरी में हैं और अनपढ़ पत्नी के साथ उनका गुजर-बसर नही हो सकता है अतः वे तलाक चाहते हैं, उनकी कोई गलती नहीं थी।

गलती उनके माता-पिताजी की है कि कच्ची उम्र में उनका ब्याह हो गया था और अगर रत्तो चाहे तो उनके साथ रह सकती है। वे गुजर-बसर के लिए हर महीने कुछ पैसे भेजते रहेंगे। रत्तो के प्रेम के घरौंदे की नींव इतनी कच्ची निकली कि किसी सुजाता वर्मा ने उसकी जगह पवन बाबू के जीवन में ले लिया जो उनके ही साथ पढ़ी थी और साथ ही नौकरी कर रही थी।

टूटे हुए सपनों के साथ रत्तो का रिश्ता और मजबूत होता जा रहा है। वह हर दिन उस आखिरी चिठ्ठी के साथ

अमरैया में इंतजार करती है कि डाकिया चाचा कहें कि रत्तो बिटिया, पवन बाबू का सनेसा आ गया है। अपने ससुराल जाने की तैयारी करो।

रत्तो जानती थी कि यह मृग-मरीचिका का भवँर जाल है जिससे वह कभी भी नहीं उबरेगी। यह वह प्यास है जो अब कभी बुझेगी नहीं। पर एक बार वह ऑफिसर पवन बाबू से पूछना चाहती थी कि अगर यह शादी उनकी गलती नहीं है तो क्या यह शादी रत्तो की गलती है ? और अगर उसकी भी गलती नहीं है तो सजा की हकदार

सिर्फ वही क्यों है ?


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