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Sushma Tiwari

Abstract

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Sushma Tiwari

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टूटते दायरे

टूटते दायरे

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वो सिर झुकाए खड़ी थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर गलती कहाँ हो गई उससे? जिसे वो घर - दुनिया समझती रही उनके ऐसे ठेकेदार भी निकलेंगे जो उसके सही गलत का निर्णय करेंगे।

"काट डालो इसकी शाखाएं! हमने जरा सी फलने फूलने की छूट क्या दी, ये तो चारो ओर अपने हाथ पांव फैला रही है। बहुत शौक है दूसरों को आसरा और छांव देने की, वो भी हमारे इजाजत और सिद्धांतो के खिलाफ जाकर, अब देखते हैं.. आइन्दा से अपने दायरे ना भूलना ।"

उसकी सारी शाखाएं काट दी गई। असहनीय पीड़ा तन में पर उससे भी असहनीय पीड़ा मन में "आह! मैं इतनी मजबूत होकर भी मजबूर क्यूँ हूं?"

फ़िर अंदर से आवाज़ आई "दुखी क्यूँ? बढ़ना और फिर जीवन बनना तुम्हारी प्रकृति और ये ही प्रकृति की प्रवृति है, तुम फिर बढ़ोगी, फिर फैलाओगी अपनी विशाल शाखाएँ और तय करोगी अपने दायरे।"


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