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कलमकार सत्येन्द्र सिंह

Abstract

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कलमकार सत्येन्द्र सिंह

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टिप

टिप

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होटल में खाने के बाद मैंने वेटर को सौ रुपया टिप में दिया.

“सौ रुपए आजकल होता ही क्या है...किसी का भला ही हो जाएगा...” – बेटे को समझाते हुए मै बाहर निकलने लगा.

वेटर भी अपनी शिफ्ट खत्म कर के बाहर आ गया था.

वैले से कार आने में समय लग रहा था.इसी बीच मैंने देखा कि वेटर के हाथ में एक दर्जन टॉफी...एक दर्जन केला और कुछ खिलौने थे...

वेटर का हाथ भरा हुआ था.उसके लिए सौ रुपये बहुत थे.मै धीरे से अपनी कार में बैठा और घर की तरफ बढ़ चला.


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