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Saroj Verma

Romance


4.5  

Saroj Verma

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तृप्ति--भाग(४)

तृप्ति--भाग(४)

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थप्पड़ खाते ही कमलनयनी रोते हुए गौरीशंकर के चरणों पर गिर पड़ी और रोते हुए बोली____"ये वासना नहीं है पुरोहित जी मेरा प्रेम गंगाजल की भाँतग पवित्र है,बस एक बार....एक ही बार आप मुझे अपने हृदय से लगा लेंगें तो मेरी आत्मा तृप्त हो जाएगी,इसके पश्चात मैं आपसे कभी भी कुछ नहीं माँगूगी।"परन्तु गौरीशंकर बोला___"अभी इसी समय यहाँ से चली जाओ,तुम्हारे मस्तिष्क में ऐसी बात आई भी कैसे

ये सुनकर कमलनयनी का मस्तिष्क शून्य पड़ गया ,उसी समय कमलनयनी ने किवाड़ खोले और बाहर निकल गई।।

प्रातःकाल हुई मयूरी जागी,कमलनयनी को अपने कक्ष में ना देखकर कुछ चिन्तित सी हो उठी,उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि रात्रि को कुछ अवश्य हुआ है,क्योंकि कमलनयनी बहुत देर तक जाग रही थी,उसे निंद्रा नहीं आ रही थी,उसका मन कुछ व्याकुल सा था,मयूरी ने सोचा मुझे इस विषय में पुरोहित जी से ही बात करनी चाहिए और वो अपने प्रश्नों के उत्तर पूछने पुरोहित जी के पास पहुँची____

"पुरोहित जी! कमलनयनी कहाँ हैं? आपको कुछ ज्ञात है,"मयूरी ने पूछा।।

"हाँ ! रात्रि को कमलनयनी क्रोधित होकर चली गई थी,परन्तु इसमें मेरा कोई दोष नहीं है," गौरीशंकर बोला।।

" परन्तु कहाँ,"मयूरी ने पूछा।।

"मुझे ज्ञात नहीं,"गौरीशंकर बोला।।

इतना सुनकर मयूरी भी क्रोधित होकर गौरीशंकर के घर से चली आई और कमलनयनी को ढ़ूंढने लगी,मयूरी ने कमलनयनी को बहुत खोजा किन्तु वो उसे कहीं ना मिली,परन्तु साँझ ढ़ले मयूरी को कमलनयनी एक वृक्ष के तले अचेत अवस्था में मिली,मयूरी ने कमलनयनी के मुँख पर जल के छींटे डाले और कमलनयनी की चेतन अवस्था में आने की प्रतीक्षा करने लगी,कुछ समय पश्चात कमलनयनी जब चेतन अवस्था में आई तो मयूरी उसे राजमहल ले गई।।

परन्तु राजमहल जाकर ज्ञात हुआ कि राजा कर्णसेन ने कमलनयनी को राज्य से बाहर जाने का आदेश दिया है,ये सुनकर कमलनयनी ने मयूरी से कहा कि अन्तिम बार राजा से भेंट करके आते हैं,कमलनयनी राजा से भेंट करने पहुँची और राजा क्रोधित होकर बोले___"तुम्हारे जैसी बिना राग-रंग की स्त्री की इस राजमहल को कोई आवश्यकता नहीं है।"

"ये कहकर आपने मेरी दुविधा हल कर दी,मैं भी यही चाहती थी राजन! मैं इस सांसरिक मोह- माया को त्यागना चाहती हूँ,अब मैं मीरा की भाँति जोगन बन गई हूँ,इस महल और राग-रंग से अब मेरा कोई नाता नहीं है," अच्छा राजन! चलती हूँ,यदि मुझसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा करना,ईश्वर सदैव तुम्हारे ऊपर कृपा बनाएं रखें और इतना कहकर दोनों ने महल का त्याग कर दिया,उन दोनों ने देखा कि श्याम भी चला आ रहा है,श्याम दोनों के निकट पहुँचा और बोला___

"मैं भी तुम लोगों के ही संग चलूँगा।" तीनों महल छोड़कर चले आए,मयूरी ने पूछा__

"अब कहाँ चलेंगें?"

" मुझे ज्ञात नहीं,परन्तु यहाँ से जानेसे पहले मैं अन्तिम बार पुरोहित जी के दर्शन करना चाहती हूँ,नहीं तो इन नैनों को चैन ना आएगा," कमलनयनी बोली।।

"देवी! इतना अपमान करवाने के पश्चात भी आपका जी नहीं भरा,अब मैं कुछ नहीं जानती ,आपको जो उचित लगे तो कीजिए," मयूरी क्रोधित होकर बोली।

अब श्याम को अनुभव हो रहा था कि कदाचित कमलनयनी प्रेम की गहराई को समझ चुकी है,अब उसे ये ज्ञात हो चुका है कि प्रेम एक तपस्या है जो कि केवल सच्चे हृदय में ही वास करती है,अब ऐसा प्रतीत होता है कि अब उसने पुरोहित जी के प्रेम में जोगन रूप धर लिया है,कमलनयनी का प्रेम वास्तविक है और मेरें प्रेम से कहीं अधिक ऊँचा है ,कदाचित मैं अब कभी भी अपना प्रेम उसके सामने प्रकट नहीं कर पाऊँगा,क्योंकि ये मुझसे कदापि ना हो पाएगा ,अब ये सम्भव ही नहीं है कि कमलनयनी मेरा प्रेम कभी स्वीकार करेगी,परन्तु उसकी ऐसी दशा देखकर मुझे उस पर दया भी आ रही है।।

अब तीनों गृहविहीन हो गए थे और राज्य की गलियों में भटक रहे थे,ना संग में कोई पूँजी थी और ना ही भोजन बनाने हेतु सामग्री,सबकी स्थिति बहुत ही बुरी हो चली थी,तीनों भूख से भी व्याकुल थे जैसे तैसे एक मंदिर में रात्रि बिताई,प्रसाद खाकर संतुष्टि कर ली और दूसरे दिन सुबह श्याम बोला।।

"बगल वाले गाँव में मेरा एक मित्र रहता है,मैने अपनी कुछ पूँजी उसके पास जमा कर रखी है,मैं उसके पास से अपनी पूँजीं लेकर आता हूँ,तुम लोग मुझे नदी के निकट जो बरगद का वृक्ष वहीं मिलना,मैं सन्ध्या तक लौट आऊँगा,जीवन यापन के लिए कुछ उपयोगी वस्तुओं तो खरीदनी ही पड़ेगी,"इतना कहकर श्याम चला गया।।

कमलनयनी बेसुध सी थी,वो गौरीशंकर की एक झलक पाना चाहती थी,तभी वो ये राज्य छोड़कर जा पाएगी और वो मयूरी के संग गौरीशंकर के घर की ओर चल पड़ी।।कुछ ही समय पश्चात दोनों गौरीशंकर के घर के द्वार पर खड़ी थीं,तभी मयूरी ने कमलनयनी से कहा ___द्वार की साँकल खटखटाने से पहले एक बार और विचार कर लीजिए।।

"अब इसमें विचार करने योग्य जैसा क्या है?मैं अन्तिम बार उनका मुँख देखना चाहती हूँ",कमलनयनी बोली।।

"ठीक है,आप जैसा चाहें,अब मैं क्या कहूँ"और इतना कहकर मयूरी ने किवाड़ की साँकल खटखटाई।।

भीतर से गौरीशंकर ने पूछा__"कौन है?"

"पुरोहित जी! मैं हूँ मयूरी! कृपया कर किवाड़ खोलिए,कमलनयनी इस राज्य से जाने से पहले आपके दर्शन करना चाहतीं हैं",मयूरी बोली।।

"परन्तु मैं किसी से भी मिलना नहीं चाहता,मैं उसका मुँख भी देखना नहीं चाहता,"गौरीशंकर बोला।इतना सुनकर ,कमलनयनी स्वयं पर संयम ना रख पाई और रोते हुए चिल्लाई___

"पुरोहित जी! कृपया किवाड़ खोलिए,मुझे क्षमा कर दीजिए,बस एक बार आपका मुँख देखकर चली जाऊँगीं,भविष्य में कभी आपके जीवन में प्रवेश नहीं करूँगीं।"

परन्तु गौरीशंकर का हृदय तो पाषाण हो चुका था,उसे कोई भी अन्तर ना पड़ा,उसने किवाड़ नहीं खोले।।उधर कमलनयनी किवाड़ खटखटा कर दुर्दशाग्रस्त होती रही,भूखी प्यासी गौरीशंकर के द्वार पर पड़ी रही रो रोकर उसकी आँखें रक्त के समान लाल हो गईं,किन्तु गौरीशंकर का हृदय द्रवित ना हुआ,

सन्ध्या होने को आई किन्तु गौरीशंकर के दर्शन कमलनयनी को ना हुए,तब मयूरी कमलनयनी से बोली___

"चलिए,उठिए! यहाँ से,श्याम आता ही होगा और आपकी ये दशा उससे देखी नहीं जाएगी।"

तब विवश होकर कमलनयनी को गौरीशंकर के द्वार से उठना पड़ा और वे दोनों श्याम की बताएं हुए स्थान पर पहुँच गईं।।कुछ समय की प्रतीक्षा के उपरांत श्याम कुछ सामग्री और पूँजी के संग उसी स्थान पर पहुँचा।।कमलनयनी अभी भी उसी दशा में थी,जिस दशा में वो उसे छोड़कर गया था,उसकी आँखों से अभी अश्रु बह रहे थे,वो मयूरी से बार बार पूछ रही थी ___

"मैने ऐसा कौन सा पाप कर दिया कि पुरोहित जी ने किवाड़ नहीं खोले,वें मेरा मुँख भी देखना नहीं चाहते,मुझे मेरे प्रश्नों का उत्तर अभी तक नहीं मिला और मेरे प्रश्नों का उत्तर मिले बिना मेरा व्याकुल मन सदैव अशांत ही रहेगा।"

इतना सुनते ही श्याम क्रोधित होकर गौरीशंकर के निवास स्थान पर पहुँचा और किवाड़ खटखटाएं,गौरीशंकर ने ही किवाड़ खोले,किवाड़ खोलते ही श्याम ने गौरीशंकर से पूछा___"पुरोहित जी! आप कमलनयनी के संग ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?कमलनयनी आपसे प्रेम करने के पश्चात क्या से क्या बन गई,जिसे स्वयं के साज श्रृंगार से कभी समय नहीं मिलता था कि किसी और पर भी ध्यान दे,जो लोंगो पर हँसा करती थी,अपने घमंड और अहम में खोई रहती थी,वो भला किसी व्यक्ति के प्रेम मेँ इतनी व्याकुल हो सकती है,ये मैनें कभी भी नहीं सोचा था,वो आपसे सच्चा प्रेम करती है,कृपया उसके प्रेम को स्वीकार करें,नहीं तो उसकी आत्मा तृप्त नहीं होगी"

"मैं भी उससे प्रेम करता हूँ,सच्चा प्रेम ! किन्तु अब कदाचित कभी भी मैं उससे प्रेम नहीं कर पाऊँगा क्योंकि अब वो मेरे प्रेम के नहीं,बल्कि मेरी पूजा अर्चना के योग्य है,आपसे प्रेम करके उसकी आत्मा शुद्ध हो गई है,अब वो पहले वाली कमलनयनी नहीं रहीं जो बात बात पर क्रोधित हो जाती थी,अब उसके अन्तरात्मा में देवी का वास हो चुका है,उसका हृदय और उसकी आत्मा दोनों ही पवित्र हो चुके हैं।"

तब गौरीशंकर बोले___"मित्र!मैं विवश हूँ,अत्यधिक लाचार हूँ,आप मेरी मनोदशा को समझने का प्रयास करें,मुझे मेरे बहुत से कर्तव्यों का पालन करना है,मेरी वृद्धा माँ,मेरी लकवाग्रस्त पत्नी और दो वर्ष का पुत्र है,मेरा उनके प्रति भी तो कोई कर्तव्य है,यदि मैं कमलनयनी को स्वीकार कर लूँगा तो ये संसार मुझ पर हँसेगा कि देखों कि ये कैसा व्यक्ति है,जो अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर रहा,एक नर्तकी से प्रेम कर बैठा ,भोग विलास में डूब गया,ऐसा नहीं है कि मैं कमलनयनी से प्रेम नहीं करता,मैं ने जब उसे पहली बार देखा था तो उसे देखते ही अपना हृदय हार बैठा था,किन्तु मुझे अभी बहुत से कर्तव्य निभाने हैं,मैं अभी उसे स्वीकार नहीं कर सकता,उससे कहिए कि वो मेरी प्रतीक्षा करें,एक दिन मैं अवश्य आऊँगा और अपना प्रेम स्वीकार करूँगा।"

श्याम को गौरीशंकर का उत्तर सुनकर संतोष हो गया और वो गौरीशंकर के घर से चला आया और वापस आकर कमलनयनी से सब कह दिया।।

कमलनयनी को श्याम की बातें सुनकर सान्त्वना मिल गई।।रात्रि को तीनो ने वहीं भोजन पकाया और वहीं वृक्ष तले ही आसरा लिया।।


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