सुनिए : सैनिक की विधवा की कहानी खुद उसकी ज़ुबानी
सुनिए : सैनिक की विधवा की कहानी खुद उसकी ज़ुबानी
मैं एक सैनिक की विधवा हूं। आप लोग पूछेंगे की मेरा नाम क्या हैं ? और मैं कहूंगी ," नाम में क्या रखा हे ? वैसे भी हमारे गांव की 90 प्रतिशत औरतों के नाम गांव बालों को मालूम नहीं हैं। जब गांव में चुनाव होते हैं और वोटर पर्ची आती हैं। तब पता चलता हैं की फलाँ मर्द की औरत का नाम फलाँ हैं। बाकी तो उसका नाम फलाँ की बहू, फलाँ की माँ से ही चलता रहता हैं। औरत को इस समाज ने बंधुआ मजदूर बना रखा हैं। वो अपनी इच्छा से कुछ कर ही नहीं सकती। हर जगह उस पर पुरुष का अधिकार रहता हे। यह पुरुष उसका बाप चाचा ताऊ पति और बेटा हो सकता हैं।
गांव से याद आया की अब आप यह पूछेंगे, ” मैं किस के यहाँ पैदा हुई। किस गांव में पैदा हुई। कान्हा मैं ब्याही गयी और मेरे मर्द का नाम क्या था ?” हालांकि यह सब पूछने की आपको ना तो जरूरत हैं और ना ही आवश्यकता किन्तु आप समाज हो और उंगली करना आपका काम हैं।
मेरा गांव राजस्थान के बाड़मेर जिले में हैं। मेरे गांव के पास के ही गांव में मेरी शादी हुई थी। माँ कहती थी की मैं बहुत ही जल्दी बड़ी और जवान होती जा रही थी। माँ बाप बहुत परेशान रहते थे और मेरी जल्दी से जल्दी शादी करना चाहते थे। वैसे भी एक गरीब माँ बाप की बेटी बहुत जल्दी सयानी और जवान हो जाती हैं। गांव के पड़ोस में ही एक गांव था। लड़का फौज में इंजीनियरिंग ब्रांच में था और मैं ब्याह कर उसके गांव चली गयी थी।
मेरा मर्द बहुत ही हंसमुख व्यवहार कुशल था। मुझे बहुत ही प्यार करता था। शादी के दो महीने बाद ही मैं प्रिग्नेंट हो गयी। मैं तो ज्यादा दुनियादारी के बारे में जानती ही नहीं थी। मैं अठारह के शुरू में थी और मेरी शादी कर दी गयी। मेरे प्रिग्नेंट होने पर मेरा मर्द बहुत ही खुश रहता था। वो मुझे अपने पास बैठा लेता था। मैं अपना सर उसके सीने पर रख देती थी और वो मुझे बड़े बड़े सपना दिखाता था।
वो कहता था," जब हमारा बच्चा एक साल का हो जाएगा। तुम मेरे साथ मेरी यूनिट चलना। वहां फेमिली क्वार्टर होते हैं। सेंट्रल स्कूल होते हैं। हम अपने बच्चे को खूब पढ़ाएंगे।” वो कहता था, "तुम बहुत सीधी हो। तुम गांव से बहार कहीं गयी नहीं हो। मैं तुम्हें घुमाऊंगा। दिल्ली जाएंगे। राष्ट्रपति भवन, पार्लियामेंट राज घाट आदि बहुत सारी जगह आपको दिखायेंगे।”
फिर वो मुझे छोड़ कर अपनी यूनिट चला गया। कुछ समय बाद उसकी यूनिट कारगिल चली गयी। वो रोजाना फ़ोन करता था और कहता था ," तुम चिंता मत करो। मेरी कमांडर साहब से बात हो गयी हैं। उन्होंने मुझे छुट्टी देने का वायदा कर लिया हे। जो बच्चे की डिलीवरी डेट होगी उससे एक दो दिन पहले मैं तुम्हारे पास पहुँच जाऊंगा।"
किस्मत भी बड़ी अजीब होती हैं। हम और कुछ चाहते हैं और ईश्वर उसका उलटा कर देता हैं। इधर मेरी डिलीवरी हो रही थी और उधर मेरा मर्द कारगिल के युद्ध में शहीद हो गया था। कितना बदनसीब था मेरा मर्द। मरने से पहले वो यह भी नहीं सुन पाया कि वो एक बेटे का बाप बन गया हैं।
मेरी डिलवरी के तीन दिन बाद उसकी डेड बॉडी गांव आयी। मैंने आर्मी के लोगों से बहुत प्रार्थना की कि मेरे मर्द की सूरत आखिरी बार दिखा दो। आर्मी के लोग बोले, " तोप का गोला सीधे सर पर आकर गिरा हैं। शरीर पूरी तरह क्षत विक्षत हो गया हैं। हमें दुःख हे कि हम आपको उनका चेहरा नहीं दिखा सकते।" और इस तरह मैंने अपने मर्द को उसका चेहरे देखे बिना विदा किया। मेरे मर्द को उसकी बहादुरी के लिए उसकी मृत्यु के बाद सम्मान पत्र मिला था उस को लेने के लिए मैं अपने देवर के साथ दिल्ली राष्ट्रपति भवन गयी थी। पहली बार मैंने अपने पैर गाँव से बहार निकले थे और शहर देखा था। मेरा मर्द कहता था कि वो मुझे दिल्ली घुमायेगा। मैं दिल्ली उसके साथ तो ना घूम सकी, उसकी वजह से घूम सकी।
मर्द की मौत के एक साल तक तो सब शांत रहा और उसके बाद समाज के ठेकेदार वगैरह मुझसे पूछे मेरी किस्मत का फैसला करने आ गए। मेरे माँ बाप और मेरे मर्द के माँ बाप मेरे पास आये और बोले, " देख छोरी जितना दुःख का पहाड़ तुझ पे टूटा हैं। उससे ज्यादा हम पर टूटा हैं। हमने अपना जवान बेटा खोया हैं। हम चाहते हैं कि तुम विधवा का लिबास छोड़ कर सुहागन का लिबास पहनो। तुम्हारे बेटे की परवरिश भी अच्छी से हो जायेगी। सरकार से जो अस्सी लाख मिलने बाले हैं वो भी घर पर ही रहेंगे। हमारे छोटे बेटे और अपने देवर से शादी कर लो। वो तुमसे सिर्फ दस साल छोटा हैं।।”
आप सोच रहे होंगे कि मैंने क्या बोल होगा। तब आप हमारी जैसी ग्रामीण औ तो की स्थिति नहीं जानते हैं। हम में और पालतू गाय में ज्यादा अंतर नहीं हैं। जैसे गाय को किसी भी खूंटे पर बंधा जा सकता हैं। बस वैसे हमें भी कहीं पर रखा जा सकता हैं। अब मैं भी क्या कर सकती थी ? अगर किसी का नसीब खोटा हे तो क्या किया जा सकता हैं ? जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही में विधवा हो गयी। कम उम्र की सुंदर विधवा को भी यह समाज जीने कान्हा देता हैं। कम से कम यह घर तो मेरा जान पहचान का हे। सब अच्छे लोग हैं। मेरे बेटे की परवरिश अच्छी हो जायेगी। मेरे मर्द का पैसा उसके माँ बाप और उसके बेटे के काम आ जाएगा।
बस मन एक ही बात को लेकर परेशान हे। जिस देवर को मैंने अपना बेटा समझा उस को अपना मर्द कैसे मानूँ ? फिर सोचती हूँ कि दुनिया एक रंग मंच है और हम भाँति भाँति के किरदार। एक किरदार भाभी का था जो मैं अपने देवर के साथ निभा रही थी और अब मेरा किरदार बदल गया हैं। अब मैं अपने देवर की पत्नी हूँ और मेरा देवर मेरा मर्द हैं।
