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Lokesh Gulyani

Romance

4  

Lokesh Gulyani

Romance

सुमि (लघुकथा)

सुमि (लघुकथा)

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कई रात लगातार जागने से उसकी आँखों के नीचे काले गड्ढे पड़ गये थे। आज फैंसले की सुबह थी। दीवार से सिर टिकाये पलंग पर बैठी-बैठी वो पूरी रात मोबाइल को उठाती और नीचे रखती रही थी। रविश टूर पर था अक्सर अपने काम से बाहर ही रहता था। उसके पीछे रह जाती थी अकेली सुमि इस नये और अनजान शहर में। वैसे इन दिनों सुमि के अंदर से कोई दूसरी ही सुमि बाहर निकल आयी थी, और कहीं दूर तक चली गयी थी। वहाँ से आगे जाना है या लौटना है, यही कशमकश उसे जगाये रखती थी।

इसके पीछे वजह थी वो मुलाक़ात जो उसके एप्पल फ़ोन के ख़राब हो जाने से हुई थी। राज से वो एप्पल स्टोर के कस्टमर केयर पर मिली थी। वो एक छोटी मुलाक़ात थी। जहाँ वो एक कस्टमर थी और राज एक सर्विस इंजीनियर। कोई पार्ट मिसिंग था उस दिन, इसलिए काम पूरा नहीं हुआ। सुमि को बाद में आने को कहकर राज ने सुमि का नंबर मांग लिया था। उस दिन से ही दोनों के मोबाइल नंबर्स आपस में जुड़ गए थे। वो जुड़ाव नंबर्स से कब दिल पर घंटी देने लगा, पता ही नहीं चला। सुमि राज के साथ बहती चली गयी। फ़ोन पर बातें बढ़ कर मुलाक़ातों तक पहुंची और फिर एक दिन जिस्मानियाँ दूरियाँ मिटने के बाद जैसे सुमि नींद से जागी। उसे खुद पर बहुत आश्चर्य हुआ और ग़ुस्सा भी आया। उसी दिन से उसने राज से दूरियाँ बना ली। राज ने बहुत फ़ोन और मैसेज किये, पर सुमि ने पलट कर कोई जवाब न दिया। कल रात भी राज का मैसेज आया हुआ था जिसने सुमि को पूरी रात से जगा रखा था। 

राज ने लिखा था "बहुत हुआ सुमि, ऐसा भी क्या हो गया। इतना क्यों सता रही हो? क्या तुमने वो महसूस नहीं किया, जो मुझे महसूस हुआ। माना हमने हदें पार की पर प्यार में ही न सुमि। आ जाओ अपने राज के पास वापस आ जाओ प्लीज।"

यूँ तो सुमि रात से सैंकड़ो बार उस मैसेज को देख चुकी थी पर फिर एक आख़िरी बार हसरत से उसने एक-एक शब्द पढ़ा और उस पर हौले से अपनी उँगलियाँ भी फेरी। आखिरकार उसने एक ठंडी सांस ली और अपनी आँखें स्क्रीन में गड़ा दी, उसकी उँगलियाँ मोबाइल के कीपैड पर थिरकने लगी।

"कुछ पल के लिए वो सुमि बन गयी थी जिसे काफ़ी पीछे छोड़ आयी थी। भूल गयी थी कौन हूँ, क्या हूँ। हदों में रहना बेहद मुश्किल है। अब जानती हूँ पर मुझे रहना होगा। जिस सुमि को तुम जानते थे ना राज, वो हार गयी! उसे किसी और सुमि ने हरा दिया। मैं हमारी यादें लिये तुम्हें भूल रही हूँ। कितनी पागल बातें कर रही हूँ न मैं। तुम खुश रहना मैं भी कोशिश करुँगी, लापता सुमि।"

उस सुबह, एक सुमि खो गयी थी, एक सुमि लौट आयी थी।


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