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V. Aaradhyaa

Comedy Action Thriller

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V. Aaradhyaa

Comedy Action Thriller

सो कंफ्यूज्ड

सो कंफ्यूज्ड

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जब भी श्रीमान जी या बच्चों से पूछो कि,

"आज खाने में क्या बनाऊं?"

तो हमेशा की तरह वही रटा रटाया जवाब आ जाता है कि,

"कुछ भी बना लो!"


अब ये कुछ भी ही तो सारे फसाद की जड़ है। और बहुत बड़ा टाइम कीलर है ये कुछ भी।

जब कभी किसी से खाने की बाबत पूछो तो वह तो यह कहकर बरी हो जाते हैं।


मुसीबत तो अपनी होती है ना...!


अरे... मतलब हम गृहनियों की मुसीबत है और क्या....?


पहले तो रसोई में जाकर देर तक सोचो कि क्या बनाएं...?


फिर कुछ सोच के बनाने जाओ तो फिर मन में शंका होती है कि पता नहीं सबको पसंद आएगा कि नहीं...?और जब बना लो तो सब कहेंगे,


"अरे! यह क्या बना लिया? लो कर लो बात। खुद तो बताते नहीं और जो हम बनाते हैं वह इन्हें समझ आता नहीं!"


कभी-कभी तो गुस्से से बोलने का मन करता है कि,

" जाओ खुद ही जाकर किचन में बना लो ना अपने पसंद की सब्जी !"

यूं तो हमारे श्रीमान जी को जो बना लो बड़ी खुशी खुशी नहीं खाते।

यानी कि टीका टिप्पणी करते हैं।


पर मैंने अचानक गौर किया कि पिछले दो दिनों से उन्हें खाने पर जरा भी ध्यान नहीं है यहां तक कि बच्चे बदमाशी कर रहे होते हैं उस पर भी उनका ध्यान नहीं जाता।और पिछले दिनों से जो भी खाना बना कर दिया चुपचाप खा लिया करते और फिर लैपटॉप लेकर बिजी हो जाते।


उनकी यह हरकत देखकर मेरे मन से आवाज आई कि...

हो ना हो इनके ऑफिस में जरूर कोई बड़ी बात चल रही है।

या कोई टेंशन चल रहा है।

और नहीं तो शायद

प्रमोशन रुका पड़ा है।

या इंसेंटिव नहीं मिल रहा है।

खैर... जो भी हो आज तो पूछ कर ही रहूंगी।


वैसे इतना तो मैं समझ ही गई थी कि... इनके

शायद ऑफिस में कोई गहरी टेंशन चल रही थी।


क्योंकि कई बार मैंने चीनी चाय में खूब ज्यादा चीनी डालकर और कम डाल कर भी देखा। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। सब्जी में मिर्च नमक ज्यादा करके कम करके भी देखा यह अपने ख्यालों में खोए रहे। पर जरूर कोई गहरी बात है मेरे मन से आवाज आई।


कभी मेरे मन ने मुझसे चुगली की कि,

कहीं किसी दूसरी औरत का चक्कर तो नहीं...?


वरना सब्जी में मिर्च ज्यादा है या कम तो पता चल ही जाता।

बस क्या था...

उनका मोबाइल खंगालना चालू हो गया।

और जब वह सो जाते तो मैं चुपके से उनका मोबाइल खोलती लैपटॉप में सुराग ढूंढने की कोशिश करती पर कोई भी सुराग नहीं मिला।


उल्टा मुझे इतनी खुशी हुई कि इन्होंने मेरी शादी के समय का फोटो भी अपने लैपटॉप का वॉलपेपर और स्क्रीन सेवर बना रखा था। और मोबाइल की गैलरी में भी कई सारे मेरे अच्छे फोटो थे मुझे देख कर अपने पतिदेव पर बहुत ही प्यार आया।


अब प्यार आ ही गया।

यूँ तो प्यार जताना जरूरी था।


इसलिए उस दिन मैंने उनके लिए बड़े ही प्यार से पनीर के कोफ्ते बनाए और फ्राइड गोभी और आलुदम जो इन्हें बहुत पसंद है। इतना बनाकर जो मैंने डायनिंग टेबल पर रखा तो अचानक उन्होंने मोबाइल से सिर उठाया और बोले,


वाह रीतू! फ्राइड गोभी मुझे कितना पसंद है तुमने कितने दिनों के बाद बनाया!"


अब तो मेरा सर घूम गया। दो दिन पहले ही तो है मैंने खिलाया था। इन दिनों में कहां खोए थे… और आज कैसे होश में आ गए... यह भी पता लगाना जरूरी था।


जल्दी ही मुझे इस बात का पता लग गया। असल में पति के ऑफिस में इनकम टैक्स रिटर्न भरना था। और वह बार-बार परेशान हो रहे थे इसलिए उनका ध्यान ना तो खाने पर था ना मुझ पर था। और ना ही रसोई से जुड़ी किसी और बात पर।


मतलब किसी चुड़ैल का कोई चक्कर नहीं। किसी परी का इनके दिमाग पर कब्जा नहीं।


चलो....इतना तो अच्छा रहा कि,

अब यह खाने में कुछ पूछने पर जब यह कहते हैं कि,


" कुछ भी बना लो"


तो जब मैं आंखें तरेर कर देखती हूं तो किसी सब्जी का नाम जरूर बता देते हैं इससे मेरा काम भी आसान हो जाता है और कुछ भी बनाओ या क्या बनाऊं से छुटकारा मिल जाता है।


बस यही छोटी सी मेरी बात है कि,


कभी-कभी पति जब परेशान होते हैं तो उन्हें मोहनभोग भी अच्छा नहीं लगता और जब माइंड से फ्री होते हैं, खुश होते हैं तब तो उन्हें करेले भी अच्छे लगते हैं।


कुल मिलाकर बात यह है कि पतियों के मन में क्या चल रहा है...?


हम पत्नियों के लिए यह पता लगाना बहुत ही आसान है। अगर ऑफिस का कोई टेंशन है तब झड़प देंगे। तब उन्हें खाने में क्या दिया जा रहा है उसका होश नहीं रहता।


और जो अगर....


कोई परी उनके दिल दिमाग पर छाई हुई है तब वह ज्यादा मीठा बोलने लग जाते हैं। और जो भी नहीं जो बना दो वह बड़े शौक से खाते हैं और कहते हैं तुम्हारे हाथ में तो जादू है।


वह तो भला हुआ कि उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि,


" मैंने बहुत अच्छा खाना बनाया!"


मतलब उनके दिमाग में मैं ही में छाई हुई हूं।

मतलब कि जब कोई से सौतन का चक्कर नहीं है तो मुझे काहे की फ़िक्र...?


रहा करे ऑफिस का टेंशन... मुझे क्या...?


मैं तो कुछ भी बना दूंगी...

और वह कुछ भी खा लेंगे...

और कुछ भी सोच कर खुश हो जाएंगे।


(समाप्त )



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