Ramashankar Roy

Inspirational


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Ramashankar Roy

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समझ का फेर

समझ का फेर

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एक छोटे नगर में एक बड़ा सेठ रहा करता था। उनका नाम था धनपत सेठ। सेठ जी बड़े ही मिलनसार वह धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। नगर में कुछ भी आयोजन हो तो वह बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे और दिल खोलकर चंदा देते थे। लोगों का उनपर इतना भरोसा था की यदि वह बोल दे की अमुक चीज खरीदना फायदेमंद या सेहतमंद नहीं है तो लोग उसका एक तरह से बहिष्कार कर देते थे।

सेठ जी का मानना था कि व्यापारी को मुनाफा कमाना चाहिए लेकिन उतना ही जितना ग्राहक को बोझ और मजबूरी नहीं लगने लगे। उनके गुडविल पर कारोबार काफी बड़ा हो गया था। उनके तीन बेटे थे - सोनपत, मणीपत और रत्नपत। तीनों ही योग्य और काबिल थे। धीरे धीरे धनपत सेठ की उम्र ढलती गयी और बेटों ने कारोबार को अच्छे से संभाल लिया। सेठ जी ने एक तरह से रिटायरमेंट ले लिया। अब उनका अधिकतर समय भगवद भजन और पूजा पाठ में व्यतीत होने लगा। बढ़ती उम्र के चलते स्वास्थ भी गिरने लगा। जब उनको महसूस हुआ कि अब चलती चलान्ति का समय आ गया है और वो मृत्यु शय्या पर पड़े थे तो उन्होंने अपने बेटों को बुलाकर कहा कि बेटा मैं अब इस दुनिया से प्रस्थान करने वाला हूँ। तुम लोग आपस में मिल जुलकर रहना। कारोबार में अपनी मुनाफा के लिए ग्राहक की जेब के साथ नाइंसाफी मत करना। यदि किसी समय तुम लोग अपने आप को आर्थिक तंगी की चिचिलाती दोपहरी में पाओ तो जो मैंने शिव मंदिर बनाया है उसके गुम्बद के नीचे काफी दौलत रखा है, तुम लोग ले लेना। लेकिन यह काम कभी भी लोभवश मत करना। जब घोर संकट हो तभी इस विकल्प को अपनाना।

इतना कहते ही सेठ जी के प्राण पखेरू उड़ गए। घर शहर रिश्तेदार सभी शोक संतप्त हो गए। लेकिन जैसे हर किसी का एक अनजान तारीख को जाना तय है उसी तरह सेठ जी भी अपनी अज्ञात नियत तिथि को प्रस्थान कर गए। कुछ दिन में सब कुछ नॉर्मल हो गया। वक्त के साथ सेठ की यादें और उनकी बातों का प्रभाव भी धूमिल होने लगा। बिजनेस का तौर तरीका भी काफी बदल गया। ऑनलाइन शॉपिंग, होम डिलीवरी, डिजिटल पेमेंट जैसे नए कांसेप्ट में सेठ जी का फैलाया हुआ कारोबार धीरे धीरे सिकुड़ने लगा और परिवार का कुनबा बढ़ता गया। एक समय ऐसा भी आया कि उनके परिवार को पैसे की तंगी महसूस होने लगी। इसी बीच छोटा बेटा को एक रोज ध्यान आया कि पिताजी ने कहा था कि मंदिर के गुम्बद में धन छिपाकर रखा है। इस बात का ध्यान आते ही तीनों भाइयों ने निर्णय किया कि गुम्बद में छिपे धन को निकालना जरूरी हो गया है ताकि परिवार की माली स्थिति को सुधारा जा सके। फिर गुम्बद तोड़ दिया गया लेकिन कोई धन नहीं मिला।

सभी लोग निराश बैठे थे कि पिता जी की बनाई मंदिर के गुम्बद को तो तोड़ दिया लेकिन कोई धन नहीं मिला। कोई भी यह मानने को तैयार नहीं था कि पिता जी ने झूठ कहा होगा। इसमें जरूर कोई बात है जिसमें हमारी समझ का फेर है। तभी बड़ी बहू ने कहा कि पिताजी के करीबी मित्र चंदूलाल जी अभी जिंदा हैं। शायद उनको कुछ आईडिया होगा क्योंकि वो अपनी सारी बात उनसे साझा करते थे। वो इस मामले में हमारी मदद कर सकते हैं।

अगली सुबह तीनो भाई चंदूलाल के घर पर पहुँच गए। उनलोगों पिताजी द्वारा कही बात को उनको अक्षरशः बताया और मदद की गुहार की। चंदूलाल जी ने उनकी बात को ध्यानपूर्वक सुना और कहा की आपलोग जाओ और पहले उस गुम्बद को फिर से बनवा दो और जब वह तैयार हो जाएगा मुझे बताना। उसके बाद मैं आपको भरसक मदद करने का प्रयास करूँगा।

इन लोगों ने आननफानन में मंदिर का गुम्बद फिर से यथावत दो दिन के अंदर बनवा दिया। इसकी सूचना जब सोनपत ने चंदूलाल जी को दिया तो उन्होंने कहा कि "मैं कल बारह बजे तुम्हारे घर पर आकर बताऊँगा की धनपत ने दौलत कहाँ छिपा रखा है !

तीनों भाइयों ने आँखों में ही रात गुजारी। अगले रोज चंदूलाल जी नियत समय से आधा घंटा पहले ही पहुँच गए। सब को यह उत्सुकता थी कि चंदूलाल काका क्या बताने वाले हैं। उनके पहुँचते ही उन लोगों ने आग्रह किया कि अब तो बता दीजिए। चंदूलाल ने कहा तुम लोग बारह बजने तक का इंतजार करो और फावड़ा कुदाल लेकर तैयार रहना।

जैसे ही बारह बजा चंदूलाल ने गुम्बद की परछाई को जमीन पर रेखांकित किया और बोला तुम लोग यहाँ खुदाई करो।

वहाँ खुदाई करने पर एक पीतल का कलश मिला जिसमें हीरा मोती और स्वर्ण गीली रखी हुई थी। अब वो फिर से अमीर बन गए थे।

लेकिन उनको आश्चर्य हो रहा थ की यह बात चंदूलाल काका को कैसे पता चला कि यह कलश यहीं पर छुपा हुआ है। उन तीनों ने उनसे बताने का आग्रह किया।

चंदूलाल जी ने कहा तुम लोगों ने धनपत सेठ के शब्दार्थ को समझा भावार्थ को नहीं साझा। भला वह कभी भी मंदिर का गुम्बद तोड़ने की बात कर सकता था, बिल्कुल नहीं !! उसने चिलचिलाती दोपहरी का जिक्र किया था।

यह मात्र समझ का फेर है क्योंकि जिंदगी में शब्दार्थ से ज्यादा भावार्थ का महत्व होता है।

"चलता है" एक सामान्य बोलचाल का शब्द है लेकिन कब किसने किससे किस अंदाज में कहा , उससे इसका भावार्थ बदल जाएगा।



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