समाधान
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"वाह! दीदी, आपने तो महिनों की समस्या मिनटों में सुलझा दी। अब तो कलह-क्लेश बिलकुल भी सुनाई नहीं देता है।" आए दिन पड़ोसी के घर में होने वाले कलह से परेशान राधा ने उसी शहर में रहने वाली अपनी बड़ी बहन से कहा। "चलो 'अंत भला तो सब भला'। मेरा तर्क काम आया।" "लेकिन दीदी आपने ऐसा क्या कहा? कि उनका एक दूसरे के प्रति हृदय परिवर्तित हो गया।" "वैसे यह तुम खुद भी सुलझा सकती थी।" "प्रयत्न तो किया था, दीदी।" "फ़िर?" "जब हम लोगों ने उनसे निवेदन किया, कि आप लोगों की आवाजें पूरे मोहल्ले में गूँजती है, तो उन्होंने बहुत-ही कठोरता से कहा- "आती है तो आए, हमें उससे क्या? हम घर के अंदर कुछ भी करें, कहें इससे बाहर वालों को क्या मतलब।" "दीदी, बता भी दो न इस शांति का राज क्या है?" सीमा ने अधीरता से पूछा। "उनसे मैंने बस इतना कहा, रोज-रोज सभी आपकी आवाजें सुनते हैं, इससे लोगों के कान व आँखें आपके घर पर रहने लगी हैं, सोचिए जब आप लोग अपने घर से कई दिनों के लिए बाहर जाएँगे तब भले लोग तो शांति महसूस करेंगे, लेकिन कुछ आपके घर में सेंध लगाने की कोशिश भी करेंगे।" "अच्छा तो इस भय से!" "हाँ, फिर मैंने आगे कहा, इस तरह आप अनजाने में ही आ बैल मुझे मार कह रहे हैं।" "फिर उन्होंने क्या कहा कहा?" "कहा तो कुछ नहीं पर उनकी आँखें साफ बता रही थी, कि मेरी बात उनके कानों ने ग्रहण कर ली है।" "हाँ, सही कहा दीदी! परिणाम सामने हैं" "अभी तो मेरा यह तर्क चल गया, लेकिन अगर वो कहते, कि- "हमारे घर के सभी सदस्य एक साथ कहीं बाहर जाते ही नहीं है।" "फ़िर आपका यह तर्क धरा-की-धरा रह जाता।" सीमा ने कहा। "हाँ! सही कहा। इस जवाब के लिए कोई दूसरा तर्क सोचकर रखना होगा। क्योंकि मुझे यह स्थाई हल नहीं लग रहा है।" "मुझे भी दीदी।"
