सहयोग
सहयोग
सहयोग- लघुकथा
"मैडम मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है, कि मैं इस प्रयोग को अपने रिकॉर्ड में कैसे लिखूँ?" बेबसी का भाव लिए सीमा ने कहा।
"क्यों, तुम्हारा प्रयोग तो सफल हुआ है न?"
"हाँ मैडम!"
"फिर जो किया है, वही तो लिखना है।" रसायनशास्त्र की अध्यापिका ने बताया।
"मैडम, भाषा का कैसे प्रयोग करूँ, समझ नहीं आ रहा। थोड़ा मार्गदर्शन मिल जाता तो...आसानी रहती।" आशा भरी निगाहों से सीमा ने कहा।
"अच्छा! एक काम करो, तुम नेहा के रिकॉर्ड को पढ़ लो। उसने बहुत अच्छे से लिखा है।"
"ठीक है मैडम, लेकिन...!"
"लेकिन?"
" मैडम अगर उसने देने से मना कर दिया तो...? क्या मैं कह दूँ मैडम ने कहा है?"
"क्यों, तुम्हारी उससे मित्रता नहीं है क्या?"
है तो सही, लेकिन...।"
"देखो जब काम बनता हुआ नज़र न आए तो हमें टेढ़ी उंगली से घी निकालने की आवश्यकता नहीं होती है, वरन खुद-से पूछने की जरूरत होती है, कि क्या मैं विनम्र हूँ? क्योंकि इसी से सहयोग की प्रवृत्ति जागृत होती है और मनमुटाव अस्तित्वहीन हो जाता है। बाकि तुम खुद समझदार हो।"
प्रयोगशाला से बाहर निकलते हुए अध्यापिका ने कहा।
"जी मैडम, मैं समझ गई।" मेडम की बात सुन सीमा की आँखों में चमक आ गई।
