प्यारी दादी
प्यारी दादी
"अरे हरीश! घर की रौनक कहीं दिखाई नहीं दे रही, अभी तक अस्पताल से आई नहीं क्या, पहले तो कैसे दौड़कर आती थी।" "घर पर ही है, दरअसल वह स्वयं की जिंदगी की रौनक के साथ है।" "मतलब डॉक्टर रीमा की शादी हो गई?" "अरे नहीं, भाई साहब! वह अपनी दादी के साथ है। रीमा की माँ ने बताते हुए, हाथ के इशारे से उन्हें उस ओर चलने के लिए कहा। अपने मेहमानों के साथ हरीश जी डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ ही रहे थे कि दादी-पोती की बातों का आनंद लेने के लिए वहीं खड़े हो गए। "दादी कोई नई कहानी कहिए न! हर बार वही कहानी, बोर होता है, समझा करो।" लंच ब्रेक में घर आई रीमा ने अपनी दादी से कहा। अच्छा चल कल के लिए कोई नई सोचूँगी, आज यही सुन ले।" "ठीक है, मेरी प्यारी दादी सुनाओ।" कहकर रीमा, दादी के गले लग गई। यह देख आँखों में खुशी के आँसू लिए हरीशजी ने कहा- "दादी से कहानी सुनते हुए रीमा को बीस वर्ष हो चुके हैं, आज भी वह दादी से कहानी सुनते हुए ही अपना भोजन करती है। शायद मोबाइल, टीवी उसे दादी की कहानी से अधिक तरोताजा नहीं करते।" "लेकिन रीमा भी जानती है, दादी के पिटारे में वही कुछ गिनी चुनी कहानियाँ हैं, जिन्हें वे बदल-बदलकर सुनाती रहती हैं या यूँ कहे कि दादी का सानिध्य, अपनापन रीमा में नई ऊर्जा का संचार करता है।" माँ ने भावुक मन से बताया। "हाँ सही कहा, कहानी सुनना तो सिर्फ़ बहाना है, क्योंकि रीमा का बुक शेल्फ हर युग के लेखकों की किताबों से सजा है।" हरीश जी ने छत को छू रही अलमारी की ओर इशारा कर कहा। "रीमा आज डॉक्टर है, लेकिन कहानी सुनाने की व लिखने की कला तो उसने दादी से ही सीखी है और इसके लिए कई पुरस्कार भी जीत चुकी है।" गौरवान्वित भाव लिए माँ ने कहा। "रीमा का आज भी दादी से बच्चों जैसी जिद करना, दादी के आसपास रहना, दादी को अपने बुढ़ापे के एहसास से कोसों दूर रखता है, क्योंकि रीमा की जिंदगी में आज भी दादी सबसे पहले है।" हरीश जी ने पुन: कहा। बातों की आवाज से रीमा व दादी का ध्यान भटका तो उन्होंने मुड़कर दरवाजे की ओर देखा। कई वर्षों बाद सुनील अंकल को परिवार के साथ आया देख, रीमा खुशी से उछली और हाथ पकड़कर दादी के पास बैठाते हुए बोली- "दादी आज मेरे साथ अंकल भी आपकी कहानी सुनेंगे। जल्दी से अपना पिटारा खोलिए न।"
