Ruchi Singh

Abstract


4.6  

Ruchi Singh

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सिसकियां बनी किलकारियां

सिसकियां बनी किलकारियां

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संकल्प और मानवी दिल्ली शहर मेंं द्वारका मेंं किराए पर एक नए फ्लैट मेंं शिफ्ट हुए हैं। मानवी का घर में गिरने के कारण पिछले महीने अबॉर्शन हो गया है। डॉक्टर ने बताया है कि कुछ काम्प्लिकेशन के कारण अब कभी वह मां नहीं बन सकती। उसकी दुखद् यादें जो कि पुराने घर से जुड़ी हुई है उसको वह भुला पाए, इसलिए संकल्प ने नया घर लेना उचित समझा। संकल्प का एक जिगरी दोस्त शुभम् भी इसी सोसाइटी मेंं रहता है। उसी के कारण संकल्प ने यहां शिफ्ट करने का मन बनाया है। 


मानवी अपने अबॉर्शन और कभी मां न बन पाने की टीस के कारण अधिकतर दुखी रहती है। 


शुभम् की पत्नी रिया भी बहुत खुशदिल और मिलनसार है। उसका एक बेटा भी है। संकल्प और मानवी के सामान शिफ्टिंग वाले दिन उनका खाना ,नाश्ता सब की जिम्मेंदारी रिया ने ही उठाई है। रात का खाना खाने के लिए भी रिया ने उनको अपने घर बुला लिया। दिन भर मेंं सारा सामान सेट हो गया है। रात मेंं मानवी और संकल्प शुभम् के घर खाना खाने गए मानवी खोई खोई रहती है रिया उससे बातें की जा रही है पर वह उसके प्रश्नों का जवाब बिना हाव भाव के देती है।


तभी दूसरे कमरे से दौड़ता हुआ आरूष आया और रिया की गोद में मुँह छुपाते हुए बैठ गया। मानवी का ध्यान अब उसकी तरफ जाता है। आरूष लगभग 3 साल का है। वह अपनी तोतली भाषा से मानवी से कुछ -कुछ बोल कर उसका ध्यान अपनी और आकर्षित करता रहता है। अबॉर्शन के बाद से आरुष से मानवी पहली बार मिली थी। आरुष मानवी को फ्रिज से अपनी एक चॉकलेट निकाल के खाने को देता है। आरुष को देख कर मानवी अपने दुख को थोड़ा कम महसूस करती है। खाना खाने के बाद दोनों अपने फ्लैट मेंं सोने चले जाते हैं। 


अगले दिन सुबह उठते ही संकल्प मानवी के लिए चाय बना लाता है। "टिंग टोंग चाय तैयार है" संकल्प बोलता है। मानवी करवट लेती हुई उठती है और दोनों बैड टी की चुस्कियाँ लेते हुए अखबार देखते हैं। 


संकल्प ऑफिस के लिए तैयार होने चला जाता है और मानवी संकल्प के ब्रेकफास्ट बनाने किचन मेंं व्यस्त ह़ो जाती है। 9:00 बजे ही संकल्प ऑफिस के लिए निकल जाता है। मानवी अपने घर के कामों को निपटा कर टीवी देखने बैठ जाती है। उसने रिया से घर के काम करने वाली मेंड के लिए बोल दिया है। थोड़ी देर मेंं उसको बाहर से किसी फ्लैट से किसी बच्चे की सिसकियाँ सुनाई देती है। वह अपना ध्यान टीवी पर लगाती है पर आधे घंटे बाद उसको फिर से आवाज आती सुनाई देती है। मानवी जाकर दरवाजे पर देखती है पर उसको कुछ समझ मेंं नहीं आता। वह फिर खाना खा कर सो जाती है। 


शाम को रिया ने अपनी मेंड को काम के लिए भेज दिया है। काम के लिए मेंड से बात पक्की हो जाती है। अगले दिन से वह सुबह 10:00 बजे काम पर आएगी बोल कर चली जाती है। ऐसे ही तीन-चार दिन तक मानवी को रोज सुबह और कभी दिन में भी बच्चे के रोने व धीमी सिसकियोँ की आवाजे़ सुनाई देती हैं। जो मानवी को उसका दुखः भुलाकर बेचैन करने लगती है। उसका सारा ध्यान इस आवाज पर लगा रहता है। वह जानना चाहती है कि क्या है, कौन है पर वह समझ नहीं पाती है। 


तभी एक दिन उसने मेंड के सामने यह बात बोल दी । "पता नहीं किस बच्चे की आवाज आती रहती है? कोई तो बच्चा है जो फ्लोर पर है और रोता रहता है।" मेंड बोलती है।" हां, दीदी बगल वाले घर मेंं मैं काम करती हूं। उनके एक छोटा बच्चा है जो बेचारा रोता रहता है।" मानवी बेचैन होकर कहती है, क्यों उसकी मां उसको चुप क्यों नहीं कराती है। मेंड की आंखों मेंं आंसू आ जाता है। वह दुखी मन से वहीं बैठ जाती है और बोलती है "दीदी पिछले 3 महीने से बगल वाले घर में मैं काम कर रही हूं। मैंने देखा है कि भैया के ऑफिस जाते हैं दीदी बच्चे को सोता छोड़ 2-3 घंटे के लिए कहीं चली जाती हैं। शायद वह जिम जाती है। बच्चा बीच मेंं उठकर जितनी देर मैडम नहीं रहती रोता रहता है।" कहते -कहते कामवाली के आंखों मेंं आंसू आ गए। फिर वो अपने काम मेंं लग गई। 


मानवी कामवाली से कहती है "अरे कोई मां का कहीं बाहर जाना इतना जरूरी तो नही। वह भी बेटे को छोड़कर।" "हां दीदी बात तो सही है पर दीदी मां अपनी हो तब ना। अपनी मां कभी अपने जिगर के टुकड़े को छोड़कर कहीं भी नहीं जाती। वह दीदी उसकी सौतेली मां है।" मानसी को कामवाली के बाद पर विश्वास नहीं होता। वह चुपचाप सब सुन लेती है पर मन ही मन उसे कुछ अजीब सा लगता है। वह शाम को रिया से फोन करके यह बात पूछती है। 


"रिया तुझे कुछ पता है।" रिया बोलती है "हां, तेरे बगल मेंं कोई बच्चा तो है। उसके बारे मेंं सुना है कि उसकी मां सौतेली है जो बच्चे का बिल्कुल नहीं ध्यान देती। वह बच्चे के पापा से पैसे को देखकर उसने शादी कर ली है और अब बच्चे का पापा भी उस के प्यार के चक्कर मेंं पड़कर बच्चे पर कम ध्यान देता है।"


मानवी को उस बच्चे के बारे मेंं सोच सोच कर बेचैनी और परेशानी होती रहती है। रात मेंं वह बेचैन रहती है और सो नहीं पाती। अगले दिन वह सुबह ही अपने घर का दरवाजा हल्का सा खोल कर बाहर नजर रखती है। आज जैसे ही सामने वाले अनिल जी घर से बाहर निकलते हैं। दरवाजे पर उनकी पत्नी कृति उनको बाय करने आती है। गोद मेंं उनके एक प्यारा मासूम सा बच्चा मनन है, जो पापा को मायूस होकर देख रहा था। मनन लगभग 2 साल का होगा। मानवी भी दरवाजा खोल के अपने पड़ोसी से मिलने की कोशिश करती है। पर कृति ने उसे देख बस स्माइल कर दी। कोई बात ना कर के अपना गेट बंद कर लिया। 1 घंटे बाद ही बच्चे की रोने की आवाज फिर आने लगती है। 


अब तो मानवी को दिन रात उस बच्चे की आवाज ही कानों मेंं गूंजती रहती है। उसे बेचैन की रहती है। 


2 दिन बाद रविवार को वह अपने पति के साथ उनके घर मिलने जाती है। कृति उनके लिए पानी लेकर आती है। बच्चा वहीं आसपास गंदा सा धीरे -धीरे कुनमुनाते घूम रहा है। कृति और अनिल जी उस पर कुछ ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं। मानवी को महसूस हुआ कि उसके पापा भी उस पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते हैं। फिर बातों का सिलसिला शुरू होता है। कुछ औपचारिक बातें होती हैं। जैसे आप कहां जॉब करते हैं, कहां से बिलॉन्ग करते हैं। 


तभी बच्चे से टेबल पर रखा पानी का गिलास पर हाथ लग जाता है और वो गिर जाता है। कृति उसी समय गुस्से मेंं तडाक से एक झापड़ रख देती है। फिर मनन रोने लगा। कृति मनन को कुछ ना कुछ बुरा भला बोलती रहती है। अनिल जी सर झुकाए बैठे रहते हैं।मानवी को देखकर बहुत खराब लगता है। वह तुरंत बच्चे को गोदी लेकर चुप कराने लगती है। मनन भी उसके पास आकर चुप हो जाता है। मानवी व संकल्प कुछ देर बाद अपने घर चले जाते हैं। 


मानवी अब तो और बेचैन रहती है और उसको बच्चे का सुबकना व सिसकना दिन भर कानों मेंं गूंजता रहता। कृति के घर का तो रोज का रोने धोने का रूटीन हो गया। मानवी देखती है कि अनिल जी के ऑफिस जाते ही कृति दो-तीन घंटे के लिए बाहर चली जाती है। वह बच्चा उठकर परेशान होता रहता है। 


अब कभी कभी शाम को मानवी कृति के घर मिलने जाती है। मनन मानवी को देखते ही दौड़ के उसके पास चला आता है। यह देखकर मानवी उस वक्त बहुत खुश हो जाती है। मनन को अपने सीने से लगा, स्नेह करने लगती। 


मानवी को लगता है कि मनन की आंखें प्यार को ढूंढती हुई दिखाई दे रही है। वह हमेंशा अपनी मां कृति से डरा रहता है। कृति बात -बात मेंं उसको झिडकती व मारती है और उससे परेशान रहती है। एक दिन मानवी मनन को गोदी मेंं लेकर बैठी थी और कृति उससे बातें करते-करते एकाएक ही भाग कर बाथरूम मेंं चली जाती है। थोड़ी देर बाद वापस आती है तो मानवी पूछती है कि "तबीयत ठीक है।" तब कृति बताती है कि "हां मैं 2 महीने की प्रेग्नेंट हूं। मेंरी ऐसी तबीयत रहती है व मुझसे मनन संभाला भी नहीं जाता। पता नहीं क्यों यह मैंने दूसरी शादी कर ली। शादी से तो मुझे कोई दिक्कत नहीं, पर मैं इस मनन से बहुत दुखी हूं।" 


मनन उसी समय किसी चीज को पाने की जिद करता है। कृति उसको अनाप-शनाप बोलने लगी और गुस्से में बोली "ये मर भी नहीं जाता। मानवी अवाक होकर उसे देखती रह जाती है। और कहती है, "ऐसा ना बोलिए।"


 फिर कुछ सोचकर वह बोलती है कि "तुम चाहो तो मनन को मेंरे पास खेलने के लिए भेज दिया करो, मैं तो दिन भर अकेले रहती हूं।"


अब तो मानो कृति के मन की बात मानवी ने बोल दी हो। अब वह रोज ही सुबह से मानवी के पास मनन को भेज देती है और दिन भर आराम करती है मनन भी मानवी के साथ बहुत खुश रहता है। मनन मानवी से बहुत ही घुलमिल गया है। मानवी को भी जैसे जीने का सहारा मिल गया हो। 


शाम को मनन उसको छोड़ कर अपने घर जाना ही नहीं चाहता व जाते समय रोता रहता। मानवी भी उसको भेजना तो नहीं चाहती पर अनिल जी उसको लेने आते हैं और मानवी को भेजना ही पड़ता। पर धीरे-धीरे जिद करके अब रात मेंं भी मनन मानवी के पास रुकने लगा। 


मानवी की दोस्त रिया भी अपने बेटे आरुष को लेकर कभी-कभी अपनी दोस्त मानवी के पास आ जाया करती है। दोनों बच्चे मिलकर खूब खेलते हैं। और खुश रहते हैं। 


1 दिन कृति बोल ही देती है, मानवी जी यदि आपको मनन इतना ही पसंद है तो, इसको आप अपने पास रख क्यों नहीं लेती? मानवी को तो लगा जैसे उसके मन की बात कृति ने बोल दी हो। 


फिर भी वह बोलती है कि "क्या अनिल जी...." प्रीति बोलती "अरे वह कुछ नहीं कहेंगे। आप इसको अपने पास आराम से रख सकती हैं। 2 महीने बाद मेंरी डिलीवरी है और अब 3 दिन बाद हम यहां से मुंबई शिफ्ट होने वाले हैं। अनिल का ट्रांसफर मुंबई मेंं हो गया है और मेंरी मम्मी का घर भी वही है।"


यह सुनते ही मानवी तो फूली नहीं समाती, पर वह बोलती है कि "मैं आपको कल बताती हूं।"


मानवी शाम से को अपने पति संकल्प से यह बात करती है कि "हम मनन को लीगली अडॉप्ट कर लेते हैं।" संकल्प देखता है कि मनन मानवी से बहुत घुल मिल गया है और मानवी भी उसके साथ बहुत खुश रहती है। मानो उसको अपनी जीने का सहारा मिल गया हो। और वह अपने सारे दुख भुला कर उसी मेंं अब बिजी रहती है। 


इसलिए संकल्प ने भी हामी भर दी अगले दिन संकल्प अनिल जी से बात करता है। अनिल जी भी तैयार हो जाते हैं। संकल्प एडॉप्शन का पेपर बनवा लाता है। अब मानवी बहुत खुश है जिस बच्चे का करुण क्रंदन व सिसकियाँ, उसको परेशान करती रही, आज वो उसके गोद मेंं है और उसके जीने का सहारा बन गया है। 


उसने मानवी को नई जिंदगी दे दी और मानवी ने भी उस बच्चे को अपनी ममता का आँचल दे दिया। अब बच्चे की सिसकियां किलकारियों मेंं बदल गई। मानवी का परिवार अब पूरा हो गया है।



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