सिलसिला
सिलसिला
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते वर्ना इतने तो मरासिम थे आते जाते
शिकवा ए जुल्मत ए शब से कहीं बेहतर था...
कंप्यूटर में वीएलसी प्लेयर की प्ले लिस्ट से गाना बज रहा था...नूरजहाँ की आवाज़ के क्या कहने... टाइप करते करते वह उस गाने में खो गयी...इस गाने के लिरिक्स उसे बेहद पसंद थे...
जिंदगी जो वह छोड़ आयी थी आज वह सब उसके दिमाग मे कौंध गयी...
ऑफिस के बाद की वह शाम...
पता नहीं क्यों आज घर जाने का उसका मन नहीं हो पा रहा था। उस शाम को वह ऑफिस से घर जाने को निकली तो थी लेकिन
उसी मानसिक स्थिति में वह एक पार्क में जाकर बैठ गयी...उसे घर जाने का मन ही नहीं हो रहा था...
कुछ दिनों से घर का माहौल कुछ ठीक नहीं था। यह कोई घर न जाने का खास कारण भी तो नहीं हो सकता था ...
अँधेरे में घिरते जा रहे उस पार्क में वह बस बैठी रही...ऐसे ही...
रात होते ही उसके कलीग का फ़ोन आया... कहाँ हो तुम? इतनी रात हो गयी है...घर से तुम्हारे पति का फ़ोन आया है.... अँधेरे पार्क में बैठने का सलूशन एकदम हास्यास्पद है यह सोचते हुए वह घर की तरफ निकल गयी...घर में बच्चे भी तो थे ... इतने में ही उसने सब कुछ कितना उथल पुथल कर लिया था....
गाना ख़त्म हो गया...प्ले लिस्ट में नेक्स्ट गाना गाइड फ़िल्म का बजने लगा... आज फिर जीने की तमन्ना है...
वहीदा रहमान की अदाकारी और लता की सुरीली आवाज का जादू...
शायद उस गाने का असर था कि वह
सोचने लगी कि कैसे वह उस दिन पार्क में बैठी रही थी....और उसी वक़्त उसने एक निश्चय किया कि अपने लिए एक छोटा सा ही क्यों न हो एक घर लेना है और फिर उसने कुछ दिनों में अपना घर लेकर शिफ्ट भी कर लिया...पति को बिना
बताएँ...
अपना सारा सामान भी वह वही छोड़ आयी... क्यों ले आना उन बोझिल यादों की याद दिलाने वाला वह पुराना सामान...
उसके होंठों पर मंद मुस्कान तैरने लगी।
आज वह हँस पा रही है...
इस दीवाली में उसने 'अपने' घर को मनपसंद रंगों के पर्दों से सजा दिया है...रंगबिरंगी लाइट्स की लड़ियों से घर रोशनी से नहाया हुआ है...आज यहाँ वह अपने मन माफ़िक ढंग से रह रही है... सुकून से... बिना डरे सहमे...आज़ाद....
