Namrata Sona

Inspirational


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Namrata Sona

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श्यामली

श्यामली

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"जा, मुँह धोकर आ,पाउडर भी लगा लेना" माँ ने सांवली से कहा।

"अभी तो धोया था माँ, क्या मुँह धोने से और पाउडर थोपने से मैं गोरी और सुंदर हो जाऊंगी" सांवली ने झुंझलाकर कहा।

तीनों बहनों मे कुरुपता उसी ने पाई थी। बड़ी और छोटी दोनों बहने गज़ब की सुंदर थीं और सांवली अपने नाम से भी कुछ ज़्यादा दबा हुआ रंग लेकर जन्मी थी। दाँत भी बाहर की तरफ निकले हुए। जब कोई उन तीनों को देखकर कहता कि" हाँ ये दोनों बहने लगती हैं पर ये ...ये तो इनकी बहन कहीं से नहीं लगती" तब सांवली मुर्झा जाती, और माँ भी तो दिन में दस बार कहती "जा..मुँह धोकर आ, जा..पाउडर लगाकर आ" तब तो सांवली और उदास हो जाती, यही सोचकर कि माँ को मेरा काला चेहरा अच्छा नहीं ं लगता।

एक अगर रूप को छोड़ दिया जाए तो, सांवली अपनी दोनों बहनों से कही ज़्यादा गुणवान थी, हर कला में निपुण और पढ़ाई मे अव्वल। लेकिन लड़की थी, सो रूप के तराजू पर हमेशा कमतर ही मापी गई और परिवार, अपनों और परिचितों मे जैसे बेचारी बनकर रह गई।

"कितनी गुनी है सांवली, ऊपर वाला थोड़ा रुप भी दे देता तो सोने पर सुहागा ही हो जाता" दादी ने माँ से कहा।

"हाँ अम्मा, जेई बात का तो रोना है, सारे गुन धरे रह जाएंगे, अब सादी बियाह मे तो रूप ही देखा जाता है, दिन रात जेई चिंता खाए जाती है कि इसका बियाह कैसे होएगा, लोग भर भर कर दहेज के लिए मुँह फाड़ेंगे, अब अपन तो उत्ता दे नहीं ं सकते, तीन तीन बियाहनी हैं, कोई इकलौती तो है नहीं कि झाड़ पौंछ कर सब दे दो इसी को " माँ ने चिंता जताई।

"रमा ओ रमा .." पिता बलदेव सिंह ने घर में घुसते हुए आवाज़ लगाई।

"हओ, आई जी आई, आ गए" माँ पानी का गिलास लिये दौड़ती हुई चली आई।

"नहीं, मेरा भूत आया है, अरे ये फिजूल सा सवाल रोज़ ही तुम क्यों करती हो" बलदेव सिंह झुंझलाकर बोले।

"अरे, वो तो अब आदत ही पड़ गई, चलो अब बताओ, क्या लड़के वालों से बात हुई आपकी?"माँ बोली।

"हाँ, परसों आ रहें हैं, समीक्षा को देखने" बलदेव सिंह सोफे पर बैठते हुए बोले।

"अरे, तो अब पूछने पर बता रहे हो, आते ही बताना था न" माँ ने हाथ हिलाते हुए कहा।

"अरे, अभी तो घर में घुसा ही हूँ, तुम तो घोड़े पर ही सवार रहती हो" बलदेव सिंह झल्ला कर बोले।

"कौन कौन आएगा ? माँ ने प्रश्न किया।

"अब ये तो नहीं पूछा, तीन चार लोग तो होंगे ही " बलदेव सिंह बोले।

"अच्छा, कितने बजे तक आएँगे, ये तो पूछा होगा? "माँ ने अगला प्रश्न किया।

"दोपहर एक बजे, रविवार है, अतः ठीक है, सभी के लिए सुविधाजनक है" बलदेव सिंह ने बताया।

"सांवली ओ सांवली" माँ ने पुकारा।

"हाँ, माँ क्या बात है कहो" सांवली ने बैठक में प्रविष्ट होते हुए पूछा।

"सुन, परसों तेरी समीक्षा जीजी को लड़के वाले देखने आ रहे हैं, तो तू अभी तैयारी शुरू कर दे, क्या बनाएगी, उसके लिए क्या कुछ सामान बाज़ार से लाना है ,ज़रा एक लिस्ट बना ले, तेरे पापा शाम को ले आएँगे, और सुन तू भी ज़रा बेसन का लेप लगा लेना, रंग थोड़ा खुला दिखेगा" माँ ने सांवली को देखते हुए कहा।

"माँsss..अब इसमें मुझे बेसन का लेप लगाने की क्या ज़रूरत आन पड़ी, वो लोग तो जीजी को देखने आ रहे हैं" सांवली ने कंधे उचकाते हुए कहा।

"अरे, ऐसे ही एक के एक रस्ते खुलते हैं, हो सकता है उनकी नजर में तेरे लायक भी कोई रिश्ता हो, चल अब जा, परसों की तैयारियां कर" माँ ने सांवली से कहा।

तैयारियां शुरू हो गई, समीक्षा फेशियल, साड़ियों के चयन आदि में व्यस्त रही और सांवली किचन की तैयारियों में, जो सूखा नाश्ता जैसे मठरी, गुजिया, चिवड़ा आदि उसने एक दिन पहले ही बना कर तैयार कर लिये थे, रविवार सुबह से समोसे, मूंग का हलवा और बादाम की खीर की खूशबू से सारा घर महक रहा था। समीक्षा साड़ियों पर साड़ियां बदले जा रही थी, छोटी बहन सुनीति उसकी मदद कर रही थी।

"समीक्षा, तू कुछ भी पहन ले, सुंदर ही दिखेगी, तुझे तो एक नजर में पसंद कर लेंगे वो लोग, मत चिंता कर, कुछ भी पहन ले" माँ ने पूर्ण विश्वास से कहा।

"सांवली ओ सांवली" माँ ने सांवली को पुकारा।

"क्या है माँ" किचन से निकलते हुए सांवली बोली।

"सुन तू भी अब मुँह धो ले, और अच्छे से पाउडर लगाकर, वो हल्के पीले रंग का जो सूट है न वो पहन ले, उसमे तेरा रंग खुला हुआ लगता है" माँ ने सांवली को ऊपर से नीचे देखते हुए कहा।

"माँ..तुम भी ना...आज तो समीक्षा जीजी को तैयार होने दो, क्यों जीजी..."सांवली ने समीक्षा की चुटकी ली।

"जा, तू भी तैयार हो जा..."समीक्षा ने मुस्कुराते हुए सांवली से कहा।

"ठीक है जीजी" सांवली हँसते हुए बोली।

सवा एक बजे के करीब लड़के वाले तशरीफ़ ले आए, माता पिता, लड़का और उसकी छोटी बहन, कुल चार लोग आए थे।

"आईए भाई साहब, नमस्ते बहनजी, आओ बेटा आओ, आओ.."बलदेव सिंह सबका स्वागत करते हुए बोले।

"बहनजी, आपका घर तो खाने की खुशबूओं से महक रहा है, कितने पकवान बनवा लिए आपने?" लड़के की माँ ने घर में घुसते ही कहा।

"अरे बहनजी, बच्चियों से जो कुछ बन सका, बस यूं ही थोड़ा बहुत" माँ ने मुस्कान बिखेरते हुए कहा।

सभी लोगों को बैठक में बिठाया गया, जो सांवली की कलाकृतियों से बहुत ही करीने से सजा संवरा, थोड़ा बड़ा सा कमरा था। सांवली पानी की ट्रे लिए बैठक में प्रविष्ट हुई।लड़के की माँ कुछ ज़्यादा ही ध्यान से उसे देखने लगी।

"बहनजी, ये मंझली बेटी सांवली है, समीक्षा , जिसे आप देखने आईं हैं, वो अभी अंदर है" माँ ने लड़के की माँ की नज़रों को ताड़ते हुए कहा।

"ओह, अच्छा.. अच्छा.." लड़के की माँ सोफ़े से पीठ टिकाती हुई बोली।

सांवली ने सभी को नमस्ते कर, पानी का गिलास दिया।

"जा सांवली जीजी को ले आ " माँ ने सांवली से कहा।

"ये वॉल पीस, हेंगिंग, और ये पेंटिंग्स तो बहुत ज़ोरदार है, बिटिया ने बनाई है क्या ?" लड़के की माँ ने चारों तरफ़ नज़र घूमाते हुए पूछा।

"हं..हाँ..हाँ.."माँ ने कहा, पर ये बात गोल कर दी कि किस बिटिया ने बनाया है, क्योंकि अभी तो समीक्षा को निपटाना था।

तभी सांवली अपनी समीक्षा जीजी के साथ बैठक में प्रविष्ट हुई। लड़के की माँ का चेहरा खिल उठा।

"आओ ..आओ, बिटिया.... वाह.. बहुत ही सुंदर, क्यों बेटा है ना? लड़के की माँ ने अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा।

लड़के ने आँखें उठाकर देखा तो उसकी नज़र सांवली की नज़र से टकराई, जो उसका रिएक्शन देखने के लिए उसे ही देख रही थी।लड़के ने झेंप कर नज़र झुका ली।

"भई मुझे तो बिटिया बहुत पसंद है, अब फैसला तो श्याम के हाथ में है, मेरे ख्याल से हमे इन दोनों को भी एक दूसरे से खुल कर बातचीत करने के लिए अकेला छोड़ देना चाहिए, क्यों जी, सही है ना "लड़के की माँ ने लड़के के पिता से कहा।

"हाँ बिल्कुल ठीक है " लड़के के पिता ने कहा।

"सांवली, जाओ बेटा जीजी को श्याम बाबू को बगीचे की सैर भी करवा दो" माँ ने झट से सांवली को इशारा किया।

"जी ठीक है माँ, आईये जीजी.."सांवली ने समीक्षा और श्याम से चलने को कहा।

बगीचे में पहुंच कर सांवली ने कहा- "जीजी, आप लोग बात कीजिए, तब तक मैं अंदर नाश्ते का प्रबंध करती हूँ।"

सांवली भीतर चली गई।

समीक्षा और श्याम करीब पंद्रह मिनट बातचीत करते रहे, फिर वे भी भीतर बैठक में आ गए।

"वाह भई, ऐसा स्वादिष्ट नाश्ता करके मज़ा आ गया, भई अब तो जी चाहता है सारा जीवन ऐसा ही नाश्ता मिलता रहे" लड़के की माँ ने कनखियों से समीक्षा को देखते हुए कहा।

"बिल्कुल आंटी, आपको अब जीवन भर ये स्वाद ऐसे ही मिलता रहेगा" समीक्षा ने कनखियों से श्याम को देखते हुए कहा, श्याम भी मुस्कुरा रहा था।

"अच्छाsssतो ये बात है, मतलब तुम दोनों ने एक दूसरे को पसंद कर लिया, अरे, वाह, वाह, वाह..इसी बात दो चम्मच मूंग का हलवा और तो देना सांवली बिटिया, बहुत ही स्वादिष्ट बना है" लड़के की माँ ने खुश होते हुए कहा।

"माँ, आपको हलवा पसंद आया और मुझे हलवा बनाने वाली" श्याम ने मुस्कुराते हुए कहा।

"हाँ..हाँ..बेटा , समीक्षा बिटिया जितनी तुम खूबसूरत हो उतनी ही गुणवान भी " लड़के की माँ ने समीक्षा को देखते हुए कहा।

"माँ..मैं सांवली की बात कर रहा हूँ, मुझे सांवली पसंद है, मैं सांवली से विवाह करना चाहता हूँ" श्याम ने अपना फैसला सुनाया।

सभी हक्का बक्का रह गए, सांवली खुद हैरान सी श्याम को देख रही थी। माँ का तो मुँह खुला का खुला रह गया, लड़के की माँ का चेहरा मुरझा गया।

"ये क्या कह रहा है तू" लड़के की माँ भुनभुनाकर कहा।

"माँ आप चाहती थीं न कि मैं अपनी पसंद की लड़की से विवाह करूं, तो सांवली ही मेरी पसंद है, और आपको गुणगान बहू चाहिए न, तो सांवली सर्वगुण सम्पन्न है, ये नाश्ते, ये कलाकृतियां ये सब सांवली ने ही बनाए हैं" श्याम ने सांवली को देखते हुए कहा।

"तुम्हें ये सब कैसे पता चला? "श्याम की माँ ने पूछा।

"मुझे समीक्षा ने बताया " श्याम ने कहा।

सभी लोग समीक्षा की ओर देखने लगे।

"जी हाँ, मैंने बताया, क्योंकि मैंने भांप लिया था कि श्याम जी को पहली नज़र में ही सांवली अच्छी लगी थी , बगीचे में जब उन्होंने मुझसे सांवली के बारे मे पूछा तो मैंने सांवली की सारी खूबियों के बारे में इन्हें बताया।

तब इन्होंने मुझे अपने दिल की बात बताई कि, किस तरह सांवली इन्हें पहली ही नज़र में भा गई थी। इन्होंने मुझसे ये भी पूछा कि, मुझे बुरा तो नहीं लगा, तब मैंने इनसे कहा कि आज तो मेरे जीवन का सबसे बड़ी खुशी का दिन है, मुझे खुशी है कि सांवली को आपके जैसा समझदार और नज़रों से दिल को समझने वाला इंसान पति के रूप में मिलेगा " समीक्षा ने सबको बताया।

सांवली की बड़ी बड़ी आँखें जो आंसूओं से लबालब हो रही थीं, टप टप करके बरसने लगी, समीक्षा ने सांवली को कसकर बाँहों में ले लिया।

"जीजी, तुम्हारा मन तो तुम्हारे तन से भी ज़्यादा सुंदर है" सांवली मन ही मन बोली, ज़ुबान तो अभी साथ नहीं दे रही थी।

"बहुत बढ़िया, हमे तो हमारे बेटे पर नाज़ है, जो एक बहुत ही सुलझा और समझदार इंसान है, बेटा मुझे तेरी पसंद बहुत पसंद है " श्याम के पिता ने श्याम की पीठ ठोकते हुए कहा।

"एक माँ के लिए इससे खुशी की बात क्या हो सकती है कि बेटा इतना होनहार और बहू इतनी गुणवान हो " श्याम की माँ भी मुस्कुराती हुई बोली।

"सांवली, जब मैने तुम्हें पहली बार देखा, तुम्हारी चमकदार, बोलती आँखें और निश्छल हँसी, जो सीधे दिल तक उतर जाती है और.. और तुम्हारा सलोना रूप मुझे भा गया, तुम्हारे गुण तो बाद मे मुझे समीक्षा ने बताए, लेकिन मैं तो उससे पहले ही तुम्हें दिल बैठा था, अब तुम कहो, तुम्हारी क्या मर्ज़ी है" श्याम ने सांवली के सामने अपना दिल खोलकर रख दिया।

सांवली तो जैसे गहरे सागर मे गोते खा रही थी, कई इंद्रधनुष उसकी आँखों के सामने झूल रहे थे, ऐसी तो कभी उसने कल्पना भी नहीं की थी, किसी का इतना प्यार, वो भी अचानक इन परिस्थितियों में... शर्म के कारण वो मानो ज़मीन में धंसी जा रही थी, गालों पर लाली और थरथराते होठों पर हल्की हल्की मुस्कान बता रही थी कि वह आज कितनी खुश है।

"थोड़ा सा मूंग का हलवा मुझे भी खिलाओ श्यामली" श्याम ने प्यार भरे लहज़े मे सांवली से कहा।

अचानक अपने को श्यामली के संबोधन से सांवली चौंकी।

"हाँ...श्यामली.... मैं श्याम हूँ तो तुम हुई न मेरी श्यामली" 

सांवली तो अब श्यामली हो गई, अपने श्याम की श्यामली, फ़िज़ा मे चारों तरफ बजने लगी बंसी की धुन और महकने लगी हवा, पहले प्यार की खुशबू से।



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