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Nandita Ramesh

Abstract

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Nandita Ramesh

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शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ६)

शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ६)

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भाग १ से ५ के पश्चात।।।।।

Continuation of earlier episodes published with the same name।।।

एफेंडी ने मुझे सियासी मामलों से भी अवगत कराया. मामू के साथ काह्वेखानों और मयखानों में जंग के चर्चे मैंने बचपन से सुन रखे थे. मजहब और जंग पे बहस करना यहाँ के लोगों की पसंदीदा तफरीह (favorite pastime) है. एफेंडी से मै इन मुद्दों पर भी बहुत से प्रश्न करता. इन विषयों को जो थोड़ा बहुत मैंने समझा, वो यहाँ पेश कर रहा हूँ.

रूमी के काल में कोन्या, रूम सल्तनत की राजधानी हुआ करती थी. इस समय कोन्या, उस्मानी सल्तनत का हिस्सा है. इसके कई उप-खण्डों में से एक, एयालेत-ए-कारामन, का सञ्चालन कोन्या के संजाक करते है. सुल्तान सुलिमान, जिन्हें लोग सुलिमान आलीशान कहते हैं, इस्ताम्बुल से अपने विस्तृत साम्राज्य का प्रशासन करते हैं. उनके पिता सलीम ने फारस, मिस्र, बग़दाद और हिजाज को जीतने के बाद, खुद को इस्लाम का संग्रक्षक, पैगम्बर का प्रतिनिधि, खलीफा, घोषित कर दिया था. सुल्तान सुलिमान, उस्मानी साम्राज्य के दुसरे खलीफा हैं.

एक शाम, जब सेमा समारोह देखने के बाद हम मयखाने पहुंचे, वहाँ बवाल मचा हुआ था. सैय्येद हैदर और क्य्रिओस मेनेलौस आपस में झगड़ रहे थे. मैंने उन्हें कई बार मयखाने में एक साथ बैठ कर खाते पीते देखा था, लेकिन उस दिन वो एक दुसरे के जानी दुश्मन लग रहे थे. हैदर अरबी व्यापारी है, जो काकाबाबू से कपड़ा खरीदने दूकान आते है. मेनेलौस यूनानी चिकित्सक है. हमारे दुकान से थोड़ी दूर उनका दवाखाना है. एफेंडी डेनिस ने साकी से उनके बहस का विषय पता किया. तर्क शुरू हुआ था राजधानी के नाम से. हैदर का कहना था कि ‘इस्ताम्बुल’ असल में इस्लामबोल, याने मुसलमानों का शहर है. मेनेलौस का कहना था कि ये यूनानी भाषा में, ‘इस तिन पोली’ याने, ‘ये है शहर’ का बदला रूप है. बात नाम से शुरू हुई थी, पर इस वक्त मजहब और संप्रदाय पर आ टिकी थी.

मेनेलौस कह रहे थे, ‘ये शहर आदि काल में यूनानियों का रहा है. ये सदियों से ईसाईयों की पवित्र भूमि रही है. दुनिया का सबसे बेहतरीन शहर. तुम अरबी मुसलमानों की नज़र इसके शानोशौकत पर हमेशा रही. तुम लोगों ने इस पर कितने हमले किये पर हर बार तुम्हे मुंह की खानी पड़ी थी.’

हैदर बोले, ‘लेकिन अब तो ये शहर मुसलमानों का है.’

‘उस पतन की मनहूस जुमेरात को हम भूल नहीँ पायें हैं’

‘मत भूलो, तुम्हारी यूनानी orthodox बिरादरी पर लातीनी कैथोलिक पिछले तीन सदियों से हावी रहे है. तुम तो अपना church हाजिया सोफिया तभी खो चुके थे, जब वेनिस से आये हुए क्रूसेडर्स को कस्तुन्युनिया (Constantinople) की ऊँची दीवारें रोक नहीं पाई थी. उस्मानी सल्तनत ने हाजिया सोफिया (Agia Sophia) को मस्जिद बना दिया. लेकिन तुम लोगों ने सुल्तान की बरोतरी मान कर अपने गिरिजाघर कलिसाय-ए-हवारियान को बचा लिया. फिर किस बात का शोक मना रहे हो * (नीचें link देखें)’

‘तुम तो ऐसे जता रहे हो जैसे जीत अरबों की हुई हो. तुम लोगों ने भी तो तुर्कियों के हाथों मात खाई है. इस्लामी खिलाफत भी तुम लोगों के हाथ से जाती रही’

बात हाथा-पायी पर उतर आई तो मयखाने के मालिक ने शहर के सुरक्षा प्रहरीयों को बुला भेजा. वो आके दोनों को पकड़ ले गए.

मैंने एफेंडी से पूछा, ‘–हैदर अरबी मुसलमान है, मेनालौस Greek इसाई. अरबियों ने तुर्कियों से मात खाई, इसाई और मुसलमान आपस में लड़ रहे है. मुसलमानों में शिया और सुन्नी आपस में झगड़ते है. ईसाइओ के दोनों वर्ग Greek और Latin भी लड़ते रहे है. कितने सारे विभाजन – कौम, मजहब, पंथ, किसने बनाई ये लकीरें जो लोगों को बांटती हैं, कौन रखता है इनका लेखा-जोखा .’

एफेंडी बोले, ‘ये सब दीवारें लोगों के दिल में सत्ता की चाहत है. हर किसी को अपना पंथ सबसे महान और सही लगता है. दूसरी आस्था वाले जाहिल लगते है. इस्लाम और इसाई धर्म के बीच धर्म्हुद्ध सदियों से चला आ रहा है. उस्मानी सुल्तान की नज़र भी इस वक्त यूरोप पर है जहाँ इसाई धर्म की मान्यता है. उन्होंने हंगरी पर कब्ज़ा कर लिया है. लेकिन ऑस्ट्रिया से तीन साल लड़ने के बाद, उन्होंने हार मान ली.’

मैंने पूछा, ‘सेमा में मोहब्बत की बातें होती है. हर गीत में खुदा को इश्क का स्वरुप बताया जाता है. फिर उनकी बनाई दुनिया में सब ओर जंग और मार-काट क्यों है?’

एफेंडी बोले - चूँकि हम इश्क को महसूस नहीं कर पाते. रूमी तो कहते है, ‘इश्क करने वालों का अपना देश है, सब देशों से निराला. आशिक की वफ़ा ना कौम से है ना पंथ से’.

मुझे पूरी बात समझ तो नहीं आई, पर ऐसा लगा था दुनिया में सिर्फ दो कौम है – एक मोहब्बत करने वालों का, दूसरा उनका जो मोहब्बत ढूंढ रहे हैं. हैदर और मेनेलौस दोस्त हैं, साथ बैठ कर पीते हैं, आपस में सौदा करते है, उन्होंने इश्क की कहानियाँ सुनी है लेकिन उसे महसूस नहीं कर पा रहे है. एफेंडी इसाई होते हुए भी मुसलमान सूफ़ियों के सेमा में इश्क तलाश रहे है. उन्होंने मारिया को बहुत चाहा पर इश्क उनसे परे रहा. इसलिए मरिया से मीलों दूर यहाँ मारिया को अपने दिल में महसूस करना चाह रहे हैं. मामू के दिल का इश्क उनके मौसिकी से व्यक्त होता है. सुदूर बंग देश में उगे कपास, जो नदी के ज्वार में डूब कर मजबूत हो जाती है, से बने महीन मलमल, जिसमे नदी किनारे बैठ आसमान के रंग देखते हुए युवतीयां अपने नर्म हाथों से बुनती है, को यहाँ के हसीनाओ के नाज़ुक बदन तक पहुँचाने में काकाबाबू के इश्क का इजहार है. पंद्रह साल की उम्र में मुझे ये लगा था की दुनिया की सब मनमोहक चीजों की वजह, सब मुस्कानों की वजह इश्क है, सारी तकलीफों की, सारी लडाइयों की जड़ है इश्क की तलाश. ये मार काट, जंग, एक पंथ के लोगों का दुसरे पर हावी होने का प्रयास, ये उसी तलाश में निष्फल होने की कुंठा है. इर्ष्या में तिल तिल जलना, किसी व्यक्ति या कौम के लिए नफरत भी इस खोज में निराशा की अभिव्यक्ति है.

मै भी इश्क ढूँढने लगा था. दूकान में मलमल का कपड़ा दिखाते हुए अक्सर मेरी नज़र उन नाजुक हाथों पर पड़ती जो कपडे को छू कर उसके मुलायम स्पर्श को महसूस कर रही होती थी. काकाबाबू ने मुझे सीख दी थी कि ग्राहकों के सामने नज़रे झुकाए रखना. हजारों कोशिशों के बावजूद कभी कभी ये गुस्ताख आँखे उठ जाती थी. उन खूबसूरत चेहरों में मैं उसे ढूँढने लगा था जिसके पास मेरे दिल की चाबी है, जो मुझे इश्क का पाठ सिखाएगी, जिससे मिलकर मुझे रूमी की शायरी समझ आ जाएगी. सेमा खत्म होने के बाद एफेंडी के साथ मयखाने में बैठ खाना खाते हुए, मै उनसे प्रेम कहानी सुनने की दरख्वास्त करता. मै खाने के साथ गाजर का रस, शालगम, नहीं बल्कि एफेंडी की तरह सौंफ की खुशबू वाली शराब राकी पीने लगा था. हलके नशे के सुरूर में कहानी सीधे दिल तक पहुँचती थी. सुनते हुए मै, थोड़ी देर के लिए ही सही, अपने आप को भुला इश्क करने वाला नायक बन जाता।


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