शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ८ )
शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ८ )
काकाबाबू की जिंदगी तो पूरी तरह बदल गयी थी। अब वो दूकान की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ कर जल्दी घर चले जाते थे। मामू की महफ़िल में शामिल होने मयखाने जाना बंद हो गया था। नापतौल के लफ्जों का इस्तेमाल करते। अगर उनकी कोई भी बात जूही को पसंद न आये तो वो इस तरह से आँखे तरेरती की काकाबाबू सहम से जाते। चौदह बरस की जूही जो अब भी अपने खाली समय में आंगन में चौकोर बना कर एक्का दोक्का खेलती थी, किस तरह अपने पैतीस बरस के पति पर हावी थी ये देख कर मुझे अचरज होता था।
कहानी पसंद करने वालों की किस्मत में कहानी सुनाने वालों की सोहबत लिखी होती है। मामू से कहानियाँ सुनते हुए बड़ा हुआ था, फिर काकाबाबू से सुनी थी दूर बंग देश की कहानी, एफेंडी डेनिस ने मुझे प्रेम की कहानियाँ भी सुनाई और लड़ाई, मार-काट की भी। लेकिन इन सब कहानियों से अलग थी वो कहानियाँ जो जूही सुनाती थी। उनमें न जान जोखिम में डाल समुद्री तूफ़ान और दरिंदो से लड़ते हुए दूर देशों का सफ़र था, न रहस्य था, न सुल्तानों के बड़े महल थे, न युद्ध और शूरवीरता थी, न ही अगाध चाहत का दीवानापन था। भाई बहिन की तकरार, सहेलियों की नोंक झोंक, माता पिता के स्नेह की इन कहानियों को सुनते हुए न जाने कैसे फूलों की खुशबू और रंग का एहसास होता, नंगे पावों पे नर्म घास के स्पर्श महसूस होता था, कानों में पंछियों की चहचहाहट सुनाई देती और जीभ पे मिठास का अनुभव होता था। शूरमा नदी, नदी किनारे मछुआरो के मिटटी से बने घर, किनारे से थोड़ी दूरी पर बन्दर बाज़ार, शाह जलाल बाबा का दरगाह और दरगाह से थोड़ी दूर जलाल पारा के इँठ पत्थरों से बने मकान, इन सबसे मैं इस कदर वाकिफ हो गया था कि ये छोटा सा शहर अपना लगने लगा था।
उसकी तीन सहेलियाँ – सईदा, सकीना और माधबी की बातें वो हर वक्त करती थी। सईदा और सकीना, काकाबाबू के भाई की बेटियां है। उनका मकान जलालपारा में जूही के घर के ठीक बगल में है। माधबी मछुआरों की बस्ती में रहती है। हर सुबह मछलियों की टोकरी सिर पे रख, सबसे पहले वो सईदा और सकीना के घर जाती है। उनकी माँ अच्छे दाम देकर अपने पसंद की मछलियाँ चुन लेते है। वे अमीर हैं, बन्दर बाज़ार में उनके बापू की पक्की दूकान है। सब घरों में बेच कर वो जूही के घर आती थी। उसकी अम्मी कम दाम दे कर बची हुई मछलियाँ खरीदती है। जूही के घर पैसों की तंगी थी। तभी तो उसके बापू ने महर में अच्छी रकम ले कर उसकी शादी उम्र में उससे इतने बड़े और देश से इतने दूर रहने वाले से कर दिया था। ये बात वो तभी बताती जब काकाबाबू आसपास ना हो। बोलते हुए उसकी आँखे डबडबा जाया करती थी।
अपने सहेलियों की कद काठी, रूप, आचरण, पसंद नापसंद का विवरण करते हुए वो कभी नहीं थकती थी। सईदा का कद ऊँचा और रंग तुर्की औरतों की तरह गोरा है। उससे खुबसूरत पुरे शिलहट शहर में कोई नहीं है। सकीना का रंग जूही की तरह सांवला है, वो सईदा की तरह लम्बी तो नहीं, लेकिन जूही की तरह नाटी भी नहीं। वो जब हँसती है तो उसके कपोल में गड़े पड़ते है। सईदा को अपने रूप और अपने घरवालों की अमीरी पर बड़ा गर्व है। सकीना बहुत सरल है, उसे माधबी बहुत पसंद है । माधबी का रंग कोयले की तरह काला है। वो मछली बेचना ख़त्म कर अक्सर जूही के घर रुक जाती थी, उसके और सकीना के साथ खेलने। वो उन्हें बाँस के जंगलों में बसने वाले भूतों की कहानियाँ सुनाया करती थी। एक्का दोक्का के खेल में माधबी से कोई नहीं जीत सकता है। माधबी का ब्याह बचपन में ही तय हो गया था। लेकिन उसका मंगेतर माधो शिलहट छोड़ कही दूर चला गया है। सईदा को जूही और सकीना का माधबी से लगाव पसंद नही। वो माधबी को नीचा दिखने के लिए, कभी माधबी के बदन से आने वाली मछली की बू का जिक्र करती, कभी उसके काले रंग का मजाक उड़ाती। वो माधबी को छेड़ते हुए कहती, ‘तेरे माधो ने अपनी बंसी सुना कर जाने कितनी लड़कियों का दिल जीत लिया होगा। वो नहीं लौटने वाला। तू जल्द किसी और से शादी कर ले वर्ना जिंदगी भर कुँवारी रह जायेगी।’ माधबी कभी सईदा की बातों का बुरा नहीं मानती, हँस कर कहती, ‘ दीदी, तुम कितनी सुन्दर हो। मै खुदा से यही गुजारिश करती हूँ कि अगले जनम में मुझे तुम्हारे जैसा गोरा रंग, ऊँचा कद और सुन्दर नाक नक्श मिले। ऐसा रूप मिले कि मेरे चाहने वालों की लम्बी कतार लग जाए। माधो को पल भर भी मुझसे दूर रहना गवारा न हो।’ जूही की कहानियाँ सुनते हुए जाने क्यों उस काली परदेसी मछुआरिन के प्रति मोह सा होने लगा था।
दूकान का काम, tekke में कुडूम बजा कर सेमाजनों का साथ देना, दिल पे हाथ रख कर अल्लाह का जिक्र करना, केरीम के साथ वक्त गुजारना और जूही के हाथ का पका खाना और उसकी कहानियाँ सुनने में वक्त इस तरह गुजरने लगा कि एफेंडी डेनिस से मुलाकातों का सिलसिला थम सा गया। कुछ हफ़्तों से वो tekke के सेमा समारोह में भी नहीं दिखे। मामू से पता चला कि, जिस मारिया के इश्क में बैचैन हो कर वो दर्बेशों से इश्क का मायने समझने कोन्या आये थे, उसकी बीमारी की खबर सुन कर वो पेरिस लौट गए थे। बहुत अफ़सोस हुआ था उनके जाने की खबर सुन कर। बहुत सी बातें अधूरी रह गयी थी, बहुत कुछ कहना और सुनना बाकी रह गया था।
इस दौरान, अब्दुल देदे से इज़ाज़त ले कर, केरीम कभी कभार मेरे साथ काकाबाबू के घर आने लगा। जाने क्यों, उसे देख जूही की बोलती बंद हो जाती, केरीम भी खामोश रहता। उस अजीब चुप्पी को तोड़ बातचीत का सिलसिला जारी रखने का भार मुझे संभालना पड़ता। वे आकार इंगित और एकाक्षरों में जवाब देते। उनके इस अजीब व्यवहार का रहस्य मुझे समझ नहीं आता।
एक शाम जब मै tekke पहुंचा तो केरीम को तेज बुखार था। वो बेहोश बडबडा रहा था। अब्दुल देदे मुझे देख कर बोले – ‘यही कारण है कि हम मुरीदों को शिक्षा के दौरान tekke से बाहर लोगों से मिलने से मना करते है। दिल की खिड़कियाँ जो फ़ना होने के लिए खुल रहे होते है, उनमे से कोई अन्दर आ जाता है।’
पहले तो मुझे उनकी बात समझ नही आई। कुछ देर केरीम के पास बैठने पर समझ आया कि वो बेसुध प्रलाप कर रहा था – ‘जूही, जूही, जूही।।।’। मैंने इश्क के दर्द की कहानियाँ सुनी थी, लेकिन विरह के आर्तनाद को प्रत्यक्ष सुनने का ये पहला मौका था।
मैंने देदे से कहा – ‘ये तो वही बांसुरी का क्रन्दन है जिसके बारे में मेवलाना ने मसनवी में लिखा है। वही बेकरारी जिसका जिक्र मेवलाना ने अपने चौपाइयों में किया है।’
देदे चुप सिर हिला रहे थे। उनके आचरण से ये स्पष्ट था कि वो मेरी बातों से असम्मत है। मैंने उनसे पूछा – ‘आशिकी का इजहार है दिल का दर्द, हर बीमारी से जुदा है प्रेम का ज्वर, ये वो यन्त्र है जिससे कायनात के राज खुल जाते है। इश्क का मूल चाहे जो भी हो, वो खुदा का स्वरूप है। ये मसनवी के कथन क्या महज़ उक्तियाँ हैं। एक रूह का दुसरे रूह से जुड़ जाना, क्या ये खुदा की अभिव्यक्ति नहीं?’
देदे ने धीरे से कहा – ‘इंसानी इश्क भौतिक है, इसमें हवस है, काम लोलुपता है। आज ये प्रेम है कल नफरत में बदल सकता है, हमारा लक्ष्य तो अलौकिक मोहब्बत है, जो चिरस्थायी है।’
देदे की आवाज़ से जाहिर था कि वो पेशोपेश में हैं, वो इस मोहब्बत को बढावा नहीं देना चाहते थे, लेकिन केरीम की हालत में, उसके तड़प में इश्वर प्रेम के झलक को नकार भी नहीं पा रहे थे।
अगले दिन जब मै काकाबाबू के घर गया तो जूही का चेहरा कुम्हलाया हुआ था। उसने चुपके से पूछा, ‘बहुत बीमार है वो?’ हालाँकि उसने नाम नहीं लिया मै समझ गया था कि वो केरीम का हाल पूछ रही है। मैंने अचरज से पूछा, ‘तुम्हे कैसे पता?’। वो बोली, ‘मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा है। बदन व्यथा से आकुल है। जाने कैसे उसकी पीड़ा, उसके एहसास मेरे जिस्म में महसूस हो रहे हैं।’
‘हो सकता है तुम्हे कोई बीमारी हो गयी है। किसी और की कसक तुम्हे कैसे अनुभव हो सकता है। ये तुम्हारे ही शरीर की पीड़ा होगी।’, मैंने झुंझला कर कहा था। इस झंझट के लिए मैं खुद को कसूरवार ठहरा रहा था, ना मै केरीम को यहाँ लाता, ना ये अजीब उलझन पैदा होती।
उसने कहा, ‘बीमार तो उसी दिन हो गयी थी, जिस दिन तुम उसे पहली बार साथ लाये थे। वो कहीं आसपास नहीं होता, लेकिन उसकी साँसें मुझे छू जाती। रातों को नींद आना बंद हो गया, दिल वक्त बेवक्त यूँ ही धड़कता रहता है। लेकिन ये पीड़ा जो पिछले दो दिन से मेरा जिस्म महसूस कर रहा है, उसकी उत्पत्ति इस शरीर में नहीं, उस शरीर में है।’
करीब एक हफ्ते बाद, केरीम का ज्वर उतरा था। अब्दुल देदे ने कड़ी हिदायत दी कि वो tekke से बाहर ना निकले। केरीम के साथ वक्त गुजारने का मौका कम मिलता। सेमा का अभ्यास खत्म होते ही, अब्दुल देदे, उसे रसोई में काम करने भेज देते। ये जाहिर था कि वो मेरे साथ केरीम का मेल-जोल कम से कम रखना चाहते थे।
उसके ठीक होने पर जूही के शरीर और सिर का दर्द भी ख़त्म हो गया था, लेकिन दिल की बेचैनी बढ़ गयी थी। उसकी चंचलता, उसका एक्का दोक्का खेलना, मुझे अपने देस की कहानियाँ सुनाना, सब थम सा गया था। हर वक्त खोई खोई नज़र आती। जब काका बाबू आसपास नहीं होते तो मुझसे केरीम का हालचाल पूछती। काका बाबू भी उसके इस बदले अंदाज़ से परेशान थे। वो खाने पीने, घर बार का ख्याल पहले की तरह ही रखती लेकिन अब उन पर रौब जमाना, आँखे तरेर कर अपनी नापसन्दी जाहिर करना, मछली बाज़ार जाने की ज़िद करना बंद कर दिया था। उसके इस उदासीनता की पहेली में उलझने के बजाय काका बाबू ने दूकान में देर तक रुकना, लगभग हर शाम मयखाने जाना शुरू कर दिया था। जहाँ पहले काका बाबू के मयखाने जाने पर वो घर सिर पर उठा लेती थी, अब उनके रहने ना रहने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था।
एक शाम जब मैं उनके घर पहुंचा, घर का दरवाज़ा खुला था। काका बाबू घर पर नहीं थे। मैंने देखा जूही माँ मरियम की तस्वीर के सामने बैठ, दिल पे दायाँ हाथ रखे जिक्र कर रही है। उसके चेहरे पे एक अलौकिक चमक थी। काफी देर बाद जब उसने आँखें खोली तो खुश नज़र आ रही थी।
मैंने कहा, ‘आज कल तुम्हे इस मातृहीन की कोई फिक्र नहीं। कब से इन्तेजार कर रहा हूँ कि तुम्हारी आँखें खुले और मुझ पर कृपा दृष्टि की बौछार हो। कुछ खाने को मिले।’
उसने हँस कर कहा, ‘मुझे पता ही नहीं चला तुम कब आये। बस थोड़ा सा सब्र और रखो, मैं तुम्हारे लिए बुल्गर पिलावी बना दूंगी।’
मैंने उससे पूछा, ‘ये माँ मरियम की तस्वीर तुम्हे कहाँ मिली।’
उसने जवाब दिया, ‘गली के कोने वाले मकान में निकोल रहती है। वो Greek orthodox है। ये तस्वीर उसने बनाया है। यूँ समझो कि माँ ने अपनी तस्वीर निकोल के हाथों से मेरे लिए बनाया। निकोल को सपना आया कि माँ मरियम उससे कह रही है कि मै बहुत पीड़ा में हूँ, मुझे सहानुभूति और मदद की जरूरत है। लकड़ी का तख़्त और रंग ले कर बैठ गयी। अपने हाथ, अपना मन माँ मरियम के हवाले कर दिया और ये तस्वीर तैयार हो गयी। इसे हाथ में लिए, मुझे ढूंढती हुई वो यहाँ आ गयी। अब वो मेरी अच्छी सहेली बन गयी है। दोपहर को घर के काम काज निपटा कर मेरे पास आ कर बैठती है। मुझे माँ मरियम और इशु की कहानियाँ सुनाती है। Greek और तुर्की खाना भी बनाना सिखाती है।’
मैंने पूछा, ‘इस तरह जिक्र करना भी उसने सिखाया?’
वो बोली, ‘नहीं ये तो उसने सिखाया। वो मुझे मुराकबा(meditation) भी सिखा रहे है।’
उसके चेहरे की हया से ये जाहिर था कि उसका इशारा केरीम की ओर था।
‘केरीम से कब मिली तुम। उसे तो tekke से बाहर कदम तक रखने की इज़ाज़त नहीं है।’
जूही बोली, ‘इश्क को भला कोई कैद कर सका है। मुझसे मिलने के लिए उसे tekke से बाहर निकलने की जरूरत नहीं है। वो तो मेरे सीने में जब चाहे आ जाते है। रोज़ उनसे कितनी बातें होती है।’
मै हैरान उसके चेहरे की ओर देख रहा था। मुझे लग रहा था कि वो पूरी तरह से बावरी हो गयी है।

