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Nandita Ramesh

Classics

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Nandita Ramesh

Classics

शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग १)

शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग १)

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मेरा बचपन कोन्या के गली कुचों में, वहाँ के कॉफ़ीघरों में, वहाँ के मयखानों में, वहाँ के खानखाओं और दरगाहों में बीता। जबसे मैंने होश संभाला, अपने आप को अदिल मामू के साथ पाया। वो मेरे पिता भी थे और माता भी। मुझे साथ लिए वो सारा शहर घूम आते थे। जहाँ बैठ जाते, उनके चारों तरफ महफ़िल जम जाती। उनकी दिलकश आवाज़ और गाने के हुनर के कायल, अमीर भी थे और फ़क़ीर भी। वो धनी लोगों के जलसे में भी गाते थे और दरवेशों के नृत्य समाराहों में भी। अदिल मामू की कहानियां भी उनकी गायकी की तरह मशहूर थी। इब्नबतूता की रिहला उन्हें मुंह जुबानी याद थी। उनकी यात्रायों का वर्णन मामू इस तरह करते थे कि सुनने वाले को ऐसा महसूस होता था, जैसे वो विदेश की वादियों में पहुँच गए हो। पूर्वी अफ्रीका के कैरो शहर से सुदूर चीन के बीजिंग शहर, बगदाद, बसरा, समरकंद, जेरूसलम जैसे कई शहरों का चित्रण लोगों के मन को मोह लेता था। मुझे सबसे ज्यादा पसंद था, इब्नबतूता के हिंदुस्तान में बिताये दिनों के बारे में सुनना।

दिल्ली के सुल्तान, मुहम्मद इब्न तुगलक, का मुस्लिम विद्वानों के प्रति उदारता के बारे में सुनकर इब्नबतूता ने दिल्ली के दरबार में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। क्रीमिया, खीवा, बुखारा होते हुए अफगानिस्तान के मार्ग से वो कई सौगातों के साथ हिंदुस्तान पहुंचे। बड़े चतुराई से उन्होंने सुल्तान का मन जीतने के लिए उपहार इकट्ठा किया - कई ऊंट, तीस घोड़े, दास, दासियाँ, उम्दा हथियार और अन्य सामान। जब वो दिल्ली पहुंचे तो मुहम्मद तुगलक दिल्ली में नहीं थे। सुल्तान को इब्नबतूता के आने की खबर मिली। उन्हें इब्नबतूता के इल्म और साहस की जानकारी थी, उनसे मिले बगैर ही सुल्तान ने उन्हें ५००० चाँदी के दीनार की तनख्वाह पर, राजधानी का काज़ी नियुक्त किया। कुछ दिनों बाद जब सुल्तान दिल्ली लौटे, इब्नबतूता उनसे मिलने गए। सुल्तान ने उनकी बड़ी आवभगत की और उनके आने पर अपनी ख़ुशी जाहिर की। इस पद पर पूरे सात बरस रहकर, इब्नबतूता को अत्यंत निकट से सुल्तान को देखने और परखने का अवसर मिला।

हाथी पर बैठ, सुल्तान का दिल्ली की सड़कों में सोने और चाँदी की दिनारो की बरसात करने की कहानी सुनकर मेरी आँखे खुली की खुली रह जाती। सुल्तान जिस पर मेहरबान होते उसे मालामाल कर देते, लेकिन अपने आलोचकों के साथ बड़ी बेरहमी से पेश आते थे। सुल्तान के क्रूर-कृत्यों की कहानियां सुन कर मेरे रोंगटे खड़े हो जाते थे, उनकी सनकी योजनायों का बयान मामू बड़े मजेदार ढंग से करते थे।

इब्नबतूता का दिल्ली में बिताया वक्त सनसनीखेज और दिलचस्प था, पर उन्होंने बंग और कामरू देश में जो दो महीने बिताये, वो मुझे रोमांचक लगते थे। जब मामू, इब्नबतूता के चटगाँव से होते हुए कामरू के पहाड़ो की यात्रा का वर्णन करते तो मेरी आँखों में एक सपना पलने लगता। पहाड़ो से घिरे हरी वादियों और नदी नालों का वो देश मानो हाथ फैलाये मुझे अपने आगोश में आने का न्यौता देने लगता। इब्नबतूता ने ये सफ़र बंग देश के मशहूर सूफी संत जलालुद्दीन से मिलने के लिए किया था। इस संत के चमत्कारों, अलौकिक शक्तियो, और भविष्य वाणियों की चर्चा उन्होंने दिल्ली में सुनी थी। लगभग एक महीना नावों में सफ़र करते हुए नदी के जरिये इब्नबतूता संत जलालुद्दीन के खानखा पहुंचे थे। जब वो खानखा से दो दिन की दूरी पर उनकी नाव रुकी, तो इब्नबतूता से मिलने कुछ लोग आये और उनका आवभगत करते हुए उन्हें अपने साथ ले गए। पीर बाबा ने अपने मानसिक ताक़त के ज़रिये ये जान लिया था कि एक अफ़्रीकी पर्यटक नदी के रास्ते उनसे मिलने आ रहा है। उस गोरे, ऊँचे कद के, सिर्फ दूध और दही का सेवन करने वाले अल्पहारी, मितभाषी पीर के साथ इब्नबतूता ने सिर्फ तीन दिन बिताये थे। जाने क्यों, इस महान पर्यटक के विश्व भ्रमण की अनेक कहानियों में से ये मामूली तीन दिन मुझे अहम् लगते थे। मै मामू से उस देश के बारे में, उस संत के बारे में कई सवाल करता जिनके जवाब उनके पास नहीं थे।


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