STORYMIRROR

Nandita Ramesh

Others

4  

Nandita Ramesh

Others

शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ५)

शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ५)

7 mins
435

भाग १ से ४ के पश्चात।।।।।

Continuation of earlier episodes published with the same name।।।


रूम सल्तनत के मेवलाना, रूमी, जिनके इल्म, बुद्धिमत्ता और सदाचार की चर्चा दूर दूर तक थी, जिनके उपदेश सुनने और फतवे लेने देश-देशांतर से बड़े-बड़े अमीर और विद्वान् आया करते थे। लोगों को सही मार्ग दिखाने और मजहबी शिक्षा देने में दिन रात व्यस्त रहा करते थे। फिर उनकी मुलाक़ात शम्सुद्दीन तबरेज़ी से हुई। शम्स घुमक्कड़ दरवेश थे, ना कोई घर ना ठिकाना। उनसे मिलने के बाद रूमी में ऐसा बदलाव आया कि उन्होंने मौलवी का चोगा उतार कर फ़क़ीरों का ख़िरक़ा पहन लिया। मदरसे में शरियत सिखाना, लोगों को मजहबी सलाह देना, कुरान और अहादीस की चर्चा, हर जुम्मे को शहर के बड़े मस्जिद में प्रवचन देना छोड़ कर अपना सारा वक्त शम्स के साथ गुजारने लगे। कविताये लिखने लगे और नाच गा कर अपने भाव व्यक्त करने लगे। समाज के बनाये नियमों को ख़ारिज कर वो अपने दिल की सुनने लगे। किताबी ज्ञान को त्याग उन्होंने कुदरती समझ को अपना लिया। उनकी दीवानगी देख उनके परिवार के लोग और उनके मुरीद परेशान हो गए, शम्स के तत्त्व ज्ञान को समझने की मति सिर्फ चंद मुरीदों में थी। बाकियों को उनकी बातें बेतुकी लगती। रूमी पर उनका प्रभाव उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाता था। फिर एक दिन शम्स गायब हो गए। रूमी ने उन्हें बहुत तलाशा पर शम्स कहीं ना मिले। शायद उनका उनके विरोधियों ने उनका क़त्ल कर दिया था। ये कहानी मामू से कई बार सुना था मैंने, लेकिन कभी समझ नहीं पाया था।

अगले हफ्ते सेमा देखते हुए मस्ती और स्फूर्ति के एहसास ने एक बार फिर मुझे रोमांचित कर दिया था। कभी मुझे लगता था कि मैं सेमाजन बन घूम रहा हूँ, कभी ऐसा लगता मैं कुदुम बजा रहा हूँ, तो कभी ऐसा लगता मेरा अस्तित्व सिर्फ बांसुरी के उस क्रन्दन में है, जो वन से अलग होने की पीड़ा का इजहार कर रहा है।

सेमा खत्म होने के बाद हम एक बार फिर tavern में जा बैठे। एफेंडी रूमी और शम्स के पहली मुलाक़ात की कहानी बताने लगे।

तब्रिज में जन्मे शम्स, आम बच्चों से अलग थे। फरिश्तों के दीदार और उनसे हुई बातों की कहानियाँ सुन, उनके घरवालों ने ये मान लिया था कि शम्स कल्पना की दुनिया में रहते है, उन्हें वास्तविकता की कोई समझ नहीं है। आस पास रहने वाले उनके बाप से शिकायत करते कि शम्स अजीब बातें करता है, मुहल्ले के बच्चों को गुमराह करता है। घर और मोहल्ले के दमन से परेशान हो कर शम्स ने कम उम्र में घर छोड़ दिया और दर दर भटकने लगे। हर मुकाम पे उन्हें मुर्शीद मिल जाता था। कभी साधुओं के साथ गुफाओं में तपस्या करना, कभी दरवेशों के साथ झूमना नाचना, कभी झाड़ फूंक करने वाले ओझाओ के साथ पूर्णिमा की रात में चाँद का आह्वान करना, कभी सूरज के उपासकों के साथ टकटकी लगाये घंटो सूरज को निहारना , कभी मंदिरों में पूजा अर्चना में डूब जाना, तो कभी गिरिजाघर के संगीत में खो जाना, कभी मस्जिद में बैठ घंटो अल्लाह का जिक्र करना। बस धर्मं और जाती के संकीर्ण दायरे में बंधने से बचे रहते। कभी भटकते हुए ऐसी जगह पहुँच जाते जहाँ इंसान का नामोनिशान नहीं। कुदरत को अपना मुर्शीद बना कर कभी धूप में तपती रेगिस्तान में रेत के टीलों से, कभी हड्डियों को कंपा देनेवाली ठण्ड में बर्फीले पहाड़ों से, कभी घने जंगलों से तो कभी अथाह समंदर से पाठ पड़ते। फिर समाज और संस्कृति में लौट कर मानव चरित्र का अध्ययन करते। कभी लोगों को खुशियाँ मनाते देखते, प्रेम विभोर हो पराये सुख के लिए सब कुछ लुटाते देखते, तो कभी दुःख में बिलखते देखते, नफरत की आग में जल, दुसरों का सुख चैन लूटते देखते। कभी मानवता का परोपकारी रूप देखते, तो कभी उसका लोभी हैवान स्वरुप। कहीं कुदरत का नैसर्गिक सौंदर्य देखते तो कहीं उसका विषम रूप। सूफ़ियों के सबसे ऊँचा मक़ाम – ‘हकीकत’ उनके बहुत करीब थी लेकिन उस पदान तक पहुँच नहीं पा रहे थे।

एफेंडी की बातों को मैं ध्यान से सुन रहा था। मैंने पूछा ‘ये हकीकत क्या होता है?’

वो बोले, “सूफी संतों की साधना में चार मकाम बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं- शरीअत , तरीकत , मारिफत तथा हकीकत। शरीयत में सदाचरण , कुरान शरीफ का पाठ , पांचों वक्त की नमाज , अवराद यानी मुख्य आयतों का नियमित पाठ , अल्लाह का नाम लेना , जिक्रे जली अर्थात बोलकर या जिक्रे शफी यानी मुंह बंद करके अल्लाह का नाम लिया जाता है। उस मालिक का ध्यान किया जाता है। उसी का प्रेम से नाम लिया जाता है। इस शरीअत के बाद पीरो मुरशद अपने मुरीद को अपनाते हैं , उसे रास्ता दिखाते हैं। इसके बाद शुरू होती है तरी-कत। इस में संसार की बातों से ऊपर उठकर नफ्स(Ego) को जीतना होता है। तब जाकर मारिफत की पायदान पर आने का मौका मिलता है। फिर इश्क के समुन्दर में खो कर, खुदा को पाना होता है। कहते है हकीक़त तक पहुँचने पर दिव्य ज्ञान मिल जाता है, सृष्टि का रहस्य समझ आ जाता है।”

मेरे चेहरे को देख एफेंडी भांप गए थे कि बात मुझे पूरी तरह समझ नहीं आ रही थी। बोले, “मै भी सुनी सुनाई बोल रहा हूँ। इन सिद्धांतो को समझने के लिए सूफी बरसों चिंतन, मनन और आराधना करते है।”

फिर उन्होंने रूमी और शम्स की कहानी को आगे बढ़ाया–

शम्स को अहसास था कि वो अधूरे है, उनके रूह का दूसरा हिस्सा किसी और जिस्म में बसा है। जब दोनों हिस्से मिल जाएँ, तभी वो खुदा तक पहुँच सकते हैं। उन्हें पैश-अंदेश (पूर्वाभास) था कि उनका दूसरा हिस्सा उनके रूह की आवाज़ को शब्दों में तराश कर दुनिया को पेश करेगा, लोगों के दिल तक पहुंचाएगा। दोनों मिल ऐसे बेशकीमती रचना करेंगे, जो आने वाले कई पीढ़ियों को भौतिक नींद से झकझोर कर अलौकिक प्रेम की झलक दिखाएंगे। वो खुदा से दिन रात दरख्वास्त करते, अपने उस साथी, उस दोस्त, उस प्रेमी तक पहुँचने की राह पूछते।।

उन्हें सपने में ये शहर कोन्या दिखने लगा, एक ख़ूबसूरत चेहरा दिखने लगा जिसकी उदास आँखों से प्रेम और करुणा छलकता था। यहाँ के मेवलाना रूमी को ढूंढते हुए वो कोन्या आ पहुंचे। रूमी मस्जिद में बड़ी सभा को सम्भोदित कर अपने सुन्दर सफ़ेद घोड़े पर सवार घर लौट रहे थे तो शम्स घोड़े के सामने आ गए। अपने दोनों हाथों को उठा कर घोड़े को रोक दिया। रूमी, हीरे-मोती जड़े सफ़ेद कपड़े पहने, सिर में बारिक कढ़ाई की हुई कीमती टोपी, संवारी हुई दाढ़ी में सजीला चेहरा। काली गुदड़ी पहने शम्स, मुंडाये हुए सिर और चेहरे में एक भी बाल नहीं, यहाँ तक की भौंहें भी नहीं, दमकती आँखों में ज्ञान का तेज। जब दोनों की नज़रें टकराई तो रूमी को लगा जैसे उनका हर एक रोम जग उठा हो। नस नस में स्फूर्ति का एहसास हो रहा था, उनके दिल में एक खिड़की सी खुल गयी थी, एक डोर थी जो शम्स से निकल उन तक पहुँच रही थी। उस डोर के खिंचाव से वो घोड़े से गिर गए।

मैं मंत्रमुग्ध सुन रहा था, सुन क्या रहा था देख रहा था उस नज़ारे को जिसका वर्णन एफेंडी कर रहे थे। जाने क्यों मुझे याद आ रहा था उस हिन्दुस्तानी जादूगर का करतब जो मैंने कुछ दिनों पहले देखा था। बीन की धुन पर रस्सी पिटारे से इस तरह निकल रही थी जैसे वह निर्जीव नहीं हो कर जीता जागता सांप हो। धीरे धीरे रस्सी का एक छोर आसमान तक पहुँच गया था और जादूगर उस हवा में झूलती रस्सी पर चढ़कर आसमान में कहीं गायब हो गया था। दर्शकों की भीड़ हक्का बक्का देखते रह गयी थी।

चौदह साल की उम्र में मुझे जिंदगी एक पहेली लग रही थी, मेरे समझ से कही परे। जाने क्यूँ मुझे भी लग रहा था कि मैं अधूरा हूँ। अपने खोये हुए हिस्सों की तलाश में मुझे बहुत दूर जाना है। नीले पहाड़ो और नदीयों के उस देश में जहाँ की कपास पानी में डूब कर मजबूत हो जाती है।

कुछ हफ्तों तक ये सिलसिला चलता रहा। हर जुमे को सेमा देखने टेक्के जाना, फिर एफेंडी डेनिस की बातें सुनते हुए रात का खाना मयखाने में खाना। कभी वो मुझे अपनी लिखी प्रेम कहानी सुनाते, कभी हम दरवेशों के बारे में बातें करते। अक्सर वो रूमी की लिखी रुबाइयाँ सुनाते और समझाते।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन