शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ४)
शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ४)
दूकान से घर लौटते वक्त एक शाम अचानक एफेंडी दिखे. मै दौड़ कर उन तक पहुंचा और उन्हें सलाम किया. पहले तो वो मुझे पहचान नहीं पाए. जब मैंने शाह जलाल बाबा और मयखाने के उस शाम की याद दिलाई तो बोले, “तुम्हारा कद पहले से बहुत बड़ गया है. चेहरे पे हल्की मूँछे उभर आई है. एक अरसा हुआ तुम्हे देखे इसलिए पहचान नहीं पाया. कैसे हो?”
मैंने सकुचाते हुए जवाब दिया, “अब मै कुरान पड़ लेता हूँ.”
उन्होंने मुस्कुरा कर कहा, “अच्छा तो तुम मुझे उस वादे की याद दिला रहे हो. ठीक है, कल अस्र के एजान के बाद मुझे यही मिलना. मै तुम्हे अपने साथ ले चलूँगा.”
अगले दिन मैंने काका बाबू से जल्दी छुट्टी ली और एफेंडी डेनिस से मिलने निकल पड़ा. वो मुझे एक सभागृह में ले गए. वहाँ बीच में एक गोल चबूतरा था. उसके चारों ओर लोग बैठे हुए थे. हम भी खाली जगह ढूंढ कर बैठ गए. कुछ देर में सभागृह खचाखच भर गया. शोर गुल में बैठे सोच रहा था कि एफेंडी मुझे कहाँ ले आये है.
एफेंडी बोले – ‘सेमा समारोह मेवलेवी सूफ़ियों की एक ख़ास रस्म है. इसमें भाग लेने वालों को सेमाजन कहते है. ये एक तरह का ध्यान है. सेमा करने वाले ही नहीं बल्कि देखने वाले भी ट्रांस में चले जाते है. बस थोड़ी देर में तुम इस जादू को अनुभव करोगे’
कुछ समय बाद, एक दूर से आती हुई मनोरम धुन सुनाई पड़ी. वातावरण का कोलाहल कुछ शांत हुआ. धीरे धीरे ये मर्मस्पर्शी बांसुरी की आवाज़ करीब आने लगी और सभागृह में चुप्पी छा गयी. फिर भूरे शहद रंग की लम्बी टोपी, सफ़ेद लहरिया घाघरा और काला चोगा पहने पुरुषों का दल सभागृह के बीच स्थित चबूतरे में उपस्थित हुआ. उन्होंने गोलाकार गठन बनाया जिसके बीच में सफ़ेद दाढ़ी वाले एक बाबा कुरान की आयतें गाने लगे. कुदुम के ताल के साथ झूमते हुए बाबा को घेरे वो उनके चारों ओर घुमने लगे. ऐसा लगता था जैसे वो सब कमल के फूल की पंखुड़ियाँ हैं, शरीर अलग अलग लेकिन शख्शियत एक. मै सम्मोहित सा उनके इस सामंजस्य को देखता रहा.
कुदुम की ताल कुछ तेज हुई, सेमाजनों ने काले चोगे उतार कर एक तरफ रख दिए. बीच में बाबा की जगह एक युवक ने ले ली. वो गा रहा था-
सुनो बाँस की विरह कथन,
वन से दूर, रोवे है तनमन,
सुर में जो बस गई है क्रन्दन,
सुन उसे भर आये दो नयन
मसनवी का ये छंद मैंने मामू के जुबान से कई बार सुना था पर पहली बार मै उसके एहसास को महसूस कर रहा था. नृत्य ने भी अलग रूप धारण कर लिया था. अब नृतक अपनी अपनी धुरी में चक्कर ले रहे थे, सफ़ेद घाघरों में जैसे खुद की एक अलग जान आ गयी थी, सेमाजनों के चारों ओर एक सफ़ेद वृत्त सा बन गया था. बांसुरी की धुन, कुदुम की ताल, गाने वाले की आवाज़, घुमावदार सेमाजन और उनके घाघरे, उस समा में ऐसा जादू था कि मै भी महज़ दर्शक नहीं रह गया था, उसका हिस्सा बन गया था.
सभा से लौटते हुए मै बाँस की विरह कहानी के बारे में सोच रहा था. एफेंडी से पूछ बैठा, “आप अपना देश छोड़ यहाँ क्यों हो? आप यहाँ क्या खोज रहे हो?”
एफेंडी के कदम रुक गए. उन्होंने कहा, “मै इश्क का मायने ढूंढ रहा हूँ. अभी तुम मासूम हो, मेरी कहानी शायद समझ नहीं पाओगे.” फिर जाने क्या सोच कर बोले, “चलो टेवर्न में बैठ कर बातें करते है. तुम्हे भूख लगी होगी.”
हम उस मेज पर जा बैठे जहाँ चार साल पहले उन्होंने मुझे कुरान पड़ने की हिदायत दी थी. एफेंडी ने लवाश (रोटी) और कबाब मंगवाया. खुद के पीने के लिए राकी(सौफ की महक वाली तुर्की शराब) और मेरे पीने के लिए शालगम (गाजर का रस).
खाने के साथ, एफेंडी मुझे अपनी कहानी सुनाने लगे. पेरिस में उनकी लिखी प्रेम कहानियाँ पर आधारित नाटक बेहद लोक-प्रिय हुआ करती थी. लोग उन्हें प्रेम का उस्ताद मानते थे. मायूस प्रेमी उन्हें घेरे रहते, उनसे प्रेम में फ़तेह पाने के नुस्खे सीखने. खूबसूरत युवतियाँ उनकी कहानियों में अपनी छवि देख कर उन्हें प्रेम-पत्र लिखती, उनसे मिलने की उत्सुकता जाहिर करती. लेकिन वो उन सुंदरियों को टाल देते. उन्हें तो इंतज़ार था, अपने सपनों की रानी का, जिसे देखते ही उनके दिल की घंटियाँ बज उठे, ठीक उसी तरह जैसे उनके कहानियों के नायकों के दिल में बज उठती थी अपने प्रेयसी के दर्शन पर.
आगे की कहानी एफेंडी के शब्दों में -
नाटक के प्राभ्यास के दौरान एक दिन मेरी नजरें उस पर पड़ी. उसकी नजरें झुकी हुई थी, उसके हाथों में नाटक का आलेख था. वो बड़े मनोयोग से उसे पढ़ रही थी. मेरी आँखे उसके चेहरे से हटती ही नहीं थी, वो मेरे कहानियों की नायिकाओं से ज्यादा हसीन थी. ऐसा रूप ना मैंने पहले देखा था, ना उसकी कल्पना की थी. मै मदहोश सा उसे ताक रहा था. उसकी नजरें उठी, एक पल के लिए मेरी नजरों से मिली फिर झुक गयी. मै बेहाल हो गया.
नाटक के प्रबंधक ने मुझे बताया कि उसका नाम मारिया है. वो मेरे लिखे नाटक में नायिका की अदा निभाना चाहती थी. लेकिन उसे अभिनय का कोई तजुर्बा नहीं था. उसके अदाकारी में हिचकिचाहट थी. प्रबंधक ने मुझसे कहा कि अगर मै उसे संवाद पेश करने की कला सिखाऊँ तो वो उसे नायिका की भूमिका दे सकते हैं. उसके करीब आने का ऐसा सुनहरा मौका मै कैसे गँवा सकता था. झट हामी भर दी.
तीन महीने बाद जब नाटक मंच पर खेला गया तो लोग उसके रूप के ही नहीं उसकी अदाकारी के भी कायल हो गए. लोगों की वाहवाही लूटने के बाद जब वो मेरा शुक्रिया अदा करने आई, तो मैंने अपने प्यार का इजहार किया. उसकी शरमाई हुई झुकी पलकों में इकरार था. मैंने उसे बाँहों में भर लिया और हम एक दुसरे में खो गए. अगले दो साल हम प्रेम में इस कदर खोए हुए थे कि हमें बाकी दुनिया का एहसास ही नहीं था.
फिर एक दिन इर्ष्या के जहरीले सांप ने मुझे डंस लिया. कोई उसकी ओर देखे तो मेरे तन-मन में आग जल उठती थी. मै हर वक्त खिजा रहता. वो मेरे बदमिजाजी को देख सहम सी गयी थी. जब मै आसपास होता तो वो खामोश रहती. लेकिन जब उसे लगता कि मै उसे नहीं देख रहा हूँ तब वो मुस्कुरा कर दुसरे पुरुषों से बात करती, उनकी बातें सुन खिलखिला कर हँसती. उसकी अदायगी देख कर मेरा मन करता कि उसे काली कोठरी में बंद कर ताले में रखूँ, दुनिया की नज़रों से दूर.
प्रबंधक ने मेरे अगले नाटक का प्रकाशन बड़े धूम-धाम से किया था. प्रधान नायक का किरदार निभा रहे थे, पेरिस के मशहूर अभिनेता सिल्वेस्टर निभा रहे थे. नायिका की भूमिका मारिया कर रही थी. मै दर्शकों में बैठ देख रहा था. सिल्वेस्टर और मारिया के अभिनय ने मेरी कहानी को जीवित कर दिया था. उनके बेमिसाल पारस्परिक भाव देख दर्शक अभिभूत थे. मेरे अन्दर एक अजीब कशमकश चल रही थी. एक पल मेरा मन अपनी लिखी कहानी को साकार देख उल्लासित हो, अगले पल मारिया और सिल्वेस्टर की निकटता देख खिन्नता से भर उठता. एक पल सिल्वेस्टर के चेहरे में मै खुद को देखता और मेरा मन प्रेम से भर उठता, अगले पल उसी चेहरे में प्रतिद्वंदी को देख मै नफरत से भर जाता. इस आकर्षण और विकर्षण के द्वन्द से जूझता मै मूर्छा गया था. जब आँखे खुली तो मेरे बिस्तर के बगल में एक पादरी बैठे थे. बोले, “मै तुम्हारे बगल वाली कुर्सी पर बैठ कर नाटक का लुत्फ़ उठा रहा था. तुम बेहोश क्या हुए, मेरा देखना रह गया. ये कहानी तुमने लिखी है ना, बताओ आगे क्या होता है? क्या नायक नायिका से विवाह कर लेता है और दोनों आनंद से जीवन व्यतीत करते है.”
मैंने उनकी बात का जवाब नहीं दिया बस फटी आँखों से छत को देखता रहा. उन्होंने कहा, “ये क्या? मैंने तो सुना था की लोग तुम्हे प्रेम का चारागर कहते है, तुम तो बीमार लगते हो.”
मेरे आँखों से बहते पानी को देख उन्होंने कहा था, “बेटा, तुम प्रेम को जागिर समझ बैठे, इसलिए तकलीफ में हो. प्रेम तो समर्पण है, इसमें हार कर जीतना पड़ता है. प्रेम तो एक उड़ान है, रहस्यमय आसमान की ओर, हर पल सौ पर्दों का उठना, जीवन की डोर को आजाद कर, बगैर पाँव के चलना.”
उनकी बातें समझ नहीं आ रही थी, फिर भी कहीं दिल को झकझोर कर कह रही थी, “तू आया है यहाँ इश्क की दीवानगी समझने, अभी सबक बहुतेरे है बाकी, निकल पड़ खोज में.” और मै यहाँ आ गया, इश्क के सरताज रूमी के देश में.
मै चुपचाप सुन रहा था और सोच रहा था, ‘क्यों करते हैं लोग प्रेम? क्यों मोल लेते है ऐसा दर्द?’. मै उनसे पूछना चाहता था, ‘क्या उन्हें इश्क की दीवानगी समझ आ गयी?”
वो शायद मेरे अन्दर का प्रश्न भांप गए, बोले, “अभी भी सतह में तैर रहा हूँ. इतना समझा हूँ कि इश्क के समुन्दर में गोता लगाना है, तो खुद को खोना होगा. ये हिम्मत मैं जुटा नहीं पाया हूँ.”
खाना खत्म कर जब हम tavern से निकले , मैंने कहा, “एफेंडी, क्या आप मुझे फिर ले चलेंगे सेमा देखने.”
“ठीक है, अगले जुम्मे को सेमा भी देखने जायेंगे और मै तुम्हे रूमी और शम्स की कहानी भी सुनाऊंगा.”
