शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ७ )
शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ७ )
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इस तरह दो साल बीत गए। काकाबाबू की दूकान अब पुरे शहर में ही नहीं, बल्कि पुरे प्रान्त में मशहूर थी। काकाबाबू ने मुझे साझेदार बना लिया था। दूकान में अब चार नौकर काम करते थे। बिक्री का हिसाब रखना, नौकरों से काम करवाना, दूकान बंद करने से पहले सब सामान हिफाजत से रखना – ये सारे काम मै काकाबाबू की तरह दक्षता और लगन से करता था। घाटे और मुनाफे की समझ भी मुझमे तेज थी, काकाबाबू को मै दूकान के विकास की सलाह देता जिन पर अमल कर दूकान की समृद्धि दिनोदिन बढ़ रही थी। एक दिन काकाबाबू बोले, ‘हसन, मै कुछ दिनों के लिए घर जाना चाहता हूँ। तुम दूकान संभाल लोगे’। कई महीनों बाद जब वो लौटे तो लाल रेशम में लिपटी, गुडिया जैसी दुल्हन साथ थी। काकाबाबू ने कहा, ‘ये जूही है, तुम्हारी काकीमाँ। इसे तुर्की भाषा और यहाँ के तौर तरीके सिखाना तुम्हारी जिम्मेदारी है।’
इस दौरान दूकान बंद करने के बाद मैं अक्सर mevlevi टेक्के जाने लगा था। मुरीदों को चक्करदार नाच का अभ्यास करते देखता। मुझे मसनवी की कई चौपाईयां याद हो गयी थी। मौका मिलने पर मै गा कर और कुदुम बजा कर उनके अभ्यास में साथ देने लगा था। वहाँ केरीम से मेरी दोस्ती हो गयी। हम दोनों घंटो बातें किया करते थे।
केरीम उस वक्त tekke का सबसे नया मुरीद था। नाच के अभ्यास के बाद उसे रसोई में काम करना पड़ता था। बड़े बर्तन मांजना और फर्श पोंछना उसे कतई पसंद न था। केरीम इस्ताम्बुल के संपन्न परिवार में पैदा हुआ था। सात भाइयों में सबसे छोटा, अपनी अम्मी का दुलारा। उसके बड़े भाई सुल्तान के दरबार और सेना में ऊँचे पद में काम करते थे। उनमे से चार ऑस्ट्रियाई हाप्सबर्ग साम्राज्य से लड़ने वियना गए थे। महीनों की मशक्कत के बाद उनमें से केवल दो ही वापस आए थे, वह भी घायल और बीमार। उनके बाबा ने उन्हें बचपन से महत्वाकांक्षा, भौतिक प्रगति, युध्ध भूमि में शूरवीरता की प्रेरणा दी थी।
केरीम के पूर्वज सदियों से इस्ताम्बुल यानी कस्तुनतुनिया में रहते आये थे। वे Greek orthodox हुआ करते थे। उसके दादा ने दरबार में तरक्की के खातिर इस्लाम धर्म अपना लिया था। लेकिन उनकी दादी और अम्मी के कमरे में माँ मरियम की तस्वीर अब भी मौजूद थी। वे हर रोज उनसे अपने परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती। केरीम की अम्मी अध्यात्मिक थी। घर के काम-काज ख़त्म करने के बाद वो अक्सर प्रार्थना की मोती माला हाथ में लिए, घंटो जप करती थी। केरीम भी अपनी माँ के साथ बैठ कर माँ मरियम का नाम जपता था। केरीम को सियासी मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वो अपने भाईओं की तरह दरबारी या सैनिक नहीं बनना चाहता था।
केरीम के अब्बा को उसके रूहानी रुझान में उज्जवल भविष्य की सम्भावना दिखी। सुल्तान का झुकाव मेवलेवी परंपरा के सूफ़ियों की ओर है। सुल्तान ने अपने अन्तरंग सलाहकार और दरबार में ऊँचे पदों में इस tekke के स्नातकों को नियुक्त किया था। वे केरीम को घर से मीलों दूर यहाँ के tekke में दाखिल करवाने ले आये थे। यहाँ स्वीकृत होने के लिए उसे नाकों चने चबाने पड़े थे। कई सवालों के जवाब देने पड़े थे, ये जताने के लिए कि उसकी फितरत और अक्ल इस विद्या के काबिल है। फिर उसे इस राह की कठिनाई से वाकिफ कराया गया था। फिर तीन दिन तक रसोई में बैठना पड़ा था ताकि वहाँ की गतिविधियों को देख कर उसे आने वाले दिनों का अंदेश हो जाए। उन तीन दिनों में उसे इस कदर नज़रंदाज़ किया गया था जैसे वो नामौजूद हो। जब ये साबित हो गया था कि वो अपने इरादे में अटल है, तब उसे tekke के शेख, हुस्रेव चेलेबी के सामने प्रस्तुत किया गया था। लम्बी टोपी पहना के उसे tekke में शामिल करने की रस्म अदा कर एक हज़ार एक दिन के कार्यक्रम की शुरुआत की गयी थी।
मैंने केरीम से पूछा था – ‘यहाँ ऐसा क्या सिखाया जाता है जो मदरसे से अलग है?’
उसने मुझे बताया था – ‘इल्म दो तरह की होती है, ज़ाहिर और बातिन। ज़ाहिर, इस्लाम के नियम कानून और बाहरी दुनिया की समझ से वाकिफ कराती है। ये तालीम मदरसे में दी जाती है। यहाँ हम बातिन याने अंदरूनी दुनिया के रहस्य को जानने आये हैं। देदे रास्ता दिखाते है, रिवाज बताते है, तलाश में मदद करते है, लेकिन पहेली का हल हमें खुद ढूँढना है।’
केरीम के मुर्शीद, अब्दुल देदे, मेरा गाना और कुदुम बजाना पसंद करते थे। उन्होंने मुझे दायाँ हाथ दिल पे रख कर दिल की धड़कन सुनते हुए, उसके ताल में अल्लाह का ज़िक्र करना सिखाया था। वो मुझसे कहते थे – ‘तुम्हारे संगीत से ये महसूस होता है तुम खुदा के क़रीब हो। जब भी समय मिले, अल्लाह की फिक्र और ज़िक्र किया करो, उन्हें हर जगह, हर चीज़ में महसूस किया करो।’
अट्ठारह साल की उम्र में, मैंने केरीम में अपने जीवन के पहले दोस्त को पाया। लगभग उसी समय, महिलाओं के दिलचस्प दुनिया से भी मेरा परिचय हुआ। इन अट्ठारह बरसों में जिंदगी ने मुझे औरत की संगत से वंछित रखा था। औरतों को सिर्फ दूकान में ग्राहक के रूप में देखा था। माँ का प्यार, बहिन का स्नेह या चाची, मामी जैसे रिश्तों का लाड़ देखने का मौका नहीं मिला था। सुदूर बंग देश से आई काकीमाँ ने ये सारी कमियां पूरी कर दी।
शुरू में वो बेहद शर्मीली थी। मुझे देख कर अपना चेहरा कपड़े से ढक लेती। काकाबाबू बताते थे कि वो अपने देश, माता पिता, भाई बहिन, संगी साथियों को याद कर उदास रहती थी। छोटी छोटी बातों से उसके आँखों से आँसू के फुव्वारे निकल आते। काकाबाबू उसके लिए बाज़ार से रोज़ कोई न कोई तोहफ़ा खरीद कर ले जाते थे; कभी बाक्लावा या कुनेफे जैसी मिठाई, कभी कांच के मोतियों की माला, कभी चाँदी की नक्काशी से सजा आइना, कभी सलमा सितारा जड़ा कुरता। अक्सर दूकान मुझ पर छोड़ उसके साथ समय बिताने जल्दी घर चले जाते। ऐसा लगता था कि पैतीस बरस के काकाबाबू के जीवन का अब एक ही मकसद था, अपने चौदह बरस की बेगम के चेहरे में मुस्कान देखना।
एक दिन जब मै उनके घर से निकल रहा था तो उसने पीछे से बंगाली में आवाज़ दी – ‘सुनिए’। मैं चौंक के रुक गया। मुड़ के देखा तो वो देहलीज पर खड़ी थी। हमेशा की तरह उसका चेहरा कपड़े से ढंका हुआ था। मैंने अचकचाते हुए पूछा – ‘क्या बात है?’
उसने धीमी आवाज़ में कहा – ‘आप मुझे अपनी माँ, बहन से मिलाने ले जायेंगे। जब से यहाँ आई हूँ, किसी औरत से नहीं मिली। अडोस पड़ोस की औरतें मुझे ऐसे देखती हैं जैसे मैं कोई अजूबा हूँ। मेरा व्यवहार, मेरे कपडे, मेरी बोली, कुछ भी तो उनसे नहीं मिलती। यहाँ कोई मुझे सलाह देने वाला, मेरा सुख दुःख सुनने वाला नहीं हैं।’
मैंने जब जवाब दिया – ‘ना तो मेरी माँ है, न बहन।’, तो उसने अपना घूंघट हटा कर कहा था – ‘इश।।।तुम यतीम हो। अब समझ आया कि तुम्हे देख ऐसी माया का अनुभव क्यूँ होता है।’
उस दिन मैंने पहली बार उसका चेहरा देखा था – मटमैला रंग, चपटी नाक, बड़ी काली आँखे। उन आँखों में जो जज्बात थे, वैसे मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
मैंने कहा था – ‘यतीम नहीं हूँ। जबसे मैंने होश संभाला अपने मामा को पास पाया। उन्होंने बड़े प्यार से मेरी देखभाल की है।’
‘इश।।।तुम कभी माँ की गोद में नहीं चढ़े, कभी उनके हाथ का बनाया खाना नहीं खाया, कभी ज़िद करके उनसे बात नहीं मनवाई’, बोलते बोलते उसकी आँखे भर आई।
उसके भाव देख कर पहली बार माँ की कमी महसूस हुई थी। मैंने हँस कर टालते हुए कहा था –‘ मुझे ज़िद करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। मामा मेरी हर बात मान लेते। उन्होंने छह साल की उम्र में मुझे मदरसे में दाखिल करवाया था, लेकिन मुझे वहाँ के नियम कानून बिलकुल पसंद नहीं आये थे। मैंने जाने से मना कर दिया था। मामा ने बिना आना-कानी के मेरी बात मान ली थी।’
वो सिर हिलाते हुए बोली थी – ‘इश।।।तुम्हारी माँ होती तो ये बात कभी नहीं मानती। तुम पड़ लिख लेते, जिंदगी में कुछ हासिल कर लेते।’
जाने क्यों उसकी इस बात पे मुझे हंसी आ गयी थी। मैंने कहा था –‘अब तुम आ गयी हो, मेरी काकीमाँ। सारी कसर पूरी कर लेना।’
उसने कहा था –‘ठीक है, कल रात हमारे साथ खाना।’
अगले दिन काकाबाबू ने खुश हो कर बताया था – ‘तुम्हारी काकीमाँ में इतना उत्साह पहली बार देखा है। उसने यहाँ के मछली और सब्जी बाज़ार देखने की मांग की है। थोड़ी देर में मैं उसे सामान खरीदवाने ले जाऊंगा।’
शाम को दूकान बंद करने के बाद जब मै काकाबाबू के घर पहुंचा, तो जूही का बदला रूप देखा। यहाँ के औरतों की तरह सलवार कुरता पहने हुए थी। चेहरे पे कोई पर्दा न था। छोटे कद काठी की जूही, भारी भरकम काकाबाबू के सामने नन्ही लग रही थी। लेकिन उसके चाल चलन और बात चीत में रौब था। बड़े जतन और अधिकार के साथ उसने खाना परोसा था। खाने का स्वाद अलग था। पकवान भी अलग तरह के थे – रसे वाली मछली, मिलीजुली सब्जियों का मिश्रण, पीसी हुई सूखी मछली। मुझे इस तरह का खाना खाने की आदत नहीं थी। इसलिए मै थोड़ा चख के छोड़ देना चाहता था। काकाबाबू ने मेरे कान में फिसफिसा कर कहा था – ‘खा लो वर्ना अनर्थ हो जायेगा। तुम औरतों को नहीं जानते। उनके बनाये खाने की उपेक्षा, उन्हें बिल्कुल सहन नहीं होती।’
काकाबाबू खूब चटखारे लेते हुए खाने की तारीफ कर रहे थे। जूही ने कहा – ‘कैसे अच्छा खाना बनाती। यहाँ ना ढंग की मछली मिलती है न सब्जियाँ। वो तो माँ ने सूखी मछली का ढेर और मसाले हमारे साथ भेज दिया, इसलिए कुछ हद तक ठीक-ठाक बन गया खाना।’
ये कह के वो मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी। काकाबाबू आँखों से इशारा कर रहे थे। लेकिन मै समझ नहीं पा रहा था। जाने क्यों जूही का चेहरा कुम्हला सा गया, उसकी आँखों में एक निराशा सी थी। अगले दिन काकाबाबू ने दूकान में मुझे बताया था कि मेरे मुंह से अपने बनाये खाने की प्रशंसा नहीं सुन कर वो थोड़ी हताश हो गयी थी। मेरे जाने के बाद काकाबाबू ने उसे समझाया था कि माँ बहिन की संगति न मिलने के कारण मै अदब कायदे में कमज़ोर था। ये सुन कर मेरी इस कमी को पूरा करने की ठान ली थी। मुझ मातृहीन पर उसके अन्दर का वात्सल्य उमड़ पड़ा था। जहाँ एक ओर उसका स्नेह मेरे अन्दर एक नयी उमंग और उत्साह जगा रहा था वहीँ उसका लगाव मेरे आजादी में आड़े आ रहा था। देर से पहुंचने पर पर ताने सुनना, अपने हर क्रिया कलाप का हिसाब देना कई बार खल जाता।
