शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ३)
शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग ३)
भाग १ और २ से जारी। ।
Continued from Part 1 and 2
अपने आवाज़ की बुलंदी पर मैं हैरान था। पता नहीं उस जगह से मुझे कैसा लगाव था कि वहाँ की निंदा कानों में चुभ गयी थी। मेरी हैरानी और बड़ी जब कोने के मेज से आवाज़ आई, “कोन्या के एक जलालुद्दीन वो थे जिन्होंने यहाँ रह कर जिहाद किया, लोगों को उनके दिल की आवाज़ सुनना सिखाया, इश्क में डूब कर खुद को खोना सिखाया और एक जलालुद्दीन वो थे जिन्होंने यहाँ से कोसों दूर बंग देश में लोगों को खुदा का संदेसा सुनाया। ”
ये आवाज़ थी एफेंडी डेनिस की। मैंने इन्हें यहाँ अक्सर अकेले बैठ कर पीते देखा था। ये लोगों से बाते बहुत कम किया करते थे। जब मामू के आसपास कोई नहीं होता था, तब वो उनके पास आ कर धीमी आवाज़ में उनसे बतियाते थे। मेरी हर कोशिश के बावजूद उनकी चर्चा के विषय मेरी समझ से बाहर थे। ‘लतीफ ए सित्ता’, कलब, नफ्स, सिर्र, रूह, मारिफत, हकीकत जैसे शब्द मेरे कानों में आते थे। मामू से पूछने पर उन्होंने कहा था कि ये तसव्वुर से जुड़े लफ्ज़ है जो मुझे बड़े होने पर समझ आयेंगे। उन्होंने ये भी बताया था कि एफेंडी डेनिस, फ़्रांसीसी कथाकार है और कोन्या के दरवेशों पर किताब लिख रहे है।
मयखाने में मौजूद सब की आँखें, अब कोने वाली मेज पर थी। एफेंडी ने कहानी को आगे बढ़ाया, “जब वो बहुत छोटे थे, उनकी माँ चल बसी। बड़े लाड से उनके अब्बा ने उन्हें पाला; माँ, बाप दोनों का प्यार दिया। जब वो महज़ पाँच बरस के थे उनके अब्बा का देहांत हो गया। उनके मामा Syed Ahmad Kabir Suhrawardi उन्हें अपने साथ मक्का ले गए। उनकी परवरिश वहाँ उनके मामा के खानखा में हुई। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और अटूट निष्ठा से वो जल्द ही शरियत और तरिक़त में माहिर हो गए। तीस बरस अध्ययन, चिंतन, मनन में डूबे रहने के बाद उन्हें कमालियत हासिल हुई। उनके सपनों में पहाड़ों से घिरी वादियाँ, नदी और झरने आने लगे। वो सपनों की धरती उन्हें पुकार रही थी। जब उन्होंने अपने मामू को जो उनके मुरशिद भी थे, इस सपने के बारे में बताया तो मामा ने उनके हाथ में मुट्ठी भर मिट्टी दे कर कहा था – ‘जहाँ की मिटटी का रंग, रूप, स्वाद, सुगंध, अहसास इस मिट्टी से हूबहू मिल जाए, वो होगी तुम्हारी दारुल-हरब। ” चंद मुरीदों के साथ वो उस जमीन की खोज में पूरब की ओर चल पड़े थे। मक्का, फारस, बग़दाद, मुल्तान और ऊछ से होते हुए वे दिल्ली की ओर चल पड़े। जहाँ से वो गुज़रते, लोग उनके साथ हो लेते थे। जब काफिला दिल्ली पहुंचा तो उनके साथियों की संख्या दो-सौ-चालीस थी। जब दिल्ली में हज़रत निजामुद्दीन औलिया ने उनके आने की खबर सुनी तो अपने मुरीदों के माध्यम से उन्हें सलाम भेजा। शेख साहब ने तोहफे में उन्हें एक बक्सा भेजा। जब हज़रत ने बक्सा खोला तो दंग रह गए। बक्से में दहकते अंगारों के बीच रुई थी। रुई पर आग का कोई असर नहीं हुआ था। इस मोजिज़ा को देख हज़रत निजामुद्दीन समझ गए कि शेख जलालुद्दीन पहुंचे हुए पीर है। वो उनसे मिलने गए और बड़ी आवभगत से उन्हें अपने खानखा ले आये। ”
“ये वही निजामुद्दीन औलिया है ना, जिनके मुरीद खुसरो की नज़्म ‘आज रंग है ऐ माँ रंग है री,
मेरे महबूब के घर रंग है री’ दरवेशों की जुबान पर है”, मामू ने पूछा।
एफेंडी डेनिस ने सिर हिला कर हामी भरी और कहा, “हाँ, वो मशहूर शायर और संगीतकार अमीर खुसरो के मुरशिद थे। ”
मामू गाने लगे, सबकी नज़र हमारे मेज पर आ जमी। शराब की चुस्कियों के साथ लोग उनकी वाह-वाही में लग गए। मै एफेंडी डेनिस की मेज पर जाके उनके सामने बैठ गया। उनकी कहानी मुझे पूरी तरह समझ नहीं आई थी, फिर भी उसे सुन कर मेरे शरीर का हर एक कोष को रोमान्चित हो उठा था, नस नस में सिहरन महसूस हो रही थी।
एफेंडी तल्लीन हो कर झूमते हुए मामू को सुन रहे थे। जब गाना खत्म हुआ तो मैंने उनसे पूछा, “दरवेश आम लोगों से इतने अलग क्यूँ होते हैं? उनके चेहरों में चमक और चाल में मस्ती का राज़ क्या है?”
एफेंडी कुछ देर मुझे निष्पलक देखते रहे। फिर उन्होंने पूछा, “ये सवाल तुम मुझ से क्यों कर रहे हो?”
“आप दरवेशों पर किताब लिख रहे है। मेरे ज़हन में बहुत से सवाल है, शायद आप के पास उनके जवाब मिल जाएँ। ”
“मैं दरवेश नहीं हूँ, मैं तो मुसलमान भी नहीं हूँ। मुझसे बेहतर तुम्हारे मामा समझते है सूफी तरीकों को। तुम उनसे क्यूँ नहीं पूछते हो?”
ये सुनकर मैं चुप हो गया। मामा मेरी देखभाल पूरे दिल से करते थे, लेकिन मेरी तालीम की उन्हें परवाह न थी। जब मैंने मदरसा जाने से इन्कार किया था, तो उन्होंने मेरी बात मान ली थी। मामा के पास बहुत सी किताबें थी। वे सिर्फ तुर्की ही नहीं बल्कि अरबी, फारसी, हिन्दवी लिख पड़ लेते थे। उस वक्त, दस साल की उम्र में मैं बड़े मुश्किल से थोड़ी बहुत तुर्की पड़ लेता था। मामा इस कदर महफ़िलो में मशगूल रहते थे कि उनसे सीखने की सम्भावना कम थी।
मेरे चेहरे की मायूसी को देख शायद एफेंडी मेरे दिल की बात भाँप गए थे। उन्होंने पूछा, “कुरान पड़ लेते हो?”
मैंने जवाब दिया, “अब तक तो नहीं लेकिन मै सीख लूंगा। ” काका बाबू को मैंने अक्सर कुरान पढ़ते देखा है। अगर मै उनसे गुजारिश करूँगा तो वे मेरी बात नहीं टालेंगे।
एफेंडी बोले, “ठीक है। तुम जब कुरान पूरी तरह पढ़ और समझ लो तब मैं तुम्हें ऐसी जगह ले जाऊंगा जहाँ तुम दरवेशों की दीवानगी देख सकोगे। शायद तुम्हें अपने सवालों का जवाब वहाँ मिल जाये। ”
अगले दिन जब दोपहर में ग्राहक नहीं थे, काका बाबू कुरान खोल कर पढ़ने लगे। मैंने सकुचाते हुए अर्ज किया, “काका बाबू आप मुझे कुरान पढ़ाएंगे?”
“फीस देनी पड़ेगी। ”
“मेरी तनख्वाह में से काट लेना। ”
उन्होंने कहा था, “हफ्ते में दो दिन दूकान बंद करने के बाद, तुम्हे कुरान सीखने मेरे घर आना होगा। मुझे खाना बनाने में मदद करनी होगी और रात का खाना मेरे साथ खाना होगा। ”
मैंने कहा “मुझे आपकी ये शर्त मंजूर है” तो वो हँस कर बोले ,”पढ़ाई बिन किये ही तुम इतनी अच्छी जुबान बोलते हो, पढ़ लिख लोगे तो बहुत ऊँचा हासिल कर पाओगे। ”
काका बाबू कुरान पढ़ाने से पहले, शाह जलाल बाबा को याद करते थे और उनसे विनती करते थे कि वो मुझे ठीक तरीके से सिखाने में काका बाबू की मदद करें। काका बाबू की आवाज़ मामू की तरह दमदार नहीं थी, लेकिन जिस भक्ति से वो बाबा से गा कर अर्ज करते थे, वो मेरे दिल को छू जाता था। जल्द ही उस तराने की धुन और लफ्ज़ मेरे ज़ेहन मैं बैठ गई। मैं हर वक्त गुनगुनाने लगा, “शाह जलाल बाबा मेरी नैय्या है मझधार, बाबा तुम ही लगाओ इसे पार। तुम इश्क का दरिया, तुम ज्ञान के हो भंडार। बनी रहे हम पे प्रेम रस की फुहार, तुम्हारी दया अपरम्पार। ”
एक दिन मैंने घर में नगाड़े का जोड़ा रखा देखा। शायद मामू के बजैये साथी उनके साथ अभ्यास करने के लिए छोड़ गए होंगे। मैं नगाड़ा पीटते हुए मस्ती से गाने लगा। मामू मेरे पास आ कर बैठ गए और बड़े ध्यान से मुझे सुनने लगे। गाना ख़त्म होने पर बोले, “वक्त आ गया है, तुम्हारे संगीत सीखने का। ” मामू मेरे लिए कुदुम ले आये, मेरा मयखाने और कॉफ़ी घर जाना कम हो गया। हफ्ते में दो दिन मैं काका बाबू के पास अरबी और कुरान ही नहीं बल्कि बंगला भी सीखने लगा। बाकी दिन मै दूकान से लौटते ही मैं संगीत का रियाज़ करने बैठ जाता। मामा घर पे होते तो मेरी गलतियाँ सुधार देते या कुछ नया सिखा देते। दस बरस तक विद्या हीन रहने के बाद, मेरी शिक्षा अब तेज गति से आगे बढ़ने लगी थी। देखते देखते चार बरस गुजर गए। इन चार सालों में बहुत कुछ बदल गया था, मेरा कद, मेरा चेहरा, मेरा दिमाग। अगर नहीं बदला था तो वो था उस अनजान देश और वहाँ के पीर बाबा के लिए मेरी चाहत। हालाँकि मैं बंग देश के सिर्फ एक व्यक्ति को जानता था, बंगाली भाषा बोलने, समझने, लिखने, पढ़ने की मेरी काबिलीयत तुर्की से बेहतर थी। काका बाबू खुश थे कि मुझे कुरान लगभग पूरी तरह याद हो गया था। मामू भी मेरी कुदुम बजाने और गाने की पटुता की सराहना करते थे। पर मुझे अपने इस तरक्की से तसल्ली नहीं मिली थी। ऐसा लगता था कि मेरे अन्दर अनुत्तरित प्रश्नों का एक अम्बार जमा हो रहा था। इन चार सालों में कई बार उस फ़्रांसिसी कथाकार के बारे में सोचा जो दरवेशों पर किताब लिख रहे थे, लेकिन उनसे मुलाकात नहीं हुई।
