शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग २)
शिलहट - एक ऐतिहासिक कल्पित कथा (भाग २)
Continued from Part 1
एक दिन मामू की मुलाक़ात बंग देश से आये एक व्यापारी, अनवर चौधरी से हुई। एफ्फेंडी अनवर कोन्या में बंग के मशहूर मलमल की दुकान खोलना चाहते थे। मामू तनमन से उनकी सहायता में जुट गए। शहर के शौक़ीन और प्रभावशाली अमीरों से उनका परिचय कराया। जब शहर के प्रमुख बाज़ार में उनकी दुकान खुली, मैं वहाँ नौकरी में लग गया। उस वक्त मैं दस बरस का था। मेरा काम था, हर सुबह दुकान की झाड़ पोंछ करना, ग्राहकों के जाने के बाद, मलमल के खुली थानों को तह कर सलीके से लगाना, थोड़ी दूर स्थित भोजनालय से एफ्फेंडी के लिए खाना लाना और उन्हें तुर्की जुबान से वाकिफ कराना।
एफ्फेंडी का स्वभाव गंभीर था और वो कम बातें करते थे। शुरू में मैं उनसे सवाल करने में हिचकिचाता था। कुछ महीनों में वो तुर्की जुबान में माहिर हो गए। इस दौरान हम आपस में घुलमिल गए और मेरे अन्दर की झिझक खत्म हो गई। वो मुझे अपने देश की जुबान सिखाने लगे। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें एफ्फेंडी नहीं काका बाबू कह कर पुकारूँ। वो मुझे अपने देश के अनोखे पेड़, पौधे, फल, फूल, जीव, जंतु के बारे में बताते। मैं आम और और कटहल के स्वाद और महक को महसूस करने की कोशिश करता, पलाश के लाल फूलों से दहकते वनों को बंद आँखों से देखने का प्रयास करता, कोयल के मधुर बोली को सुनने की चेष्टा करता।
मैंने काका बाबू से इब्नबतूता के रिहला में उल्लिखित कामरू पहाड़ और शेख जलाल के बारे में पूछा था। काका बाबू ने कहा था, “मुमकिन है कि इब्नबतूता ने जिस शेख जलालुद्दीन का जिक्र किया है, वो शिलहट के महशूर पीर शाह जलाल है। दूर दूर से लोग उनकी मजार पर मन्नत मांगने आते है। ”
मैंने पूछा, “आपने देखा है उनका दरगाह?”
“मेरा बचपन शिलहट में ही तो गुजरा था। हमारा घर दरगाह से कुछ ही दूरी पर था। मेरे दो बड़े भाई अब भी वहीँ रहते है। शिलहट के बाज़ार में उनकी मसालों और मेवे की दुकान है। ”
फिर काकाबाबू शाह जलाल बाबा के मोजिजाओं के बारे में बताने लगे। जब काका बाबू ने बताया कि शाह जलाल कोन्या के रहने वाले थे, तो मैं हैरान हुआ। मामू ने इस बात का कभी जिक्र नहीं किया था।
मेरी फटी हुई आँखों को देख मुस्कुराते हुए काका बाबू बोले ,”नौ पीढ़ी पहले मेरे पूर्वज, शाह जलाल के साथ जो तीन सौ साठ औलिया शिलहट पहुंचे थे, उनमे से थे। ”
“नौ पीढी याने आपके परदादा के परदादा के परदादा?”
“बिलकुल सही। तुम्हारा दिमाग तेज है। इस तरह दुकान में नौकरी करने के बजाय अगर तुम पढाई लिखाई करते तो शायद काबिलियत बेहतर विकसित होती। ”
मैं एक पल के लिए सिहर गया था। मामू ने कुछ साल पहले मुझे मदरसे में दाखिल करवाया था। मुझे वहाँ के सख्त नियम बिलकुल पसंद नहीं आये थे। मैंने काकाबाबू से कहा, “मैं ऐसे ही ठीक हूँ। मामू कहते है जिन्दगी सब सिखा देगी। ”
उस शाम काकाबाबू दुकान बंद करने के बाद, मयखाने जा रहे थे। मैं भी उनके साथ हो लिया। अन्दर घुसते ही, जब हमने देखा कि सब पीने वाले, हाथों में जाम लिए, झुण्ड बनाये खड़े है, हम समझ गए कि भीड़ के केंद्र में मामू होंगे। पास जा के देखा मामू खय्याम की ग़ज़ल सुना रहे थे-
“सुना मैंने कहते कुछ लोग,
मधुर जग पर मानव का राज,
और कुछ कहते जग से दूर,
स्वर्ग में ही सब सुख का साज!
दूर का छोड़ प्रलोभन मोह,
करो जो पास उसी का मोल,
सुहाने बस लगते हैं, प्राण,
अरे ये दूर–दूर के ढोल!”
ग़ज़ल ख़त्म होने पर उन्होंने हमें देखा और अपने पास बुलाया। हम भीड़ को चीरते हुए उनके मेज तक पहुंचे। मामू ने काकाबाबू का परिचय करते हुए कहा, “आप बंग देश से है। वहाँ की मसलिन निहायत उम्दा है। हिंदुस्तान के मुहम्मद इब्न तुगलक ने इब्नबतूता के साथ चीन के बादशाह के लिए जो पांच प्रकार के वस्त्र उपहार स्वरूप भेजे थे उनमें से चार इनके देश से थे। यहाँ के बाज़ार में इनकी दुकान है जहाँ आप ढाका की मशहूर मुलायम, महीन, मनमोहक मलमल खरीद सकते है”।
पास खड़े फ़ारसी व्यापारी ने नजाकत से पूछा, “सुना है वहाँ के मसलिन की बड़ी चादर हाथ की मुठ्ठी में समा जाती है। कैसे करते है वहाँ के बुनकर ये जादू। ”
काकाबाबू ने बड़े विनम्रता से समझाया था, “मसलिन के महीन धागों के पीछे वहां की ख़ास कपास है। यह कपास नदी के किनारे उगाई जाती है। बारिश के दिनों में ये नदी भयावह रूप धारण कर आसपास के इलाको को अपने विस्तार में छिपा लेती है। कपास के पौधे पानी में डूब जाते है। खुदा की इनायत है वहाँ के किसानों और बुनकरों पर, कपास के रेशे पानी में भीगने की वजह से नष्ट नहीं होते बल्कि विघटित हो जाते है। इस कपास से बना सूत बहुत मजबूत होता है और अधिक तनाव झेल सकता है। धागे से कपड़ा बुनने के लिए विशेष प्रकार के करघे का इस्तेमाल किया जाता है। ये बुनाई का काम वहाँ की युवतियाँ नदी के किनारे या नाव में बैठ कर, गाना गाते हुए करती हैं। ये काम सिर्फ सुबह और शाम के समय किया जाता है, जब सूरज का तेज मध्धम होता है और हवा में नमी होती है। कहते है कि उस परिवेश की खूबसूरती और बुनकरों के गीत, कपड़े में एक जादुई मोह बन बस जाते है। ”
काकाबाबू के जवाब ने लोगों का मन जीत लिया था। सब दुकान आके मसलिन खरीदने की उत्सुकता जाहिर करने लगे। एक यहूदी दुकानदार जिसके कपड़ों की दुकान, हमारे दुकान से थोड़े ही दूरी पर थी, अचानक पूछ बैठा, “क्या ये सच है कि वहाँ के मंदिरों में रक्त पिपासु देवियों की पूजा में नरबलि की जाती है? ऐसे खूंखार जगह से आये महीन कपड़े के इस्तेमाल से अच्छा है मामूली कपड़ा पहनना। ”
काकाबाबू ने सकुचाते हुए कहा, “चंद काली मन्दिरों में ये रस्म प्रचलित है। ज्यादातर मंदिरों में ये प्रथा खत्म की जा चुकी है। ”
महफिलों में मेरी जुबान जो आज तक नहीं खुली थी, अचानक चल पड़ी “वहाँ की जमीन बहुत पाक है। वहाँ महान पीर शेख जलालुद्दीन का मजार है, जिनके मोजिज़ा और भविष्यवाणी करने की शक्ति के बारे में सुन इब्नबतूता उनसे मिलने गए थे। पीर साहब कोन्या के रहने वाले थे। ”
