Saroj Prajapati

Inspirational


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शादी व आत्मसम्मान

शादी व आत्मसम्मान

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विमला जी आज सुबह से ही अपनी बेटी आरती के आने का इंतजार कर रही थी। उसकी शादी अभी 2 महीने पहले ही हुई थी। शादी के बाद पहली बार वह रुकने आ रही थी ‌ विमला जी की तो पूरी दुनिया ही आरती में सिमटी हुई थी। आरती उनकी इकलौती औलाद थी। जब आरती 10 साल की थी तो एक दुर्घटना में उनके पति की मृत्यु हो गई थी। खुद को इस शोक से निकाल उन्होंने आरती के भविष्य की ओर ध्यान दिया। उन्होंने आरती को उच्च शिक्षा ही नहीं दिलाई अपितु अच्छे संस्कार भी दिए। आरती देखने में जितनी सुंदर थी, उतनी ही सरल व मृदुभाषी भी थी। पढ़ाई संपन्न होने के बाद विमला जी के भाई ने उसके लिए बहुत ही अच्छा रिश्ता बताया। लड़के वालों को आरती पहली नजर में भा गई। लड़के का परिवार, उनके भाई का देखा भाला था तो उन्होंने भी हां कर दी। खूब धूमधाम से उन्होंने अपनी बिटिया को विदा किया।

शाम तक उसके मामा उसे लिवा लाए। दोनों ही मां बेटी एक दूसरे को देख भाव विभोर हो गई। विमला जी ने ससुराल का हालचाल पूछा तो आरती ने बताया "मम्मी सब बहुत अच्छे हैं और मेरी बहुत परवाह करते हैं।"

लेकिन विमला जी को लग रहा था कि आरती के शब्द उसका साथ नहीं दे रहे थे। विमला जी समझ गई थी कि वह कुछ छुपा रही है लेकिन उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि कुछ पूछे। उन्हें एक डर सता रहा था कि अगर आरती के साथ कुछ बुरा हुआ तो वह कैसे संभालेगी। एक 2 दिन इसी उधेड़बुन में निकल गए। फिर उन्होंने सोचा अगर कोई समस्या भी है तो यूं उससे मुंह मोड़ कर, पीछा नहीं छुड़ा सकती। उन्होंने आरती को अपने पास बुला कर बहुत प्यार से पूछा "बेटा झूठ मत बोलना, मैं एक-दो दिन में तेरे भावों से ही समझ गई हूं कि तेरे साथ कहीं ना कहीं कुछ गलत हुआ है। कुछ मत छुपा, तेरी मां तेरे सुख दुख में तेरे साथ ही है।"

अपनी मां की बात सुन आरती ने झिझकते हुए कहा "मम्मी जब आप सब समझ ही गई है तो मैं कुछ छुपाऊँगी नहीं। पता नहीं आपको यह बात छोटी लगे या बड़ी, लेकिन मुझे इस घटना ने अंदर से तोड़ दिया है। एक दिन सुबह-सुबह ऑफ़िस जाने से पहले रवि किसी बात पर नाराज़ होकर चिल्लाने लगे तो मैंने धीरे से कहा "आप इस बात को आराम से भी तो कह सकते थे!" इतना सुनते ही उन्होंने गुस्से में मुझ पर हाथ उठा दिया। ‌ सच कहती हूं मां! कहने को तो मैं आपके सामने हँस बोल रही हूं, लेकिन उस दिन ही मेरी आत्मा मर गई। मुझे उससे इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं थी। शाम को जब वह आए तो वह इस तरह हँस बोल रहे थे मानो कुछ हुआ ही ना हो। मैंने उनसे जब इस बारे में बात की तो उन्होंने टका सा जवाब दे दिया "यार गुस्से में तो यह सब हो जाता है, दिल से मत लगाओ।" पता नहीं मां मैं सही हूं या गलत, लेकिन बस मुझे एक बात यही चुभ रही है कि नारी का कोई सम्मान नहीं। मैं कोई पशु तो नहीं जिसे मारकर समझाया जाए? अगर वह कोई गलती करेगा तो क्या मैं हाथ उठा दूंगी?"

उसकी बातें सुन विमला जी वहां से तो चुपचाप उठकर चली गई। किंतु अपने कमरे में जा उनके आंखों से आँसू झरने लगे। उनके सामने 25 साल पहले का मंजर घूम गया जब आरती के पिता ने उस पर हाथ उठाया था। वह भी तो अंदर ही अंदर टूट गई थी, लेकिन उसके माता पिता ने उसे यही कहकर समझा दिया था कि बेटा ऐसा तो घर गृहस्थी में लगा रहता है। ऐसी छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते नहीं तोड़े जाते, और जो एक बार उनका हाथ उठा तो जब तब वह गुस्से में अक्सर हाथ उठाने लगे। आज उसकी बेटी के साथ वही दोहराया जा रहा है। क्या वह भी हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए या इसे छोटी सी घटना मान ले या आवेश के क्षणों में उठाया गया जमाई का गलत कदम। विचारों का झंझावात उनके मन में चल रहा था।

2 दिन बाद आरती के पति व ससुर उसे लिवाने आए। विमला जी ने गर्मजोशी से अपने समधी व दामाद का स्वागत किया। खाने पीने के बाद जब बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो वह बोली "समधी जी आरती ससुराल में सही से काम तो करती है ना। परिवार में सबकी इज़्ज़त करती है ना! कुछ कमी हो तो मुझे बताइए। मैं इसे समझा दूंगी।"

उसके ससुर ने कहा "बहन जी आरती तो बहुत ही शांत व समझदार लड़की है। इतनी संस्कारी बहु पाकर हमारे तो भाग्य खुल गए। परिवार के हर सदस्य का पूरा ध्यान रखती है। घर के कामों को अकेले ही कर लेती है। इसकी सास तो बहुत खुश है इसे पाकर।"

फिर विमला जी ने अपने दामाद से पूछा "बेटा तुम बताओ तुम्हें तो कोई शिकायत नहीं इससे?"

"नहीं मम्मी जी मेरे कुछ कहने से पहले ही यह मेरी हर जरूरत का ध्यान रखती है, साथ ही मेरे परिवार का भी।"

"बेटा कभी तुम पर चिल्लाती तो नहीं है? उल्टा तो नहीं बोलती?"

"अरे नहीं मम्मी, यह तो बहुत ही कम बोलती है। मैं गुस्सा हो भी जाऊँ तो पलट कर जवाब नहीं देती।"

उन दोनों की बात सुन विमला जी ने शांत किंतु गंभीर स्वर में कहा "समधी जी आपकी व जमाई राजा की बातों से तो लग रहा है कि मेरी बेटी आप लोगों की पूरे दिल से सेवा कर रही है। जैसा कि दामाद जी और आपने कहा। किसी को पलट कर जवाब नहीं देती, हर काम समय पर निपटाती है। फिर मैं एक बात दामाद जी से पूछना चाहती हूं। आरती इतनी अच्छी है तो आपने इस पर हाथ क्यों उठाया?"

विमला जी की बात सुन रवि एकदम से सकपका गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि वह ऐसा कुछ भी कह सकती हैं। उसे कोई जवाब ही नहीं सूझ रहा था। उसके पिता ने बात संभालते हुए कहा "बहन जी हमें तो इस बारे में पता ही नहीं। लेकिन अगर इसने ऐसा कुछ किया है तो मैं हाथ जोड़ माफ़ी मांगता हूं और आपको विश्वास दिलाता हूं कि आगे से यह कभी ऐसा नहीं करेगा।"

विमला जी ने कहा "भाई साहब मैं बस इतना चाहती हूं कि दामाद जी आरती को इज़्ज़त दें। अगर उससे कुछ ग़लती हो तो उसे समझाएं। मैं आशा करती हूं कि जितना सम्मान मेरी बेटी आप सबका करती है उतना ही उसे मिले। गलती होने पर आप उसे डांटे या प्यार से समझाएं। मैं बुरा नहीं मानूंगी क्योंकि आप उसके पिता तुल्य हैं। लेकिन कोई मेरी बेटी पर हाथ उठाए यह मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती। मैं लोक लाज के डर से अपनी बेटी पर अत्याचार होते नहीं देख सकती। मैंने अपनी बेटी के सुखद भविष्य के लिए उसे एक घर से दूसरे घर विदा किया है, कोई दान नहीं। अगर उस घर में मेरी बेटी का मान सम्मान नहीं तो मेरी बेटी के लिए इस घर के दरवाज़े सदैव खुले हैं।"



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