Sarita Maurya

Inspirational


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Sarita Maurya

Inspirational


सबला

सबला

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उजास की किरणों सी चेहरे की चमक और चपल चांदनी सी उसकी भोली आंखें माता-पिता का गर्व थीं तो नाना की स्नेहधारा भी उसी के इर्दगिर्द भंवर सी बहती रहती। नानी का नारियल सा प्यार उसे ठोकता-पीटता भी और प्रेमरस में डुबाकर भी रखता। मामा की लाडली थी तो मुहल्ले की सखियों के लिए ईर्ष्या का कारण भी। नाना तम्बाकू के व्यापारी थे तो जब भी कहीं जाते उनकी पीठ के पीछे अंगौछे में बंधी वह अपने को किसी राजकुमारी से कम न समझती और कुछ भी बात न मानते तो बस अपनी छोटी-छोटी थपकियों से उनकी पीठ पर मुक्के बरसाती। नाना हंसकर कहते अच्छा-अच्छा दिलाता हूं। अपने खूबसूरत बचपन के हिंडोले में उसे इतना सुख मिल रहा था कि उसे आंसुओं का अंदाजा ही नहीं था। धीरे-धीरे उसके नन्हें कदम किशोरावस्था की तरफ बढ़ चले।

छोटे से गांव की भोली सी वो लड़की वैसी ही थी जैसी आम लड़कियां होती हैं यानी सिलाई कढ़ाई से लेकर घर के हर काम में दक्ष। औरों से जो चीज़ उसे अलग बनाती थी वह था उसका अल्हड़पन और अल्हड़पन की वो शरारतें जिसमें धोती का फेंटा बना कर वह आराम से आम की सबसे ऊॅंची वाली शाखा पर पहुंच जाती, महुए का मौसम आता तो बाकी घरवालों और सखियों की सुबह होने से पहले महुओं की खूश्बू से उसका घर महमहा उठता, कैथा और इमली की महक रसोई में नये व्यंजन का पता दे जाती तो सुरूचिपूर्ण तरीके से लहंगे और दूसरे कपड़ों पर बनाये गये बेलबूटे उसकी अपनी कला का पता दे जाते। रही सही कसर नानी की स्नेहपगी डांट उसे सिखा जाती कि रोटियों का गोल होना और घर में स्वच्छता का होना कितना जरूरी था। बस कोई चीज़ उससे अधूरी छूट गई थी तो पांचवीं के बाद की उसकी शिक्षा। गांव के आस-पास स्कूल नहीं होने के कारण और उसके गांव के पास की सड़क पर गोरों और गोरे सिपाहियों की आवाजाही के कारण उसे स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। यहां तक कि कई बार गांव की सारी लड़कियों को अपनी रात गन्ने के खेतों के बीच गुजारनी पड़ती थी। गोरे सिपाहियों का पता चलते ही गांववाले अपनी बेटियों को गन्ने के खेतों और घनी झाड़ियों में कांटों के बीच छिपा देते ताकि उनका जीवन और अस्मत दोनों सुरक्षित रह सके।

किशोरवय पूरा करते-न करते गांव की परंपरानुसार उसका भी वैवाहिक जीवन आरंभ होना था अतः नाना ने अपनी समझ के अनुसार उसके लिए सुघर सुंदर ससुराल चुना। सुनहरी उम्र के सुनहरे सपनों के साथ जब उसने ससुराल में कदम रखा तो पहले ही दिन से मानों उसे आभास सा हो गया कि उसकी जिंदगी का एक नया दर्दभरा अध्याय प्रारंभ हो चुका था। साल बीतते न बीतते उसका तन-मन सब कुंम्हला चुके थे और बाकी था कुछ तो मनपर गालियों के छींटों की चुभन और बदन पर मार की तपन। पति का स्नेह वह जान नहीं सकी। नाना जब उसे लेने गये तो उनसे उसकी दशा छिपी नहीं रह सकी और अपने को कोसते हुए उसे हमेशा के लिए बंधन से आजाद कर अपने साथ ले आये। सोलह-सत्रह वर्ष की उस वय में मानों उसने जन्मों की जिंदगी जी ली थी। ऐसा वो नहीं कहती थी बल्कि उसके कोमल शरीर पर जगह-जगह पड़े निशान कहते थे। 

घरवाले जानते थे कि तन के घाव तो भर ही जाते हैं लेकिन मन के घावों का भरना आसान नहीं था, ऐसे में जब नाना ने उसे दोबारा से लगन करने के लिए अपने जीवन का वास्ता दिया तो उसकी न हां में भी नहीं बदल सकी और अपनी परिस्थितियों को जानकर वह खुलकर न भी नहीं कह सकी। 

जीवनसाथी

ससुराल में परिवार के नाम पर 3 श्वसुर एक ननद और उस इंसान का साथ मिला जो उसे जीवनसाथी बनाकर लाया था। पहले से सयानी और डरी हुई सबला ने अपने आपको एक ऐसे खोल में बंद कर रखा था जहां तक आवाज जा तो सकती थी लेकिन बाहर नहीं आ सकती थी। किंचित सामने वाले को इसका अहसास अनजाने ही हो गया था तभी तो वह उसे खुश रखने की हरसंभव कोशिश करते थे। सबला को याद था कि उसने सबसे पहले उन्हें चॉंदनी रात में भरपूर देखा था। उसकी यादों के स्केच के अनुसार वो लंबे-चौड़े व्यक्तित्व के धनी थे अपने पिता, दादा और चाचा की छत्रछाया में बड़े हुए थे। रूआबदार मूंछों के साथ जब लट्ठ हाथ में लेकर निकलते तो अलग ही व्यक्तित्व झलकता था। जमींदार की बहू होने के रूतबे के कारण वह कहीं बिना पालकी के नहीं जा सकती थी, यहां तक कि उसे हिदायत थी कि अगर घर के अंदर पानी न हो तो वह खाना भले ही न बनाये लेकिन दरवाजे के बाहर बने कुएं पर पानी भरने नहीं निकलेगी। चॉंद रात में ही उसे अपने सभी खेत -बाग दिखाये गये थे। बर्तन धोने से लेकर मसाला पीसने, सब्जी काटने के लिए ठकुराइन आती थी तो घर की दहलीज के बाहर श्वसुर जी के जमाने से रह रही सोना अच्छी सास की तरह उसके सभी हाल-चाल पूछने और जरूरत का सामान मंगवाने के लिए हाजिर रहती।

ससुराल में पहले सावन की पींगें जब मेंहंदी सजे हाथों के साथ झूलीं तो लगा कहीं यह सपना तो नहीं कि रस्सी ज्यादा खुशियों के भार से जल्द ही घिसकर टूट जाये और सपना हकीकत में बदल जाये। लेकिन मानो नीम का वह पेड़ लहक-लहक कर कह रहा था ‘‘अभी तो खुशियों का समय है’’। जुगनू सी जगमग उसकी आंखों के डोरे कहानी बताते-बताते गुलाबी हो उठे कि कैसे यूं ही एक सर्द रात अलाव की आग के पास बैठे हुए उसका मन शकरकंद खाने के लिए सोचने लगा तो वह जबान पर ले आई कि काश ‘‘उस गर्म-गर्म आग में ताजी मटर या शकरकंद होती।’’ उसका कहना था कि वह गठीला नौजवान जो उसका जीवनसाथी था बस इतना कहकर उठा कि सोना मत अभी आता हूं। और जब लौटा तो उसके हाथ में खेत से खोदी गई ताजी शकरकंदों के साथ मटरफलियां झांक रही थीं। ज्यादा नहीं बोलने वाले ने अपना प्यार यूं ही अभिव्यक्त किया कि यूं मन में कुछ भी मत रखना बस एक बार कहकर देखना मेरी जीवन संगिनी हो तुम।

चांदनी की शीतल छाया में अकसर सबला को मधुर स्नेह के छींटे मिलते और वो अपने जीवनसाथी के पीछेपीछे अभिभूत सी चलती चली जाती। मुस्कुराहटें उसके बीते जीवन की कड़वाहटों को कम करने लगी थीं।

समय का पांखी और बिछुड़न

चारों पहर मानों वो आंखें उसे अहसास कराती थीं कि तुम डरना मत, मैं हूं न तुम्हारे पास, तुम्हारे सुख दुख का भागीदार। सच उसे अपने जीवन का पहला बुरा सपना भूल गया था, ऐसा लगता मानों उसके चेहरे की रंगत और बढ़ गई थी। किसी का इंतज़ार उसे अच्छा लगने लगा था। सखी सी ननद मानों उसके आसपास साये सी रहती कि उसकी भाभी को कोई तकलीफ नहीं होने पाये। सबला को सच में लगने लगा था कि वो तो भूल चली बाबुल का देश....। ढाई पलों की तरह पलक झपकते ही ढाई साल गुजर गये। 

इससे अधिक सुख विधाता ने उसकी झोली में नहीं डाला था। वो तो उसे दुःखों, परेशानियों के बीच मजबूती से खड़ी एक मिसाल बनाने पर तुला हुआ था। तभी तो गांव में फैली प्लेग की महामारी ने उसकी दुनिया समाप्त करने का बीड़ा उठा लिया। पहले उसकी प्यारी सखी सी ननद को उससे छीना फिर उसके संसार सागर की सबसे अकूत संपदा उसके जीवनसाथी पर प्रहार कर दिया, उसके लाख समझाने पर भी उन्होंने उसकी बात नहीं मानी थी, और तबतक गांव छोड़ने की जिद नहीं छोड़ी जबतक जिंदगी ने उन्हें स्वयं से मुक्त करने का मंसूबा पूरा नहीं कर लिया। वह सपना ही देखती रही कि कब वो स्वस्थ हों और वो दो के बीच में तीसरे नये जीवन का स्वागत मिलजुलकर कर सकें। बस विदा की बेला में कर पाई तो एक वादा कि जिस चौखट पर वह लक्ष्मी बनकर आई थी उस चौखट को कभी किसी हाल में छोड़कर नहीं जायेगी बल्कि सदैव वहां दिया जलता रहेगा। उसके आश्वासन के साथ ही हसरतभरी आंखों ने आखिरी विदा के लिए पलकें बंद करलीं। लुटी-पिटी सी एक माह के गर्भ के साथ सबला न तो मर पा रही थी न जी पा रही थी। तीसरी जिंदगी का आगमन उसके लिए ममताभरी खुशी लाया था कि यादों की दर्दभरी गलियां और कभी न समाप्त होने वाले सन्नाटे? पट्टीदारों ने संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए कोर्ट में दावा दायर कर दिया कि संतानहीन जमींदार के हिस्से की जमीन उनके भांजे-भांजियों को मिलनी चाहिये तो बेवा को घर में रहने का कोई अध्किर नहीं। जब कानून से दाल नहीं गली तो रातों को घर के दरवाजे खटखटा कर डराने की कोशिश की गई, जब वो हंसिया लेकर दरवाजे पर खड़ी हो गई तो फिर से नया मुकदमा दर्ज कर दिया गया, उसकी खड़ी फसलों में रातों को पशु छोड़ दिये गये। अंततः पिताजी ने उसे सुझाव दिया कि उसे अपनी सुरक्षा के लिए न चाहते हुए भी फिर से किसी को अपने जीवन में प्रवेश देना ही होगा।

उसकी साड़ी का पल्लू भले ही रंगीन हो गया हो लेकिन उसका दिल फिर से कोई नई आशा या उमंग नहीं जगा सका। पट्टीदारों की लड़ाई ने उससे उसके नौ कीमती साल छीन लिये। दिन सास की गालियों से प्रारम्भ होकर रोज किसी नई चुनौती पर समाप्त होता। जब भी घर, खेत, बाग या बच्चों संबंधी कोई परेशानी होती तो अपने को उसकी जिंदगी का स्वामी कहने वाले उसके पति उसका साथ छोड़कर छः माह से एक वर्ष तक के लिए गायब हो जाते। जब आते तो उसकी गोद में एक नया तोहफा डाल कर फिर गायब हो जाते। लगातार मुकदमें ने उसके घर, खेत, बाग, पेड़, जमापूंजी सब छीन लिये। यहां तक कि चांदी का गोटा लगी चुन्नी पहनने वाली की साड़ी पर पैबंदों ने अपनी जगह बना ली। बच्चे पैदा करने की मशीन सी बन चुकी थी वह। दो समय के गाल में समा गये तो एक को 10 वर्ष की अवस्था में बीमारी ने छीन लिया। फिर भी उसके आंगन में खेलती 6 किलकालिरयों के साथ ही 3 और सदस्यों सहित कुल नौ लोगों का पेट उसे पालना था। जाने कौन सी ताकत थी जो हरपल उसे जिम्मेदारियों से घेरे रहती और बस अधमुंदी आंखें उससे लिये गये वादे के साथ उसके साथ-साथ घूमती रहतीं। बड़ी बेटी और एक बेटे के विवाह से मुक्त हुई कि शायद अब उसे राहत मिलेगी और वो दो पल सुकून के जियेगी तो एकबार फिर विधाता के क्रूर मजाक ने उसे सफेद वस्त्रों का जोड़ा पहना दिया। दो वर्ष बीतते न बीतते लक्ष्मी जैसी बहू, भी वक्त से पहले हाथ छुड़ाकर दुनिया को अलविदा कह गई। वो समझ नहीं पा रही थी कि किसके जाने का शोक ज्यादा करे! पुत्री का, पति का या बहू का जिसने इतने कम समय में बेटी बनकर उसके कांधे से कांधा मिलाया और फिर बीच राह में ही बिछड़ गई। कुछ समय के लिए विक्षिप्त सा जीवन हो गया और बीमारी ने उसे अधमरा कर दिया, कई बार उसे स्वयं लगता कि अब वो दुनिया से रूखसत हो लेगी, लेकिन जाने किसी मिट्टी की बनी थी कि फिर से हिम्मत जोड़ कर उठ खड़ी हुई ताकि अपने बाकी बच्चों को शिक्षा की राह पर आगे बढ़ाकर जिंदगी जीने के लायक बना सके। 

साल दर साल बीतते गये! कभी कांधे पर हल रखकर, कभी खेत गिरवी रखकर, तो कभी पेड़ बेचकर अपने घोंसले के पंक्षियों को दाना चुगाती रही उन्हें उड़ना सिखाती रही। जिंदगी इतनी सीधी नहीं थी कई झंझावात आये चाहे पुत्र के प्रेमप्रसंग के चलते समाज से निष्कासित किया जाना हो, पुत्रों का अपहरण होना हो या फिर पुत्री का भावुकता में घर से चले जाना, कभी उसने शिकायत नहीं की बल्कि धैर्य से उनको समझने सुलझाने की कोशिशें करती रही। बहुएं आईं संसार हराभरा लगने लगा लेकिन समय ने इंसानी व्यवहार के कई स्वरूप बदल दिये। दीवार के इस पार से गुजरते हुए जब सबला के कान में अपने पुत्र का वाक्य पड़ा कि ‘‘ मां आये या नहीं उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि वह उसे कुछ देने वाली नहीं थी’’ तो सबला के ह्रदय ने पहली बार स्वयं को अबला महसूस किया क्योंकि ये वही पुत्र था जिसके लिए वह कांधे पर राशन की बोरी रखकर 10 किलोमीटर पैदल चलकर आया करती थी ताकि बचे हुए पैसों से बेटे के लिए कुछ फल खरीद सके। जार-जार रोई अपनी बेटी से अपना दुख बांटते हुए लेकिन पुत्र को फिर भी क्षमा कर दिया क्योंकि वो उसके घर का पहला चिराग था। एक सबला एक मां जाने कब एक बुढ़िया बनकर लोगों के लिए खटकने लगी-पुत्र को अपनी मां का पोते पर छोटा सा गुस्सा करना बुरा लगने लगा, बहुओं के उसका पड़ोसियों के घर जाना और पड़ोसियों के साथ बांटकर खाना बुरा लगने लगा, किसी को कम तो किसी को अधिक मानने के आरोप लगने लगे तो पोते-पोतियों को उसमें कुछ दिखता नहीं था क्योंकि उसके पास भौतिक रूप से देने के लिए कुछ नहीं था।

कितना तड़पी थी सबला उस दिन जब मात्र पांच रूपये के लिए पोती ने तूफान खड़ा कर दिया था कि उसने अतिरिक्त पैसे क्यों खर्च किये थे? सबला का कुसूर इतना था कि उन पांच रूपयों से वह अपनी नातिन के लिए मैगी का एक पैकेट ले आई थी। ये वही पोती थी जिसके जन्म पर सबला खुशी के अतिरेक में डूब गई थी। ये वही पोती थी जिसे सबला ने अपने बूढ़े हाथों से रोटियां बनाकर खिलाई थीं ताकि वह चैन से पढ़ाई कर सके और सो सके।

सत्तर बसंत पर कर चुकी सबला पर उसदिन जीवन में पहली बार चोरी का इलजाम लगा वो भी बेटी की पड़ोसन द्वारा। वह बेटी जिसे उसने जान से अधिक चाहा था क्योंकि वह उसकी प्रेमस्निग्ध निशानी थी उसने अपने पड़ोसियों के कहने पर मां को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और सबला को चोर बना दिया बजाय अपनी सत्यनिष्ठ मां का साथ देने के। सबला के ऑंचल की दूध की धार मानों सूख गई। उसे ये उम्मीद हरगिज नहीं थी कि उसकी अपनी संतान उसे पहचानने की बजाय किसी और का साथ देगी। जब वह अपनी छोटी बेटी से मिली तो उसकी गोद में सिर रखकर फूटफूट कर रोई लेकिन जैसे ही बात सरस्वती से प्रश्नचर्चा की आई तो फौरन छोटी बेटी के मुंह पर ताला लगा दिया साथ ही एक सीख भी देदी ‘‘समय बड़ा बलवान होता है, माफ करने से बड़ी कोई शक्ति नहीं’’ और ये तो अपनी है, जो भी किया समय की व्यवहारिकता के अनुसार किया। छोटी बेटी से सबला का मिलना वैसे ही था जैसे दो सखियों का मिलना। वो उसके साथ घंटों बतियाते अपने बचपन में तैर आया करती और हमेशा बताती कि कैसे तब के जमाने में एक पैसे में इतना आलूचाट मिल जाया करता था कि वह स्वयं भी खाती और अपने आसपास साथियों को भी। कभी-कभी युवा नदी में तैरती सावन की हरियाली सी स्निग्ध उसकी पति के साथ की मिलनगाथा उसके चेहरे पर अनोखी चमक ले आती। उम्र की लकीरों के पीछे से सपनों की नगरी से झांकती मुस्कुराती और फिर गीली होती उसकी आंखें चेहरे की भावप्रवणता को और गहरा कर देतीं।

नवासी नब्बे वर्षीया सबला सबसे अधिक खुश तब होती जब उसके आस-पास उसका परिवार जमा होता। जब उसके आस-पास अपने होते। अपनी छोटी बेटी से हमेशा कहती ‘‘तेरा आना वैसा ही है जैसे मेरे ढाई सालों का लौट आना या बचपन में मामा के घर जा के आजाना इसलिये तू जल्दी आ जाया कर। आज भी उसने फोन पर अपनी बेटी से जल्दी आने को कहा था और बोली बेटा आ जाओ अब तोते का पता नहीं है बस पिंजरा खुलने वाला है पट्टे उड़ने वाला है , बेटी ने हंसकर कहा ‘‘अम्मा तुम सबला हो अभी दस साल कहीं नहीं जाने दूंगी’’ अचानक फोन बीच में ही कट गया, बेटी को लगा कि शायद फोन की बैटरी समाप्त हो गई होगी, उसे नहीं पता था कि सबला के जीवन की बैटरी अपनी अंतिम विदा की तैयारी कर रही थी। सबला को पैरालिसिस का अटैक पड़ा था जिसे कोई समझ नहीं पाया। सबलोग सबला के आस-पास इकट्ठा हो रहे थे, डॉक्टर ने पूछने पर छोटी बेटी से कह दिया-जितनी सेवा कर सकती हो कर लो दिये की लौ टिमटिमा रही है। अंतिम घड़ी से पूर्व मानों उसकी आंखें और उसकी जुबान अपनी बेटी और छोटे बेटे से बहुत कुछ कहना चाहती थीं मगर आवाज साथ छोड़ चुकी थी। अंतिम घड़ी आ पहुंची और सबला ने बिना किसी को कुछ कहे, परेशान किये आंखें मूंद लीं शायद किसी और जीवन में जागने के लिए। 

एक वर्ष का अंतराल गुजर चुका था, दरवाजे की घंटी बजी और सबला की छोटी बेटी गेट से बाहर निकली एक फेरी वाला गेट पर खड़ा दादी-दादी पुकार रहा था। बेटी ने जब उसे नम आंखों और भरे ह्रदय से बताया कि मां को गये एक वर्ष गुजर चुका था तो वह वहीं जमीन पर बैठकर फफक कर रो पड़ा। उस दिन सबला की बेटी को एक और सच्चाई पता चली कि मां सबला क्यों थी। स्वयं जीवन भर जूझती रही उसकी मां फेरीवालों, रेहड़ी वालों या ऐसे ही जाने कितने गरीबों का दर्द समझती थीं कि वक्तबेवक्त जब कुछ न कर पातीं तो गुड़ की एक डली और रोटी के साथ पानी जरूर पूछ लिया करती थीं वो भी बिना कुछ आभार जताये वैसे ही जैसे अपने पुत्र को ढाढस बंधा रही हों। सबला मां तुम हमारी नहीं जाने कितनों की मां बनकर गईं बिन कहे, बिना जताये। कितनी जगह थी तुम्हारे दिल में,


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