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सौंदर्य दीप

सौंदर्य दीप

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एक तो मेरे पास कोई काम नहीं था, इसलिये पुराने अधूरे कुछ काम करने का मन बना था और इस सिलसिले में मैं लगभग पांच लोगों से मिल चुका था। शुरुआत ही ना से हुई थी, फिर ये निर्णायक ना विभिन्न मंजरों स गुजरता हुआ, अंतिम आदमी तक पहुंचा था। नया काम कोई था नहीं और पुराना हुआ नहीं, क्योंकि इनका होना न होना उन लोगों पर निर्भर था जिनसे मैं मिला था।


तो मैं बिल्कुल खाली था। घर आते समय रास्ते में मिला एक बागीचा, बीच में सुंदर तालाब, तालाब के बीच में पानी की गहराई नापने के लिये बनाया गया था सीमेंट का एक पोल। उस पोल के ऊपर रखी हुई थी एक मूर्ति और मूर्ति के सामने लिखा हुआ था ‘गंगा मैया।’ मैं बागीचे में पर्यटकों के लिए बनायी गई एक कुर्सी पर बैठ गया। तालाब के ऊपर से आती हुई शीतल हवा और तालाब में उठती हुई लहरों के साथ गंगा मैया की हिलती डुलती परछाईं, फूलों की खुश्बू, सब कुछ सुंदर सुंदर सा। ऐसे में सोचा ध्यान में चलने की।


सौंदर्य में खोकर मैं ध्यान में चलने की तैयारी करने लगा। अपना झोला कुर्सी के हत्थे से लटकाया, चश्मा झोले के अंदर डाला, फिर धीरे धीरे आंख बंद करने लगा। अब मेरी आँखें बिल्कुल बन्द हैं, लेकिन वातावरण का सौंदर्य अभी भी आंखों के सामने झिलमिला रहा है। धीरे धीरे यह सौंदर्य भी परिदृश्य में जाने लगा। बन्द आंखों से कुछ और दिखने लगता है आँखों में, और मेरे पास आकर रुकता है ध्यान का यान।

आपने गहरे गुलाबी रंग का मोती देखा होगा। इस बार हमारे ध्यान के यान का रंग गहरा गुलाबी है। उसकी वास्तविक शकल आप देख नहीं सकते, क्योंकि उसकी सतह से जब रौशनी टकराती है तो गुलाबी रंग की चमक पैदा होती है। चमकता हुआ गुलाबी रंग का यान। अब आ गया है यान तो इसमें सफर तो करना ही है।ध्यान के पहले चरण में हम यान में सवार होते हैं। लेकिन हम हम नहीं होते, हमारा शरीर जिसे हम हम कहते हैं वो तो बाग़ीचे में उसी कुर्सी पर पड़ा हुआ है, जिसके हत्थे में मेरा झोला टँगा है। हम तो ध्यान के यान में हैं और हमारा शरीर कुर्सी पर निश्चल पड़ा हुआ है।


अब किसी क्षण हमारी यात्रा शुरू हो सकती है। मधुर संगीत बजने लगता है और यह एक संकेत है हवा में ध्यान के यान के उड़ने का। न कोई इंजिन न कोई पायलट, बस ध्यान का यान हवा की लहर पर सवार चल रहा है। यहां यात्रा की शुरुआत करने से पूर्व कोई अभिवादन करने वाला नहीं है तो हम अपने ही निश्चल पड़े शरीर का अभिवादन करते हैं। थैंक्यू सुरेन्द्र,आप ने हमे एक अवसर दिया है यात्रा का, चलते हैं, फिर मिलेंगे सौंदर्य दीप से वापसी के बाद।

हम आपके शुक्रगुजार होंगे अगर आप हमारी यात्रा की कहानी को लोगों तक पहुंचा सके। अब हमारी इस कृतज्ञता का हमारा निश्चल शरीर क्या जवाब दे सकता है। हम अपने शरीर से दूर होते जा रहे हैं।पृथ्वी का एक बड़ा सा भूखण्ड हमारी आंखों के सामने है। हवा की लहर में हिचकोले खाता हुआ हमारा यान आगे बढ़ता है और अब हवा की परिधि से बाहर है। अब यान की गति और तेज हो जाती है और अब यान पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की पकड़ से बाहर है। यान के रंग में रंगा हुआ है गुलाबी निर्वात, एक मिलन स्थल सूर्य की रौशनी और गुलाबी रंग के निर्वात भूखण्ड का। थोड़ा हल्का गुलाबी रंग अब धीरे धीरे गहरे गुलाबी रंग में बदलता जा रहा है।अब हमारे यान को देखा नहीं जा सकता। गुलाबी निर्वात, गुलाबी यान, बस गुलाबी मौसम, न मनुष्य न वनस्पतियाँ, बस गुलाबी निर्वात भूखण्ड। अब हमारा यान यहीं रुकता है। अब गुलाबी अंधेरा छंटने लगता है और दिलचस्प दृश्य दिखाई पड़ने लगते हैं।


एक दुनिया यहां भी है ध्यान लगाने वालों की। जहां भी नजर जाती है ध्यान लगाये बैठे हैं लोग, गुलाबी परिधान पहने, गुलाबी मैदान, गुलाबी आसमान, गुलाबी हवायें और इसमें ध्यान लगाएं हुये बैठे लोग, बेखबर अपनी ही दुनिया से, जहां हम खड़े होकर उन्हें ध्यानवत देख रहे हैं। ध्यान में लोग भूल गये हैं कि कुछ और हो रहा है उनके आस पास। हम टहल रहे हैं उनके आस पास और हमारे वहां आने का कोई प्रयोजन होगा। कहीं जाओ तो लोग मिलते हैं, बात करते हैं, पते बताते हैं, मगर यहां सब ध्यान में हैं, न अशांति का डर न आतंक का हल्ला, न भोजन की समस्या, न मकान की समस्या, न मनुष्य सी बेचैनी। ध्यान में हैं मगर कहां है इसे पता लगाने की विधि है हमारे पास। दुनियाभर की समस्याओं से मुक्त ध्यान के इस संसार में, देखना पड़ेगा कि ये लोग ध्यान में कहां हैं। मनुष्यता से इनके होने न होने के बीच की स्थिति का जायजा तो लेना ही पड़ेगा। इसके लिए किसी एक मनुष्य के चयन की समस्या जरूर है।


तो देखते हैं इन्हें ही, गुलाबी बदन, गुलाबी परिधान और गुलाबी घास पर आसन लगाएं बैठी हैं। लेते हैं इन्हे ही। ध्यान के परिवेश के योग, मनुष्य का, नारी का रूप, लावण्यमयी काया इनको पकड़ते हैं। देखते हैं ध्यान में ये कहाँ हैं पृथ्वी से दूर इस भूखण्ड पर। पृथ्वी के मनुष्य का कोई अक्स ध्यान में इनके दिमाग में है कि नहीं, इस भूखण्ड का परिवेश इनके दिमाग में है कि नहीं, वे स्वयं अपने दिमाग में हैं कि नहीं। हैं तो इसका प्रयोजन क्या है। ध्यान में यान की बात है तो इसे ध्यान से ही देखिये।


ध्यान में सौंदर्य दीप की यात्रा में निकले थे और यहां इस सौंदर्य दीप में ध्यान में ही लीन एक स्त्री को देख रहे हैं। अपने जीवन में ये कहां हैं, ध्यान में जीवन के बारे में इनका दृष्टिकोन क्या है इसे जानने के लिये तो इनके दिमाग के अंदर चलना पड़ेगा, और हम चलेंगें भी। लेकिन यहां तो कुछ करने का मन ही नही कर रहा है। गुलाबी चाँद, गुलाबी चांदनी उमड़ती हुई, समुन्दर में उठती हुई लहरों की तरह और उस चाॅंदनी में इनकी सुंदर काया। नजर उठाने का मन नहीं करता। लगता है ये ध्यान में तो हैं जरूर लेकिन अब न तब मुस्करा देंगी। लगता है मुस्कराते मुस्कराते मुस्करा नहीं पा रही हैं।लगता है ध्यान में होने के बावजूद भी ये हमें अपने आस पास देख रही हैं।हमारी यात्रा का मकसद जानने की कोशिश कर रही हैं। ध्यान में ही बिसम्य भरी नजरों से हमें देख रही हैं।


अजनबी होते हुये भी चिरपरिचित लग रही हैं। हमे भी अपनी यात्रा का प्रस्थान बिंदु याद आने लगता है वो बाग में मेरा निश्चल शरीर अभी भी दिख रहा है। मैं भी तो ध्यान में हूँ। ये भी यात्रा में हैं हम भी यात्रा में हैं।इनकी मंजिल होगी हमारी भी मंजिल है। हम तो सौंदर्य दीप का दर्शन करने आये हैं और यहां भी मनुष्य पहले से ही मौजूद हैं और ध्यान में हैं। हमसे पहले ये लोग यहां पहुंचे हैं हम भी देर से ही सही यहाँ आ तो गये ही हैं। हमारी मंजिल तो तय है इसलिए हम मनुष्य का ध्यान करते हैं ताकी अगर वह मिल जाये तो दिल की बात हो सके। हां ध्यान में उन स्थानों की यात्रा जहां तक मनुष्य आज तक पहुंचा ही नहीं है इस चुनौती के क्रम में यह एक पड़ाव हो सकता है यह सौंदर्य दीप। जहां हम एक ध्यानवत स्त्री के पास खड़े हैं और उसके दिमाग के अंदर जाना चाहते हैं यह पता लगाने के लिये कि दिमाग की किस दुनिया में ये यहां पर स्थित हैं। चलो इनके माथे पर जहां तीसरी आंख होती है उस आंख के रास्ते इनके दिमाग में चलते हैं, ये जो बदला सा माहौल है सांसारिक प्रपंचों से मुक्तता का ध्यान के हथियार से। पहले ऐसा नहीं था बहुत समय बीता है इस रूपांतरण में। तब से आज तक जब पहला आदमी पृथ्वी पर आया औऱ आज जब सौंदर्य दीप में ध्यान लगाये बैठा है या बैठी है तक, इतिहास की धूल से उठते हुये तूफान, आंखों के सामने धुंधलका, बेचैनी, अंधेरे की सक्रियता, दिशा का अभाव, उद्दिग्नता, सबसे पार जाने के लिये लगाई गयी एक छलांग के बाद आई है ये अवस्था।


अभी गुजरे पल की बनती हुई धूल से बेखबर एक परछाई के सम्मोहन में हैं दिमाग और परछाई है कि बोलती है भई मुझमें खोवो मत, मेरा सन्देश तुमको अच्छा लग सकता है, मेरा आशीष तुमको अद्भुत लग सकता है, मेरा दृष्टिकोन तुमको आधुनिक लग सकता है। मेरा विचार तुम्हें मानवता का नया वस्त्र लग सकता है, पर यह सारा सौन्दर्य तुम्हारा जीवन थोड़ी है, यह तुम्हारे जीवन का हिस्सा हो सकता है, तुम्हारा पूरा जीवन नहीं। तुम्हारा जीवन इस सौंदर्य से बड़ा हो सकता है। मेरे सौंदर्य को पाने के लिए ध्यान तो जरूरी है लेकिन उससे भी अधिक सुंदर है जीवन की प्राप्ति।जो तुम्हें इस सौंदर्य से बाहर भी मिल सकता है। देखो मैं आज हूँ कल नहीं रहूंगा और तब तुम्हें इस सौंदर्य से बाहर निकलने का काम खुद करना पड़ेगा। तो तुम्हें मेरे जीवन का इंतजार नहीं करना चाहिये। जाओ अपने जीवन में, मेरे सौंदर्य से पार।

लेकिन ध्यान में बैठी हुई स्त्री पर परछाई की इन बातों का असर नही पड़ रहा है। ध्यान में वो खिंचती चली जा रही हैं परछाईं के आकर्षण में।यह पल इतिहास की धूल नहीं बन पा रहा है। यह पल अस्तित्व में है, यह पल ध्यान में है। लेकिन जीवन ध्यान नहीं है। निःसन्देह जीवन इतिहास की धूल से घिरा हुआ है। तो सौंदर्य दीप में ध्यान में विमग्न इस स्त्री का दिमाग एक परछाईं में खोया हुआ है। इसके आगे है जीवन की यात्रा। परछाईं के चुम्बकीय प्रभाव से मुक्त होने की शक्ति नहीं है इनके अंदर और इस मुक्ति के प्रयास में परछाई के प्रयास भी कोई गतिशील भूमिका नहीं अदा कर पा रहे हैं। तृप्ति का समुन्दर थी परछाईं लेकिन ध्यान की जड़ता ने उसे एक बार फिर प्यासा बना दिया है और प्यासा है भई अपने जीवन मे जाओ, अपने जीवन को किसी सौंदर्य से विराट समझो। यात्रा अनवरत है तो यहाँ विश्राम करने से जीवन अधूरा रह जायेगा। वो सुंदर संभावनाएं जो जीवन मे हैं उन तक अगर नहीं पहुंचे तो जीवन के सौंदर्य से बंचित रह जाओगे। तो इस सौंदर्य दीप में ध्यान में विमग्न स्त्री अपने दिमाग की उस दशा में है जहां परछाई के आकर्षण के अतिरिक्त कोई और बल काम नही कर पायेगा। सारे बलों को निष्क्रिय करने की शक्ति है ध्यान में और अगर ये जीवन से जुड़ा है तो समझिये एक चमत्कार होने वाला है।


इस चमत्कार को होना ही है। एक सौंदर्य से परिपूर्ण चमत्कार होने वाला है। ध्यान की परिपूर्ति ध्यान से बाहर आने में ही है। लेकिन यहां इस सौंदर्य दीप में ध्यान में बैठी हुई स्त्री की मानसिक अवस्था बिल्कुल कोल्ड है। इसके आगे अगर उस परछाईं को पार करके जाया जायेगा तो गुलाबी रंग और गहरा होता जाएगा औऱ गहरा होता जाएगा।गुलाबी अंधेरा छाया हुआ है यहां अपना ही हाथ अपने को नहीं दिख रहा है। आगे के रास्ते बंद हैं औऱ अगर कहीं रास्ता मिलता है तो यह होगा उस परछाई के सन्देश की परिपूर्ति का कि मुझसे आगे बढ़ो। यह होगी एक नई यात्रा। जिसमे आगे का रास्ता आपको खुद तय करना है।


आगे की यात्रा आपके जीवन का प्रयोजन हो तो गुरु महाराज के सन्देश याद आने लगते हैं कि जिस चीज की तुम्हें तलाश है वो तुम्हारे ही पास है। बड़ा मुश्किल काम होता है आदमी के दिमाग़ में जाकर उसकी मानसिक यात्रा में उसका सहचर बनना। लेकिन यहां पर हमने ये यात्रा पूरी की है औऱ अब दिमाग से बाहर निकल रहे हैं और अब अगर बाहर हैं तो बचता क्या है सौंदर्य दीप में ध्यान लगाए बैठी एक लावण्यमयी महिला के सिवाय। बहरहाल हम ध्यान के यान में सवार हैं और लौट रहे हैं अपने प्रस्थान बिंदु के पास।


अभी तो हमारा निश्चल शरीर बाग में कुर्सी पर बैठा हुआ है। अगर वहां दो चार दिन इसी तरह पड़ा रहा तो क्या होगा इसका अनुमान आप लगा सकते हैं यही न कि एक आदमी मरा हुआ पड़ा है और उसकी श्वास चल रही है। यही न कि बाग में एक आदमी बेहोश पड़ा है। इन खबरों से बचने के लिये अब वापस आना होगा अपने ही शरीर में और मैं वापस आ भी गया हूँ।


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