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Sunita Mishra

Abstract

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Sunita Mishra

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साथ साथ

साथ साथ

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"अरे तुम सोई नहीं।"

"आपके माथे पर ठन्डे पानी की पट्टी रखती रही।बहुत तेज बुखार था आपको।

अब जाकर कम हुआ है।"

"कम हो गया न, थोड़ा अच्छा भी लग रहा है। तुम अपनी कमर सीधी कर लो।"

रुक्मी वहीं पास पड़े पलंग पर लेट गई। जल्दी ही उसकी आंख लग गई। बलराम जी उसे एकटक देखते रहे।माथे पर चिंता की लकीरे,थका चेहरा।क्या ये वही रुक्मी है जिसे ब्याह कर लाने के बाद कई सालों तक उन्होने उससे सीधे मुँह बात नही की।

कहीं मेले ठेले भी अपने साथ नहीं ले गये। कसूर ये की रुक्मी उनकी पसंद नही थी। साधारण से भी साधारण रुप रंग की वो,और कहाँ वे गोरे चिट्टे गबरू जवान, बेमेल विवाह।

उन्होंने तो रुपा के सपने देखे, भाभी की छोटी बहिन।पर रुपा को जूते की फेक्ट्री में हिसाब-किताब देखने वाला बाबू कहाँ पसंद आया।

फुर्र से उड़ गईअपने किसी मालदार प्रेमी के साथ। रुक्मि बिना वेतन की नौकरानी, पूरे परिवार की सेवा करती। धीरे धीरे सबके दिल में जगह बना ली उसने सिवाय बलराम जी के। जूते की फेक्ट्री में अधिक कर्मचारियों की छटनी की चपेट में बलराम जी भी आ गये।

घर पर मंडराते आर्थिक बादलो का सामना तब रुक्मि ने डट कर किया, अपनी सिलाई मशीन का आसरा ले लिया और ऐसे ही गृहस्थी के मंच पर साथ साथ अभिनय करते हुए कब उनकी आँखो मे रुपा की जगह उनकी पत्नी रुक्मि ने ले ली। धीरे से उठकर वे रुक्मि के पास आये, उसके बिखरे बालों को चेहरे से हटाते हुए प्रेम पगे स्वर मे बोले"रुक्मि कितनी सुन्दर हो तुम।"


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