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Mukta Sahay

Tragedy Inspirational


3.5  

Mukta Sahay

Tragedy Inspirational


साँस लेती प्रकृति

साँस लेती प्रकृति

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सुबह उठते ही मिहिर, मेरे दस साल के बेटे, ने कहा माँ आज पता है आज मैंने सपने में क्या देखा। मैंने पूछा क्या देखा! वह कहता है मुझे खाँसी आ रही थी और मैं ज़ोर-ज़ोर से खाँसा जा रहा था। मैंने अपने रूमाल को अपने मुँह पर बांध लिया। जब मेरी खाँसी रुकी तो मैंने खुद को एक जंगल में पाया। वहाँ बहुत ही बड़े बड़े पेड़ थे और नदी बह रही थी। पेड़ों के पत्ते पीले से थे और नदी का पानी काला। उजाला भी कुछ कम था तो मैंने आसमान की तरफ़ देखा तो वहाँ बादल भी काले गंदे से थे और जब थोड़ी देर में बारिश हुई तो बूँदे भी काली ही गिर रहीं थी। मैं पूरी तरह से काला हुआ जा रहा था उस काले बारिश में भींग कर। मैं भागता हुआ वहाँ के सबसे बड़े पेड़ के नीचे छुप गया ताकि मैं भिंगने से बच जाऊँ और खुद को साफ़ करने लगा। 


मिहिर! तभी किसी ने मेरा नाम बुलाया। मैं परेशान हो गया, यहाँ तो कोई भी नही है फिर ये कौन मुझे बुला रहा है। फिर से आवाज़ आई, किसे ढूँढ रहे हो मिहिर, मुझे! मैं पेड़ बोल रहा हूँ जिसके नीचे तुम खड़े हो। मैं पलट कर देखा तो सच में पीछे से पेड़ ही बोल रहा था। मैं थोड़ा डर सा गया लेकिन तुम कहती हो ना माँ की हर मुश्किल का सामना हिम्मत से करना चाहिए तो मैंने पेड़ से पूछा, आपको मेरा नाम कैसे पता है? तब पेड़ ने कहा, कैसा लग रहा हैं यहाँ आ कर, अच्छा तो नहीं लग रहा होगा तुम्हें। मैंने कहा, हाँ, बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा है। यहाँ सब कुछ ही अजीब सा है। इसपर पेड़ ने कहा, पता है इसे ऐसा किसने बनाया है? मैंने कहा, नही। तुमने किया है हमरा ये हाल, पेड़ ने कहा। मैंने बोला, मैंने कैसे। अब पेड़ ने थोड़े ग़ुस्से से कहा, तुम सब मिल कर पेड़ों को काटते हो, जानवरों को मारते हो, गाड़ियों एवं उद्योगों से गंदे धुआँ निकलते हो, ए॰ सी॰ चला और पता नही क्या क्या करके प्रदूषण फैलते हो जिसके कारण हमारे पत्ते पीले हो गए हैं और हम बूढ़े हो रहे है,नदियाँ काली हो गई है और ना जाने क्या-क्या। अब पेड़ का ग़ुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। मुझ में उनसे कुछ भी कहने का साहस नही हो रहा था।

थोड़ी देर वह चुप रहे। तब तक काली बारिश भी रुक गई थी। मैं वहाँ से जाने लगा तो पेड़ ने दुखित होते हुए कहा जब तेज हवा चली तो तुम्हें आस-पास फैली धूल-मिट्टी की वजह से खाँसी आई और तुमने अपने नाक और मुँह को रूमाल से ढक कर अपना बचाव कर लिया। अब हमारी सोचो हम कैसे खुद को बचाएँ। अगर पूरी प्रकृति स्वयं को ढक लेगी तो क्या होगा तुम सब का। ना तुम्हें तुम्हारी प्राणवायु मिलेगी और नही जीवन रूपी जल। हम-सब पूरी प्रकृति तुम्हारी मदद करते हैं पर तुम सब हमारा ख़्याल नही रखते हो। अब पेड़ शायद रोने ही वाले थे तुमने मुझे आवाज़ दे दी और मैं उठ गया। 

माँ, हम अब पेड़ लगाएँगे और मैं कभी भी कार की ए॰ सी॰  नहीं चलाऊँगा और नाही घर में। मैं अब सभी पेड़ों का ध्यान रखूँगा। पास बैठे मिहिर के पापा भी उसकी बातें सुन रहे थे, उन्होंने भी कहा की अब वे भी इस काम में मिहिर का साथ देंगे, प्रकृति की देखभाल करेंगे  ताकि प्रकृति कभी भी खुद को ढँकने की बात ना सोंचे।


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