Swati Rani

Tragedy


4.8  

Swati Rani

Tragedy


रोटी

रोटी

4 mins 195 4 mins 195

वे सभी लॉक डाउन से बेरोज़गार हुए मजदूर थे ! करीब आठ-दस लोंगों का झुंड था ! लाख गुजारिश के बाद भी जब उनकी किसी ने ना सुनी ,तो अपनी पीठ पर कुछ ज़रूरी सामान को टाँगे वे पैदल ही रेलवे ट्रैक पर चलते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे !

उसी झुंड में एक औरत अपने दुधमुंहे बच्चे को लादे और लाडले की उंगली थामे चली जा रही थी !अब और कितना माँ,बस बेटा थोड़ी दूर और !

पैरों मे अनगिनत छाले थे, पर छालों कि किन्हे परवाह थी, उनहें तो अपने शहर कि मिट्टी रुपी दवा पल भर में भर देती !

कितने घंटे पैदल चलने के बाद थकान आने पर सब बैठे ! घर पहुँचने की जोश में थोड़ी कमी आई, जब शरीर ने जवाब देना शुरू किया !पेट की क्षुदा थोड़ी समझ में आयी ! पसीने से लथपथ शरीर पर पुरवाईया की बयार, ठंडक दे रही थी ! 

पर अगले दिन घरवालों की एक झलक कि आस ने उनके दृढता में कमी नहीं आने दी थी ! 

एक ने कहा लाकडाऊन खुलते ही कजरी का कन्यादान करुंगा, कितनी सुंदर लगेगी ना वो लाल जोड़े में !

एक बोला मैं तो पहूँचते, चंदन की माँ को दूर से जी भर देखूँगा !

एक बोला दस रोज बाद आठ साल हो जाएंगे गांव में पैर रखे ! 

छुटकु बोला मैं तो जाते जाते अंबिया तोडुंगा !

देह कि व्याधि मन के कल्पनाओं को रोक नहीं पा रही थी ! मन में घर के ख्वाब हिलोरें ले रहे थे !   

चाँद पूरी तरह से खिला हुआ था. एक बोला "देखो सब,आज तो चाँद भी बिल्कुल अपनी रोटी की तरह दिख रहा है,बिल्कुल गोल चाँद के ऊपर ये धब्बे,वैसे ही लग रहे हैं ना,जैसे हमारी रोटी पर पकने के निशान है !

दूसरे ने उसे डपटते हुए कहा-"चुप बे,तुम्हें तो हर वक़्त मजाक ही सूझता है !

 पास चल रहे एक दूसरे मज़दूर ने कहा-"हाँ भाई,ये सब रोटी का ही तो खेल है !जिस रोटी को कमाने के लिये हम सब इतनी दूर परदेस में आये थे,काम बंद होने से वहीं  रोटी के लाले पड़ने शुरु हो गये हैं,तभी तो हम लोग अपने गाँव जा रहे है !अपने परिवार के साथ तो रहेंगे ना !रूखा-सूखा जो भी मिलेगा,मिल-बाँट कर खा लेंगें ! 

पता ना कैसा संकट आया है धरती पर, दूसरा बोला ये प्रलय है चाचा, आज तक ऐसा सुना ना था !

 कोई ना अब सुबह घर तो पहुँच ही रहे है, मरेंगे भी तो परिवार के साथ ही, अपनी धरती पर ! 

तभी एक बोला "अरे यार,भूख लगी है !खाने के लिये रोटियाँ और प्याज साथ हैं !सभी साथियों को बुला लो !

 एक बोला,अरे कुछ रोटी कल के लिए भी बचा लो अभी सफर लंबा है !  

पेट की क्षुधा शांत हुई तो एक साथी ने सलाह देते हुए कहा-"पिछले दस घंटों से लगातार पैदल चलते हुए थक गये हैं,थोड़ी देर आराम करते हैं,फिर तरो-ताज़ा होकर आगे चलेंगें,सभी मज़दूरों ने हामी भर दी ! 

 क्यूँकि उन्हें पता था लाकडाऊन में रेल गाड़ी नहीं चल रही है !सो वे निश्चिन्त होकर पटरियों पर लेट गये !

चांदनी रात,बहती हुई ठंडी हवा और ऊपर से थके-माँदे शरीर,न जाने कब नींद ने उन्हें अपने आग़ोश में ले लिया !इस बात से बेखबर की कल कि सुबह उनके नसीब में ना थी !उनकी यह नींद,आख़िरी नींद साबित हुई ! 

उस ट्रैक पर यात्री गाड़ी तो नहीं,पर एक माल गाड़ी तीव्र गति से आई और उन सभी सोये हुए मज़दूरों को काटते हुए चली गई !     

थोड़े देर पहले,जिस रेलवे ट्रैक पर मज़दूर सोये हुए थे,ज़िंदा थे और साँस ले रहे थे,एक पल में अब उस ट्रैक पर खून से बने पत्थर ,मज़दूरों के कटे हुए शरीरों के माँस के लोथड़े और हाँ,वहाँ थी वो रोटियाँ,जिन्हें मज़दूरों ने आगे लंबे सफ़र के लिये बचाकर रखीं थी !उनको क्या पता था आज उनकी आखिरी रात थी ! बस वो एक मिनट उनके जिंदगी पर भारी पर गये !एक बार फिर गरीबों की गरीबी उनपर भारी पर गयी !

इस भयानक मंजर को देखकर चाँद भी डर गया.और खुद को बादलों की ओट में समा लिया ! 

वो रोटियां जो वहाँ पड़ी थी, उनको देखकर दुनिया के आंसू छलक पड़े ! आज पता चला कितना अच्छा होता ये रोटी ही ना होती , ना ये पेट की आग होती ,ना मजदूरों को गांव छोड़ना पड़ता और ना आज यहाँ ये लाशें होती, और इन लाशों को अपनी धरती नसीब होती !


Rate this content
Log in

More hindi story from Swati Rani

Similar hindi story from Tragedy