पत्थर जो लिखा पर भेजा नहीं

पत्थर जो लिखा पर भेजा नहीं

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प्रिय,

हां, प्रिय ही तो हो तुम मेरे और जीवन पर्यन्त रहोगे।आज तुमको छूंकर यादों की लहरें यहां आई, ह्रदय पुष्प की पंखुड़ियां बिखर गई, कांटे भी खिलखिलाते नज़र आए।

‌ आज 'करवाचौथ ' है ना पर मेरे चांद तो तो तुम ही हो न --तुम्हारी वो तस्वीर है न उसी को देख कर अपना व्रत तोड़ा। मेरी मांग का सिंदूर तुम, हाथ। के खनकते कंगन। तुम, पैरों की छनकती पायल तुम, बिछिया तुम मेरी हर स्वांस में तुम हो प्रिय। तुम्हारे ह्रदय की। धड़कन बन रहना मैं

चाहती हूं, उम्र की हर सांस तुम्हारे ही साथ। जुड़ी हैं। कई बार सोचती हूं यही तो दिन हैं जिन्हें। हम अपने नेह से सिंचित कर भरपूर। जीवन को जीलें ---पर। फिर। सोचती। हूं जब तुम अपने श्रमजल से देश को सिंचित कर दुश्मनों। से। बचा रहै। हो तो मेरा यह जीवन कुछ। नहीं, सोच छोटी। लगती।

हर आहट पे चौंकती। हूं, हर पल तुमको महसूस। करती, पर फिर मायूस सी तुम्हारी यादों में खो जाती, बस सालों हो गए एक बार आ जाओ तो मैं जी भर कर तुमसे बातें कर लूं अब आए तो। जाने ना दूंगी भर लूंगी अपनी बाहों में।

‌‌‌‌ देश के प्रति तुम्हारे समर्पण के सामने मेरा त्याग नगण्य है,पर तुम मेरे त्याग को महसूस करते हो न ?

‌ ‌‌‌‌जब आवोगे तब ही पढ़ना यह खत मेरा, मैंने संभाल कर रखा है उसी संदूक

में जो तुमने मुझे दी थी। तुम्हारे कर्तव्य

पथ में मैं कभी बाधक नहीं रहूंगी।

तुम भी खामोश

‌ मैं भी खामोश हूं

मूक रास्तें,खामोश प्रकृति

चारों ओर धुंध

‌‌‌कुछ सुना तुमने साथी।


मेरी खामोशियों

को पढ़ लो

आता घर पढ़ना।


चुनरी फीकी

तन-मन फीका

ये संसार भी फीका

‌जिसने रंग दी

‌आत्मा

‌‌रोम रोम रंगीन हुआ

‌ ‌वहीं मेरा रंगरेज।


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