प्रतीक्षा
प्रतीक्षा
प्रतीक्षा...अब यही शब्द अदिति के जीवन का ध्येय था।
अपने इसी ध्येय की प्राप्ति हेतु एक दिन वह बैठी हुई थी, माल रोड पर स्थित गांधी पार्क पर बने चबूतरे पर। उसकी थकी निगाहों ने एक बाइक को रूकते हुए देखा। उस बाइक से एक लड़का और लड़की उतरते हुए दिखे और वे उतरते ही उसके सामने वाले चबूतरे पर बैठ गये। लड़के के साथ बैठी लड़की की मांग में सिंदूर भरा था।
अदिति ने तुरंत लड़के को पहचान लिया था। यह वही लड़का था जो कभी उसका हमदर्द बना फिरता था। अदिति इस बात को अब अच्छी तरह समझ गई थी कि जिसकी प्रतीक्षा में वह अब तक बैठी रही, वह इस योग्य बिल्कुल नहीं था। वाकई में उस लड़के ने उसकी प्रतीक्षा में विराम लगा दिया था।

