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Dr.Padmini Kumar

Abstract

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Dr.Padmini Kumar

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परंपरा

परंपरा

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दीपावली के दिन रतालू की सब्जी बनती है, बचपन में यह सब्जी अच्छी नहीं लगती थी, पर जब से बनी है तो जल्दी-जल्दी खाना ही पड़ता है, तो लगता था पापा लोग इतने कंजूस हैं जो इस खुजली वाली सब्जी को त्योहार के दिन भी खिला रहे हैं। दादी माँ कहती थी कि जो इस दिन रतालू नहीं खायेगा वह अगले जन्म में तिल के रूप में जन्म लेगा। उन्हें लगातार यह सोचकर खाया जा रहा है कि कहीं वे मोलहिल तो नहीं हो जाते।

जब वे बड़े हो जाते हैं, तो वे समझते हैं कि रतालू ही एकमात्र ऐसी सब्जी है जिसमें फास्फोरस अधिक मात्रा में पाया जाता है, यह एक ऐसी मान्यता है और अब चिकित्सा विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि यदि हम इस दिन देशी रतालू की सब्जी खाते हैं, तो पूरे के लिए स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में साल में नहीं होगी फास्फोरस की कमी, यह परंपरा कब से चल रही है, यह तो नहीं पता, लेकिन यह सच है कि हमारी लोक मान्यताओं में वैज्ञानिकता छिपी है, धन्य हैं पूर्वजों ने विज्ञान को इसमें शामिल किया परंपराएं, अनुष्ठान, रीति-रिवाज को माना।


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