पीला दुपट्टा
पीला दुपट्टा
" कुछ बोल रही हूँ ..... ध्यान कहाँ हैं ? " इनकी टोकाटाकी ने मेरी तपस्या भंग की !
ध्यान कहाँ है ?
ये प्रश्न तो गीता के समय से ही अनुत्तरित सा ही है , मानव स्वभाव एकाग्रचित्त हो सकता तो गधा न कहलाता ? जितने गधे आज ध्यानस्थ से खड़े रहते है पिछले जन्म में बड़े उत्श्रंखल रहे होंगे । चंचलता ही मनुष्य की जीवन ज्योति है सीमा है , रेखा भी ।
ध्यान कहां है ?
ये प्रश्न गीता में प्रभु ने मानव से पूछा , कॉलेज में गीता ने मुझे पूछा , गीता को उसकी मम्मी ने पूछा और आज ये महामाया मुझे पूछ रही , ध्यान कहाँ है ?
पति का प्यार पत्नी के लिए सीधी रेखा में नही चलता , कभी किसी बिंदु पर रुकता है तो कभी आशा पर तो कभी साधना रत हो जाता है और पत्नी हमेशा विवाहसिद्ध अधिकारों का दुरुपयोग कर के पति के मन की डल लेक में पत्थर फेंकने लगती है ।
मुझे इनके लिए एक ख़ास पीले रंग का दुपट्टा लेना था वो ख़ास वाला पीला रंग खोज रहा था । सिर्फ़ पीला बोलने से काम चलता नहीं .. सेम्पल ज़रूरी है ।
मैं वो सेम्पल ही ढूंढ रहा था ताकि इनके धानी सूट पर सजा दूँ अपने हाथों से फ़बा दूँ ! आज सेम्पल मिल गया .... पड़ौस की छत पर सूख रहा था !
मेरी आँखें , मन , प्राण , सब उसी में जा अटके ! अब ख़ुद जीना चढ़ कर तो दुप्पटा उपर आएगा नहीं , कोई न कोई आ कर सुखायेगी ही !
ये दुपट्टा कब लायी ये पड़ोसन ? गज़ब का कलर सेंस है इसमे जो अक्सर .पत्नियों में नही पाया जाता ! पड़ोसन बेचारी घर मे अकेली जान , क्या क्या करे ?
इनकी तेज़ जो पहले कटारी हुआ करती थी नज़रों ने मेरी आँखों से निकली नज़र की रेखा का पीछा किया और दुपट्टे पर जीरो इन होते ही ये एकदम महाकाली भद्रकाली हो गईं ।
इससे पहले की ये अपना त्रिशूल उठा कर दे मारे , मैंने आँखों मे भावुक पाठकों वाली नमी ला कर कहा , " सुनो , ये दुपट्टा मुझे तुम्हारे मायके से आये उस धानी सूट की याद दिला देता है जो तुमने हनीमून में पहन कर मेरा कलेजा निकाल लिया था ! उफ़्फ़फ़ आज चलो न वैसा ही खरीदते हैं फिर से ...!"
देखा ये मिरर के सामने .. ऑलरेडी खड़ी थी !
इसका बस चले तो ट्रेंडी फैशन हाउस के उपर ही घर ले ले ! इसे ये नही पता कि पड़ोसन की फ़ेवरेट शॉप भी वही है , मैं कई बार हो आया पर वो ये दुप्पटा लायी कब ?
प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया ख़ैर मैं मरते मरते बच भी गया ! बोलो पीले दुप्पटे वाली की ....!
