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Sarita Kumar

Inspirational


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Sarita Kumar

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फरिश्ता

फरिश्ता

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आज सुबह सुबह पता चला है कि रजनी तो 16 महीने पहले ही पूरी तरह ठीक हो चुकी है। और इस बात की पुष्टि के लिए दो बार जांच भी की गई थी। उसके बाद जो बार बार बीमार पड़ जाती है इसका कारण बीमारी नहीं है बल्कि हमेशा बीमार पड़े रहने की प्रबल इच्छा है जैसा की डॉक्टरों का कहना है। क्योंकि जब रजनी सचमुच बीमार थी तब उसकी जो देखभाल सेवा सुश्रुषा की गई थी वह उसे बेहद भा गई और आत्मिक सुख पहुंचाने लगी थी उसे, और उसी मानसिक सुख को स्थायित्व देने के लिए उसका अवचेतन मन उसे बीमार रहने के लिए प्रेरित करता रहा परिणामस्वरूप वो प्रत्यक्ष रूप से बीमार रहने लगी। बीमार होने का कोई कारण बचा नहीं है।

मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से सुदृढ़ हो चुकी थी। सब कुछ उसके मन और इच्छा के अनुसार होता रहा था। जो सब सामान्य अवस्था में हो ही नहीं सकता था। इसलिए वह एक काल्पनिक दुनिया में अपना जीवन बसर करने लगी थी। बेपरवाह होकर हर किसी से। सपनों की दुनिया में आनंदित रहने लगी थी जिसका प्रभाव उसके वास्तविक जीवन में भी दिखाई देने लगा था। घर वाले उसे खुश देखकर खुश रहने लगे चाहे जिस कारण से भी वो खुश तो थी न और उसका दैनिक दिनचर्या भी सुचारू रूप से चलने लगा था।

उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि वो स्वस्थ्य होकर भी बीमार क्यों है ? क्योंकि अचेतन और अवचेतन अवस्था को समझ पाना संभव नहीं हो सका था। वो जब भी बीमार पड़ती थी तब अपने एकलौते दोस्त आनंद को जरूर बताती थी। घर वाले भी परेशान हो जाते थे। इस चक्कर में लाखों रुपए बर्बाद हो गये। दो चार दिन पहले जब आनंद ने समझाया तब उसने दृढ़ संकल्प लिया की अपने मन मस्तिष्क को नियंत्रित करके लेगी और इस तरह बीमार नहीं पड़ेगी जिससे कि उसके बच्चे या और कोई अपना परेशान हो। थोड़ी मदद के लिए जब उसने अपने डॉ को फोन किया तब उन्होंने सारी सच्चाई बताई। इसे स्वीकारना गवारा नहीं हुआ उसे। लेकिन डॉक्टर की बात पर यकीन करना पड़ा। ऐसा होता है कि बीमारी में जो कुछ अतिरिक्त स्नेह, प्रेम और परवाह मिलती है न तो इंसान उसी कम्फर्ट ज़ोन में रहने का आदी हो जाता है। जो सामान्य अवस्था में मुमकिन नहीं है। रजनी को उन सभी लोगों का परवाह करना अच्छा लगता था। सुबह से शाम तक सब लोग उसके इर्दगिर्द घूमते रहते थे।

व्हाट्सएप, मैसेंजर और कॉल भी बहुत आने लगे थे। परिवार के तमाम लोगों के साथ साथ उसका बचपन का मित्र भी उसका विशेष ख्याल रखने लगा था। कुछ दिनों से जब मैसेजेस आने कम होने लगा। उसके कॉल भी इग्नोर होने लगे तब उसका अचेतन मन उसे बेवजह बीमार करने लगा। यह बात तो बिल्कुल वैसी हुई की जब पांव टूटने पर बैसाखी पकड़ाई गई हो और बैसाखी से गहरा लगाव हो गया हो इसलिए पांव ठीक होने के बाद भी बैसाखी का सहारा ले रही हो। मेडिकल रिपोर्ट और डॉक्टर की बातों से स्पष्ट हो चुका था मगर फिर भी रजनी की हालत बेहद गंभीर थी। परिवार के लोग थक हार कर बैठ गये थे। एक दिन अचानक आनंद का आना हुआ। सभी ने बड़े गर्मजोशी से स्वागत किया।

कुछ औपचारिक बातचीत के बाद रजनी की सेहत को लेकर चर्चा हुई। आनंद ने कहा "आप लोग यकीन मानिए रजनी बिल्कुल ठीक हो चुकी है। बीमारी का नाटक कर रही है। आप लोगों को साइकोलॉजिकली ब्लेकमैल कर रही है। आप लोग उसके जायज़ नाजायज हर मांग पूरी कर रहे हैं इसलिए उसने नाटक फैला रखा है। उसे कुछ नहीं हुआ है यह बात मैं दावे के साथ बोल सकता हूं।" सब लोग चुपचाप सुन रहे थे जैसे सत्यनारायण भगवान की कथा कही जा रही हो। रजनी के पति सोमेश को आनंद की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था और ऐसे रूखे व्यवहार पर क्रोध भी आ रहा था लेकिन घर आए मेहमान को देवता तुल्य माना जाता है इसलिए खामोश थे। डिनर के बाद आईसक्रीम लेकर आनंद बाहर निकल कर गार्डन में टहलने लगे पीछे से रजनी भी आ गई और आनंद से बोली आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं ?

आनंद ने अनसुनी की और गेट से बाहर निकल गये। रजनी भी बाहर निकल गई और बीच सड़क पर खड़ी हो गई। सामने से ट्रक आ रहा था हॉर्न भी दे रहा था मगर न जाने क्यों रजनी बहरी बन गई और खड़ी ही रही जब हादसा का आसार हुआ तब आनंद से हाथ पकड़ कर खींचा और ज़ोर से डांटा "पागल हो गई हो अभी सेकेंड भर में कीमा बन जाता तुम्हारा। सुनाई नहीं दे रहा था या फिर क्या चाहती हो ? " रजनी भोली सूरत बनाकर एक टक देखती रही आनंद को बोला कुछ नहीं बस दो बूंद स्वाती के टपका दिया ....। आनंद को लगा रजनी डर गई है इसलिए उसे गले से लगाकर पीठ थपथपा दिया तुम तो डबल बहादुर हो कैसे डर गई ? रजनी ने कहा मैं डरी नहीं हूं बल्कि डर से उबर गई हूं।

पहले डर गई थी यह सोचकर कि अब किसी को मेरी फिक्र नहीं है कोई मेरी परवाह नहीं करता अब। काफी दिनों से बीमार हूं इसलिए ऊब गए हैं सब लोग और चाहते हैं कि मैं मर ही जाऊं। यही आजमाने के लिए ट्रक के सामने आ गई थी। आपने मुझे बचाया और डांटा भी तो यकीन हो गया और किसी को मेरी परवाह हो न हो लेकिन आपको तो है न ? बस इसीलिए आंखों से छलक गया आपका प्यार। "देखो मुझे तुम्हारी कोई फ़िक्र परवाह और चिंता विंता नहीं है। बस किसी हादसे का गवाह नहीं बनना चाहता था इसलिए बचाया है।" आनंद नहीं चाहते थे कि रजनी कोई खुशफहमी पाल ले इसलिए थोड़ा कठोर व्यवहार किया। रजनी रोनी सूरत बनाकर घर की तरफ़ लौटने लगी। गेट पर ही परिवार के सभी लोग इकट्ठा मिल गये। कुछ घबराए हुए नज़र आए शायद ट्रक का ब्रेक लेकर रोकने की आवाज और डांट फटकार सुन लिया था सभी ने। सबके सब चिल्ला उठे रजनी ठीक तो है न ? रजनी ने कहा हां बिल्कुल ठीक हूं आनंद साहब नहीं होते तो शायद मैं नहीं बच पाती।

बाहर लॉन में ही सब लोग बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। रजनी उठकर कमरे में आ गई। बाकी लोग बाहर रूक कर रजनी की हालत पर चिंता व्यक्त कर रहे थे। आनंद गंभीर मुद्रा में बैठे रहें। एक नोटिफिकेशन आया तब मोबाइल देखा रजनी का मैसेज था "सॉरी" "अब कोई गलती नहीं करूंगी अपना ध्यान रखूंगी। आप लोग अंदर आइए और आराम से सो जाइए।" आनंद ने कहा चलिए अब सोया जाए बहुत रात हो चुकी है। हां भाई सचमुच अब सोना चाहिए बोलते हुए सोमेश उठ खड़े हुए और फिर सभी लोग अपने अपने कमरे में जाकर सो गए। 

सुबह सबसे पहले रजनी उठी और सीधा किचन में जाकर चाय बनाई और ट्रे लेकर हॉल में आई वहीं से सबको आवाज दी। बड़ी हैरानी हुई कि रजनी सुबह सुबह जगी और चाय भी बनाई ! खैर सभी ने लवली लवली मॉर्निंग को लवली ही बनाए रखने के लिए बिना देरी किए हॉल में पहुंचे और चाय की बहुत तारीफ की। चाय के बाद रजनी ने नाश्ता बनाया और खाने का मीनू भी डिसाइड कर लिया। सब लोग हैरान परेशान लेकिन बेहद प्रसन्न भी थे। रजनी की तबीयत अब ठीक हो रही है। आनंद ने कहा हां अब रजनी ठीक हो चुकी है। उसे सहज सामान्य जीवन व्यतीत करने में थोड़े सहयोग की जरूरत है बस। कुछ सावधानियां बरतनी होगी और फिर सब कुछ एकदम बढ़िया और बिंदास होगा। सोमेश ने आनंद से कहा बहुत बहुत शुक्रिया, धन्यवाद और आभार आपका जो आप यहां आए और रजनी को ठीक कर दिया।

आनंद ने बताया कि वास्तव में रजनी बीमार नहीं है बल्कि वो जानबूझकर बीमार पड़े रहना चाहती है इसलिए उसके शरीर में बीमारी के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। उसे यह भय हो गया है कि अगर उसकी तबीयत ठीक हो जाएगी तब सब लोग उसका ख्याल रखना छोड़ देंगे और वह फिर से अकेली पड़ जाएगी। इसी भय ने वहम पैदा कर दिया है। हकीकत में पूर्ण रूपेण स्वस्थ है। थोड़े दिनों तक उनका ख्याल रखिए लेकिन बैसाखी हटाना भी जरूरी है। रजनी भी सुन रही थी सारी बातें। उसने कहा हां मुझे भी लगता है कि मैं ठीक हो जाऊंगी तब सब लोग छोड़ देंगे मुझे। सभी ने एक स्वर में बोला हम नहीं छोड़ेंगे।तुम खुश रहो हंसते हंसाते रहो हम सब तुम्हारे साथ हैं और हमेशा हमेशा रहेंगे। तुम तो बहुत खुशनसीब हो कि आनंद साहब जैसा फरिश्ता तुम्हारे पास हैं। रजनी ने कहा हां सचमुच आप हैं न मेरे साथ फरिश्ता बनकर ?

आनंद ने कहा हां बिल्कुल हूं और रहूंगा फरिश्ता नहीं गधा बनकर भी चलेगा लेकिन एक शर्त पर वो यह की झूठ मूठ का नाटक छोड़ दो और सबको बताओ की तुम बीमार नहीं हो। रजनी ने कहा जी मैं बीमार नहीं हूं और कभी नहीं पडूंगी। सभी ने राहत की सांस ली। वास्तव में शारीरिक बीमारी से अधिक खतरनाक मानसिक बीमारी होती है। भगवान का लाख लाख शुक्र है कि रजनी ने मान लिया की अब वो बिल्कुल स्वस्थ है। वो कहते हैं न कि "मन के हारे हार‌ है और मन के जीते जीत।" जब मन को लगने लगेगा कि मैं ठीक हूं, स्वस्थ हूं, सुखी और खुशहाल हूं तो सारी दुनिया खुशनुमा दिखाई देगी और अपनी लाइफ औशम।


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