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हरि शंकर गोयल

Classics

4  

हरि शंकर गोयल

Classics

पौराणिक कथा : शाप

पौराणिक कथा : शाप

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आजकल रावण भक्त बहुत पैदा हो गये हैं । ये भक्त लोग रावण के चरित्र का बखान इतनी खूबसूरती से करते हैं कि उसे सुनकर अच्छे अच्छे ऋषि मुनि भी शरमा जायें । इन भक्तों का कथन है कि रावण का चरित्र इतना सुदृढ था कि उसने लंका में रहने वाली माता सीता को हाथ तक नहीं लगाया । ये लोग यह भूल जाते हैं कि अगर वह इतना ही सुदृढ चारित्रिक व्यक्ति होता तो एक पराई स्त्री का धोखे से अपहरण क्यों करता ? वह माता सीता को तरह तरह की यातनाऐं क्यों देता ? अपनी सेविका त्रिजटा के माध्यम से अपने विवाह के लिए सीता पर दबाव क्यों बनाता ? 

शायद वे लोग यह नहीं जानते हैं कि इसके पीछे कोई कारण है और वह कारण है एक "शाप" । उस शाप के कारण ही रावण ने माता सीता को छुआ नहीं था । यदि वह उन्हें छू भी लेता तो उसके दसों सिरों के परख्चे उड़ जाते । रावण यह बात जानता था इसलिए उसने माता सीता के साथ कोई जोर जबरदस्ती नहीं की थी । पर ये बात शायद वै लोग नहीं जानते जो रावण को संत बताने पर तुले हैं । 


आइये अब इस शाप की कहानी पर आते हैं । जब देवता और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था तब समुद्र में से एक अत्यंत सुंदर स्त्री प्रकट हुई थी जिसे हम सब 'रंभा' के नाम से जानते हैं । रंभा एक अप्सरा थी जिसे भगवान विष्णु ने देवताओं को दे दिया था । रंभा अपूर्व सुंदरी थी । कला , संगीत और नृत्य में पूर्णत: पारंगत थी । देवताओं के राजा इंद्र ने उसे अपनी सभा में विशिष्ट स्थान प्रदान किया था । जब भी कोई ऋषि मुनि कठोर तपस्या करते थे तब इंद्र को अपने सिंहासन पर खतरा मंडराने लगता था । तब इंद्र रंभा को ही उस ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए भेजता था । रंभा अपने काम को बड़ी खूबसूरती से अंजाम देती थी । अपने रूप यौवन और सुडौल अंगों से वह तपस्वी का मन मोह लेती थी । उसे कामांध बना देती थी और इस तरह उसकी तपस्या भंग कर देती थी । 


एक बार ऋषि विश्वामित्र ने कठोर तप प्रारंभ किया । जाहिर है कि इस तप से इंद्र भयभीत हो गया और उसने रंभा को इस तप को भंग करने के लिए भेज दिया । रंभा ऋषि विश्वामित्र की कुटिया पर आ गई और अपने सौन्दर्य , नृत्य, संगीत आदि से ऋषि विश्वामित्र को रिझाने लगी । अप्सरा रंभा के इस कृत्य से ऋषि विश्वामित्र कुपित हो गये और उन्हों रंभा को "एक हजार साल तक पत्थर " बन जाने का शाप दे दिया । 

इस शाप से रंभा बहुत घबरा गई और उसने वहीं बैठकर भगवान शिव और माता पार्वती की स्तुति करनी प्रारंभ कर दी । इससे भगवान शिव और माता पार्वती प्रसन्न हो गये और उन्होंने रंभा को वरदान मांगने को कहा । रंभा ने सारी स्थिति भगवान के सम्मुख रख दी और भगवान शिव ने रंभा का उद्धार कर दिया । रंभा पहले जैसी अप्सरा हो गई । 


रंभा वापस देव लोक चली गई । वहां पर इंद्र ने उसका विवाह कुबेर के पुत्र नलकुबेर के साथ कर दिया । कुबेर रावण का भाई था इसलिए रंभा रावण की एक तरह से "भतीजा बहू" यानि की लगभग पुत्रवधू हो गई । 

चूंकि रंभा एक अनिंद्य सुंदरी थी और उसके रूप की चर्चा संपूर्ण विश्व में हो रही थी तो रावण इससे अछूता रहे, यह संभव नहीं था । रावण तो था ही सौन्दर्य प्रेमी ।


एक दिन रंभा अपने महल में अपना पूर्ण श्रंगार कर रही थी । वह सुडौल और सुंदर तो थी ही इस श्रंगार से वह और भी कामुक लग रही थी । रावण ने जब उसे देखा तो वह काम के वशीभूत होकर उच्छ्रंखल हो गया । उसने अश्लील इशारे करके उससे पूछा "इतना श्रंगार करके किस खुशनसीब की सेज सजाने जा रही हो" ? 

इन शब्दों से रंभा आश्चर्य चकित रह गई कि उसके ससुर समान रावण किस तरह की भाषा बोल रहा है । उसे लगा कि शायद रावण ने उसे पहचाना नहीं है इसलिए ऐसी बातें कह रहा है । इसलिए उसने अपना परिचय दिया "तात, मैं आपके प्रतापी भाई कुबेर जी के पुत्र नलकुबेर की धर्मपत्नी रंभा हूं । आपको मुझसे इस तरह की बातें करना शोभा नहीं देता हैं" । 


पर रावण तो कामांध बना हुआ था । रावण को अपनी ताकत पर पूर्ण भरोसा था इसलिए वह मदांध था । उसने रंभा के साथ वहीं पर दुष्कृत्य किया । रंभा बहुत रोई गिड़गिड़ाई मगर इससे रावण पर क्या असर होने वाला था ? वह तो सौन्दर्य का पुजारी था और स्त्री को केवल "भोग्या" समझता था । बेचारी रंभा क्या करती ? क्रोध में उसने रावण को एक शाप दे दिया "अगर तूने किसी स्त्री की मरजी के बिना उसे छू भी दिया तो तेरे दसों सिरों के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे" बस, इसी शाप के कारण रावण ने माता सीता को छूने की कोशिश नहीं की । अगर वह माता सीता के साथ जोर जबरदस्ती करता तो वह इस शाप के कारण मर जाता । इस कहानी को अगर रावण प्रेमी जानते तो वे ऐसा नहीं कहते । उसने न केवल माता सीता पर कुदृष्टि डाली अपितु अपनी पुत्रवधू के साथ बलात्कार किया । फिर भी अगर रावण को कोई व्यक्ति संत की उपाधि से नवाजे तो समझो वह व्यक्ति भी रावण की तरह ही संत होगा । 

यह पौराणिक कथा इसलिए सुनाई गई है कि अगर फिर कोई बददिमाग आदमी रावण को महान संत बताने की कोशिश करे तो उसे ये हकीकत बताई जा सके । 



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