पागल की व्यथा
पागल की व्यथा
वह पागलों की तरह हंँसे जा रही थी ।
इतनी जोर से हंँस रही थी कि सड़क पर जाने वाला हर एक इंसान उसको मुड़ मुड़ कर कर देख रहा था और उसके पास बैठी एक मैली कुचली सी लड़की रोए जा रही थी।
तभी एक काला भदा सा आदमी वहांँ आया और दोनों को मारने लगा।
जो लड़की हंँस रही थी ,वह और जोर से हंँसने लगीऔर हंसते-हंसते कहने लगी "अभी तक मेरे साथ कर रहा था, अब इसके साथ भी करने लगा, कल को अपनी बेटी के साथ भी करना ,तुझे और मजा आएगा।"
वह कहती गई और वह आदमी दोनों को जोर -जोर से मारने लगा।
मगर सड़क पर जाने वाले किसी भी इंसान ने उसको रोकने की कोशिश ना की और ना ही यह पूछने की कि वह उन दोनों को क्यों मार रहा है ?
कुछ महीनों बाद मैं फिर उस चौराहे से गुजर रही थी तो मुझे उसी जगह पर वह दोनों लड़कियांँ बैठी हुई दिखाई दी ।
मगर जो लड़की उस दिन रो रही थी उस लड़की के पेट पर उभार आ गया था। मुझे समझ में आ गया कि वह गर्भवती हो चुकी है और हो सकता है वह आदमी जो उनको मार रहा था, उसी ने दोनों का शोषण किया हो ।
हंँसने वाली लड़की आज भी हंँसकर अपनी व्यथा का बखान कर रही थी।
कलंकित समाज को अपनी दशा का वर्णन कर रही थी मगर किसी को भी फुर्सत ना थी उसकी व्यथा भी फुर्सत ना थी उसकी व्यथा थी उसकी व्यथा को सुनने और उसकी दशा को देखने की।
