न्याय - अन्याय : भाग 5
न्याय - अन्याय : भाग 5
पिछले अंक से आगे
दीना राम को दलित उत्थान मंच का सक्रिय सदस्य बनाने के लिए दलित नेता सक्रिय हो गये । दीना राम में उन्हें दलित समाज का उद्धारक महापुरुष नजर आया । एक साधारण से आदमी को दलित समाज का बड़ा नेता बनाने के लिए उसका माइंड वाश करना बहुत जरूरी है । छोटे छोटे बच्चों का माइंड वाश करके उन्हें कैसे आतंकवादी बनाया जा रहा है , ये हम लोगों ने बहुत अच्छी तरह से देखा है । उन्हीं से प्रेरणा लेकर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाया गया है जिसमें सभी मासूम लोगों का माइंड वाश करके उन्हें "क्रांतिकारी" बनाया जा सके । इसी बात को ध्यान में रखकर दलित नेता और DUM के पदाधिकारी घमंडा रावण ने कहा
"दलित क्रांति लाने के लिए सभी दलित भाइयों को प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है । ये लोग तो पहले ही दबे कुचले हुए हैं । लाचार हैं, अनपढ़ हैं । आर्थिक रूप से भी बहुत कमजोर हैं । बिखरे हुए हैं । इनकी बातें सुनने वाला कौन है ? क्या अब तक कोई दलित प्रधानमंत्री बना है ? नहीं ना ? हम सभी दलित भाइयों को एकजुट करके उन्हें संघर्ष करने की प्रेरणा दे रहे हैं । ऐसे में इनके प्रशिक्षण की व्यवस्था जरुर होनी चाहिए तभी तो ये सवर्णों से लड़ पायेंगे । इसके लिए दलित उत्थान मंच प्रत्येक महीने एक प्रशिक्षण शिविर आयोजित करता है । इसमें भाग लेने वाले व्यक्ति को "दलित नेता" बना दिया जाता है । आपको भी इस प्रशिक्षण शिविर में अवश्य भाग लेना चाहिए दीना राम जी । तभी तो आप यह लड़ाई लड़ पायेंगे।" दलित नेता घमंडा रावण ने कहा ।
दीना राम "शुक्र रावण" और "घमंडा रावण" नाम सुनकर आश्चर्य में पड़ गया । ऐसे नाम तो कभी सुने ही नहीं थे उसने । लोगों के नाम के साथ राम शब्द लगता है लेकिन इन नामों में राम की जगह रावण लगा हुआ था । इसका राज क्या है ? स्वाभाविक रूप से यह जिज्ञासा दीना राम के मन में हुई । घमंडा रावण से वह इसके बारे में पूछने से झिझक रहा था दीना राम । इसलिए जिज्ञासा वश दीना राम ने इस संबंध में विधायक जी से पूछ लिया । दीना राम की अज्ञानता पर विधायक जी खूब हंसे । उन्होंने कहा ।
"शुक्र रावण का असली नाम 'सूकरा राम' था । सब लोग उसे 'सूकरा' सूकरा कहकर बुलाते थे । बचपन में तो उसे अपना नाम अच्छा लगा लेकिन बाद में वह नाम उसे अखरने लगा । उसका बचपन बड़े अभावों में व्यतीत हुआ था । बाद में वह पढ़ लिख कर IAS बन गया । IAS बनते ही उसने अपने नाम को थोड़ा ठीक किया और अपना नाम बदलकर "शुक्र राम" कर लिया । इस नाम से "शुक्राचार्य" जैसे गुरु और शुक्र ग्रह की फीलिंग आती थी जो मन को आनंदित करने वाली थी ।
IAS की नौकरी से मोटा माल कमाने के बाद उसके मन में आया कि उसे अब दलित समाज के लिए काम करना चाहिए । IAS में वह अधिक से अधिक कैबिनेट सचिव बन सकता था लेकिन यदि समाज सेवा के माध्यम से राजनीति में आ गया तो वह मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री भी बन सकता है । इस देश में लोग एक अनपढ़ औरत को बिहार की मुख्यमंत्री बना सकते हैं , एक IRS को दिल्ली का मुख्यमंत्री बना सकते हैं तो फ़िर एक IAS को प्रधानमंत्री क्यों नहीं बना सकते ?
बस, उसने यही उद्देश्य रखकर अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और दलित समाज को एक करने के नाम पर उसने "दलित उत्थान मंच" नामक सामाजिक संस्था बनाई । समाज की सेवा करेंगे तो अपनी सेवा समाज करेगा, यही नियम है । पुराने उदाहरण उसके सामने थे । एक पूर्व IAS ने ऐसा कर दिखाया था और उसने अपनी चेली को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवा दिया था । उसने भी अपने समाज का उद्धार करने के लिए ही एक मंच बनाया था । और वह समाज सेवा करते करते देश का कर्णधार बन बैठा । इस देश की यही खासियत है कि यह "समाज सेवा" करने वालों की झोली बड़ी जल्दी भर देता है । शुक्र राम दलित उत्थान मंच के लिए दिन रात मेहनत करने लगा । उसके प्रयासों का ही परिणाम था कि देश में DUM एक मंच नहीं क्रांति का दूसरा नाम बन गया था और DUM का नाम बच्चा बच्चा जान गया था ।
शुक्र रावण की सोच थी कि दलितों का विकास एक ही शर्त पर हो सकता है । वह शर्त है ब्राह्मण विरोध । सभी दलित नेता ऐसा ही मानते हैं । अब तक के सारे उदाहरण यही कहते हैं । इसे प्रस्थापित करने के लिए पहले एक नारा चलाया गया
तिलक तराजू कलम तलवार
इनको मारो जूते चार
वामपंथ की क्रांति हमेशा "मारो काटो" पर आधारित रही है । अधिकांश दलित नेता वामपंथ के गुरूकुल "JNU" से निकले हैं इसलिए इनका स्टैंड भी बिल्कुल साफ है "पिछड़ा माफ , बनिया ठाकुर हाफ और ब्राह्मण साफ।" दलितों को एकजुट करने के लिए ब्राह्मणों, ठाकुरों, बणियों को गाली देना बहुत जरूरी है । इसके बिना दलित समाज एकजुट नहीं हो पायेगा, ऐसी सोच बन गई थी दलित नेताओं की । सकारात्मक सोच और कार्य नहीं बल्कि नकारात्मक सोच और गाली गलौज ही एकमात्र ऐजेंडा रह गया है दलों का ।
गाली गलौज करने के लिए "दलित चिंतकों" की तलाश प्रारंभ हुई । दलित चिंतकों ने एक से बढ़कर एक गालियों को ईजाद किया और "दलित साहित्य" की रचना की जिसमें ब्राह्मण, राजपूत और वैश्यों को जेहादियों और अंग्रेजों से भी अधिक आततायी, हिंसक, बर्बर , नृशंस, शोषक , उत्पीड़क, अत्याचारी, बलात्कारी , लुटेरा बताया गया । हिन्दी फ़िल्मों में इन तीनों वर्णों को क्रमशः पाखंडी, गुंडा और लुटेरा बताया जाने लगा तथा "दीन के आदमी" को देवता और "मदर" तथा "फादर" को भगवान का सच्चा दूत बताया जाने लगा ।
जब ऐसा प्रोपेगैंडा चलाना हो तो सनातन धर्म के देवी देवताओं को अत्याचारी दिखाना बहुत जरूरी हो जाता है । भगवान श्रीराम का चरित्र यहां के कण कण में बसा है । दलित चिंतक यह मानते हैं कि जब तक भगवान श्रीराम का चरित्र हनन नहीं किया जायेगा तब तक बात नहीं बनेगी । इसलिए उन्होंने उनको राक्षसों से भी बुरा बताने का सिलसिला आरंभ कर दिया गया ।
इसके अतिरिक्त एक काम और किया गया । दलितों और सवर्णों में खाई खोदने के लिए दोनों वर्गों को पृथक पृथक बताया जाने लगा । दलितों को यहां का मूल निवासी और शेष तीनों वर्णों को यहां पर आक्रांता सिद्ध करने के लिए एक नई थ्यौरी गढ़ी गई जिसे "आर्य सिद्धांत" कहा गया । इस सिद्धांत के अनुसार आर्य भारत के मूल निवासी नहीं माने गये बल्कि उन्हें आक्रांता घोषित कर दिया गया । इस प्रकार भगवान राम आर्य सभ्यता के प्रतीक बना दिये गये और उन्हें आक्रांता , अन्यायी, अत्याचारी बताया जाने लगा ।
इनके लिए अब रावण पूजनीय बन गया क्योंकि वह भगवान राम का विरोधी था । जो जो भी राक्षस भगवान राम का विरोधी था , वह इनके लिए आदर्श बन गया । शुक्राचार्य चूंकि दैत्यों के गुरु थे तो वे भी इनके आदर्श बन गये । इससे प्रेरित होकर सूकरा राम ने पहले अपना नाम सूकरा से शुक्र रखा । बाद में राम का विरोधी सिद्ध करने के लिए उसने अपने नाम में शामिल "राम" शब्द हटाकर "रावण" रख लिया और इस तरह अब उसका नाम "शुक्र रावण" हो गया । दलित उत्थान मंच के समस्त पदाधिकारियों ने अपने नाम के आगे राम शब्द हटाकर "रावण" शब्द जोड़ दिया जिससे नाम से ही पता चल जाये कि वह व्यक्ति DUM का पदाधिकारी है । अब समझे आप ? अब आप भी अपने नाम से राम हटाकर रावण लिखना शुरू कर दो।" मुस्कुराकर कहते हुए विधायक जी ने अपनी बात समाप्त की ।
दीना राम बड़े गौर से विधायक जी की बात सुनता रहा । उसकी समझ में कुछ बातें आयीं और कुछ नहीं आयीं । कुछ बातों से वह सहमत था जैसे दलितों का विकास होना चाहिए, यह ठीक लग रहा था लेकिन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों को गाली क्यों देनी चाहिए , यह समझ में नहीं आया । इसी तरह कोई किसी को अपना आदर्श माने , राम को या रावण को, यह उसकी व्यक्तिगत पसंद नापसंद हो सकती है लेकिन भगवान श्रीराम को दलित विरोधी, अत्याचारी क्यों बताया जाये यह बात भी उसे नहीं जमीं ।
उसने कहा "अरे , भगवान श्रीराम ने तो निषादराज को अपना मित्र बनाया था , दलित शबरी के झूठे बेर भी खायें थे । इससे ज्यादा उनका दलितों के लिए प्रेम और कहां प्रकट होगा ? मीराबाई भी तो क्षत्रिय थी , एक विश्व प्रसिद्ध मेवाड़ रियासत की बहू थी । उन्होंने एक दलित संत रैदास जी को अपना गुरु बनाया था जो कि यह दर्शाता है कि योग्यता का सभी वर्णों में उचित आदर सम्मान होता था । वाल्मीकि तो महर्षि ही बन गये और उन्होंने "रामायण" की रचना ही कर दी थी जबकि वे भी दलित समाज से ही आते थे । तो ऐसा प्रोपेगैंडा क्यों चलाया जा रहा है जिसमें सनातन धर्म के विरुद्ध अनाप शनाप बका जा रहा है । उसे मलेरिया, डेंगू और न जाने क्या क्या कहा जा रहा है । भगवान राम को गाली क्यों दी जा रही है" ?
"तुम नहीं समझोगे अभी ! पहले दलित साहित्य पढ़ो तब तुम्हें कुछ समझ में आयेगा । जब तुम दलित उत्थान मंच का शिविर अटेंड करोगे तब तुम्हें सारी बातों के बारे में हमारे दलित चिंतकों द्वारा बताया जायेगा । तुम्हारी सारी शंकाओं का समाधान किया जायेगा । पर एक बात मान लो , दलित नेता बनने के लिए भगवान श्रीराम को गाली देना अनिवार्य है और सनातन को सबसे बड़ी बीमारी बताना जरूरी है । इनके बिना दलित नेता नहीं बन सकता है कोई।"
दीना राम को अब सारी बातें समझ में आने लगीं ।
शेष अगले अंक में
श्री हरि
क्रमशः
