नजरिया
नजरिया
अरे रिया! क्या पूरा दिन किताबों में उलझी रहती है, चल आज फिल्म देखने चलते हैं.... वैसे भी आज केवल एक ही लैक्चर लगना है| (यह कहते हुए दीपा ने उसके हाथ से किताब छीन ली)।
देख दीपा कहे देती हूँ, ये अच्छी बात नहीं है.. ला मेरी किताब वापिस कर (रिया ने डाँटने के लहजे में कहा)
आई बड़ी पढाकू... चल बता क्या कर लेगी ज्यादा पढ लिख कर ? करनी तो बस शादी ही है न ! कौन सा तुझे कुछ किसी को कमाकर खिलाना है,आखिर सम्भालना तो घर ही है ना। (दीपा ने समझाने के लहजे में कहा)
ये तू कह रही है दीपा ! क्या हो गया है तेरी सोच को... वैसे तो खुद को बड़ी मॉडरन समझती है, क्या यही है तेरी आधुनिकता ! क्या केवल आधुनिक कपड़े भर पहन लेने से ही कोई आधुनिक लगता है (रिया ने अचम्भित होते हुए कहा) आज के इस महंगाई के दौर में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका के बारे में सोचना पड़ता है। इसके अलावा स्वाभिमान नाम की भी कोई चीज होती है। किसी के समक्ष अपने खर्चे के लिए हाथ तो नहीं फैलाना पड़ता।
देख रिया,अपना भाषण तू अपने पास ही रख। तुझे कमाकर खाना है तो खा... मैं तो किसी अमीर लड़के से शादी कर लूंगी, फिर पति जाने और उसका बटुआ। मैं तो सारी उम्र बैठ कर खाऊंगी। (यह सब सोचते -सोचते वह न जाने किस दुनिया में खो गई)
दीपा मेरी किताब वापिस कर... आवाज सुनते जी दीपा का सपना मानो एक झटके में टूट गया। ले पकड़ अपनी किताब ,तुझे नहीं जाना तो मत जा....मैं किसी और के साथ चली जाऊंगी। यह कहते हुए उसने किताब वहीं पटकी और भिनभिनाते हुए चली गई।
माँ, कब तक फोन का रिसीवर पकड़े रहोगी (रिया की दस साल की बेटी ने उसे चेताते हुए कहा) क्या हुआ माँ,
क्या सोच रही हो ? कुछ नहीं, तुम जाकर पढो़... (उसने बेटी को टालते हुए कहा) दीपा के पति नहीं रहे, अब क्या करेगी दीपा ! ससुराल वालों से भी उसकी खास बनती नहीं। परिवार के नाम पर केवल अब बेटी ही है। वैसे तो ससुराल पक्ष अमीर है पर अब वो भी क्यों मदद करेंगे ?
जब स्वयं दीपा ही उनके साथ मिलकर नहीं चली। (रिया सोच में पड़ गई)
कितना समझाया था उसने कि दीपा पढ़ाई बीच में मत छोड़, अपने माता -पिता को समझा कि इतनी जल्दी शादी न करें... (जब अच्छा लड़का मिल रहा हो तो ऐसे में
कौन किसकी बात सुनता है) ? अब जमीन के भरोसे कोई कब तक रह सकता है ? कुछ न कुछ तो उसे सोचना ही पड़ेगा, पति का बटुआ भी अब भला कितने दिनों तक साथ देगा।
