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डॉ0 साधना सचान

Classics

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डॉ0 साधना सचान

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नेह के दीप

नेह के दीप

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सीमा घर का काम निपटा कर अभी शाम की चाय पी रही थी। त्योहार में काम कुछ ज्यादा हो जाता है,तभी बेटे का फोन आ गया उसने कहा माँ इस बार दीवाली पर आना नहीं हो पाएगा दो दिन ही छुट्टी है और उसके बाद पेपर शुरू हो जाएँगे, अब दिसम्बर में आऊँगा टर्म एग्जाम के बाद एक महीने छुट्टी मिलेगी तब आपके पास रहूँगा। बड़ा बेटा कम्पनी की तरफ से सिंगापुर गया है छह महीने के लिए ,सीमा सोच रही थी बच्चों के बिना त्योहार भी त्योहार नहीं लगते हैं।

दीवाली के दिन सीमा सुबह से ही तैयारी कर रही थी पर मन उदास था।

शाम को पूजा पाठ करके उसने दीपक जलाए अभी दरवाजे पर दीपक रख ही रही थी कि पाँच छह बच्चे पास आकर बोले आंटी दीवाली का प्रसाद दो न। सीमा ने देखा ये वही बच्चे थे जो अक्सर कूड़ा बीनते दिख जाते थे। आज साफ कपड़े पहन कर सबसे प्रसाद माँग रहे थे। सीमा बोली तुम लोग रुको मैं अभी आती हूँ। वह अंदर गई और मिठाइयाँ, लइया, खिलौने और फुलझड़ी ले कर आई। सारे बच्चों को मिठाई खिलाई तथा उनके साथ हँसी खुशी से फुलझड़ियाँ जलाईं। बच्चे बहुत खुश थे। उनकी खुशी देखकर सीमा का मन बहुत प्रफुल्लित था। बच्चों ने सीमा के पैर छू कर आशीर्वाद लिया और प्रसाद लेकर अपने घर चले गए। सीमा के दरवाजे पर दीप जगमगा रहे थे।


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