मम्मी ....मेरा हाथ क्यों छोड़ा?
मम्मी ....मेरा हाथ क्यों छोड़ा?
मेरे घर मे एक तहखाना भी है ये आज ही पता चला मुझे । मेरा परिवार कोई दो सप्ताह पहले ही इस घर में शिफ्ट हुआ है । शायद हमारा जीवन किराये के मकान में ही बीत जाता , शायद कभी हमें अपना घर नसीब न होता, पर एक दुखद घटना ने यह ख्वाब पूरा कर दिया कि हमारा भी एक छोटा सा घर हो ।
यह दो कमरों , किचन , वॉशरूम वाला छोटा सा घर हमारे लिए उपयुक्त है । परिवार में हम पति पत्नी व दो बेटियों के लिए इतनी जगह काफी है। भीतर के कमरे में सफाई करते समय पिछले हफ्ते मैने देखा कि कालीन के नीचे फर्श पर एक पत्थर पर कुंडा लगा था। यह घर कुछ पुरीने फर्नीचर के साथ हमें गिफ्ट में मिला था। हमे इस घर के विषय मे अधिक जानकारी न थी । घर की फर्श वर्गाकार पत्थरों से ही बनी थी कारण मुझे अब पता चला।
कुंडे की सहायता से पत्थर को उठाया तो वहां एक तहखाना दिखा । सीढियों से नीचे जाने पर पाया कि यह पूरा अपार्टमेंट था । जिसमें ऊपर के समान दो कमरे किचन व वॉशरूम थे । शायद आसपास की सड़क व जमीन ऊँची हो जाने के कारण पुराने परिवार ने नीचे की मंजिल छोड़ कर ऊपर रहना शुरू कर दिया था । यदि वो घर को सड़क के लेवल पर लाने के लिए मिट्टी भरवाते तो उन्हें ज्यादा पैसा लगाना पड़ता अतः उन्होंने नीचे की मंजिल को तहखाना बना दिया और ऊपर की मंजिल पर बस गए ।
बच्चे स्कूल गये थे और मेरे पति अपनी दुकान पर गये थे । मैं टार्च लेकर तहखाने के भीतर उतर गई और पूरे तहखाने का जायजा लिया । तभी एक कोने मे मुझे दो चमकती आँखे दिखीं , पहले तो मैं डर गई , पर फिर सोचा शायद किसी बिल्ली ने यहाँ तक पहुंचने का रास्ता खोज लिया है । टार्च लेकर मैं उसे ढूँढने लगी पर वह हाथ नहीं आई तो मैं वापस ऊपर जाने लगी । अचानक पीछे से एक आवाज आई......................
......मम्मी ...........
एक फुसफुसाहट जैसी आवाज सुनाई दी।
“मेरा हाथ क्यों छोड़ा?”
मेरे हाथ पाँव काँपनेलगे पीछे मुड़ कर देखने की मुझमें हिम्मत नहीं थी । बाहर आकर वह तहखाना बंद कर दिया । और उस कमरे को भी जिसमे वह तहखाना था ।
मेरी तीन बेटियाँ थीं सबसे बड़ी आभा , अभी बारह वर्ष की है । उससे छोटी विभा ,आठ वर्ष की है। और सबसे छोटी प्रभा , इस माह छः वर्ष की हो जाती यदि छः माह पूर्व उसका एक्सीडेंट न हो गया होता ।
बच्चे कुछ देर में स्कूल से लौट आए । विभा ने खाना भी नहीं खाया और जाकर सो गई मैंने परवाह नहीं की, मैं कहीं और ही खोई थी । आभा को खाना परोसा और स्वयं सिलाई करने बैठ गई । शाम को विनय लौटे तो आभा ने विनय को विभा की नाराजगी का कारण बताया।
आभा - “पापा हमारे स्कूल मे एक बिल्ली ने पाँच बच्चे दिये । (मेरी बेटियाँ प्रयागराज के सरकारी स्कूलआर्य कन्या इण्टर कॉलेज में पढ़ती हैं । जहाँ एक बिल्ली के बच्चे देने के लिए , काफी जगह , व गुप्त स्थान हैं । ) हम उन्हें कभी -कभी खिलाने जाते थे। आज उस बिल्ली ने अपने एक बीमार बच्चे को ले जाकर सड़क के कुत्तों के सामने छोड़ दिया व भाग गई ।“
इतना सुनते ही विभा जोर से विनय के गले लग गई। और उनके कंधे पर सिर छुपा लिया ।
आभा ने आगे कहा - “जिन बच्चों ने यह सब देखा, उन्होंने बाकी बच्चों को विस्तार पूर्वक बताया कि , किस तरह कुत्ते उस बीमार बिल्ली के बच्चे को नोच नोच कर खा गए । बस पापा, ये विभा सुबह से इसी बात पर रो रही है। इसकी मैम ने मुझे बुलाया कि मैं इसे चुप कराऊँ पर यह पूरा दिन रोती रही। अरे ....वह एक बिल्ली का बच्चा ही तो था। “
विनय ने विभा को सहलाया । और सांत्वना दी।
विभा ने अपने पापा के कंधे से अपना सिर उठाया और मेरी तरफ देखा । उससे नजरें मिलीं तो मैनें नजर चुरा ली। मैने खुद से कहा विभा सिर्फ आठ वर्ष की है, उसे कुछ समझ में नहीं आया होगा । बच्चों को भीतर के कमरे में सुलाकर मैं पति के पास आई । अभी बिस्तर पर बैठी भी न थी कि विनय ने कहा ।
“जानवरों के दिल में अपने बच्चों का मोह नहीं होता वो हमारी तरह भावुक नहीं होते । जरा सोचो तो एक माँ अपने बच्चों को भूखे कुत्तों के सामने डाल दे ताकि वो उसे नोच नोच कर खा जाए। “
मैंने गुस्से से विनय को देखा- “तो क्या करना चाहिए उस माँ को, जो जानती है कि उसका बच्चा कुछ दिन का मेहमान है । और पल पल उसे तड़पते हुए वह देख नहीं सकती । प्रभा जब दर्द से बिलबिलाकर रोती थी, तब मेरे दिल पर क्या बीतती थी, तुम्हें पता है ? वो मुझे आवाज लगाती थी, मेरा हाथ पकड़कर भी उसकी तकलीफ नहीं जाती थी । तुम तो सारा समय ऑफिस में बिताते थे, रात में थक कर कुम्भकर्ण की तरह सो जाते थे । तुम्हें क्या पता कि मुझे कैसा लगता था , जब प्रभा तकलीफ से आराम पाने के लिए मेरी ओर आशा भरी नजरों से देखती थी, और मैं उसके लिए कुछ नहीं कर सकती थी ? हमारे पास पैसे नहीं थे कि हम उसका ऑपरेशन करा सकें और करा भी देते तो वह जीवित बचेगी इसकी कोई गारंटी डॉक्टर नही ले रहे थे। क्या मौत उस तकलीफ का बेहतर इलाज नहीं था । “
विनय-“संध्या तुम कहाँ की बात कहाँ ले जा रही हो । भला इसका हमारी प्रभा से क्या लेना देना ? ” वो मुँह मोड़ कर सो गए ।
हमारी तीसरी बेटी के सिर में ट्यूमर था । उसके इलाज में बहुत पैसा लगता था हमारी आर्थिक स्थिति पहले ही खराब थी । उसकी बीमारी ने तो हमारी हालत और भी खराब कर दी। एक तो महंगी दवाइयों का खर्च ऊपर से उसकी तकलीफ जो देखी न जाती थी । जब उसे सिर में दर्द उठता तो वह पागलोंकी तरह चिल्लाती । दवा भी कुछ खास असर नहीं करती थी फिर वह उल्टी करती और उसे राहत मिल जाती , पर बस कुछ देर के लिए। दिन पर दिन प्रभा की तकलीफ बढ़ती गई और हमारे खर्च भी।
एक दिन मैं विभा और प्रभा को लेकर बाहर एक पार्क में घुमाने गई सड़क पार करते समय गाड़ियों की काफी आवाजाही थी । मैंने प्रभा को गोद से उतारा तो वह मेरा हाथ छुड़ाकर सड़क पार करने तेजी से भागी, जैसा वह अक्सर करती थी। घर से बाहर ले जाने पर प्रभा का विशेष ध्यान रखना पड़ता था , वह बहुत चंचल थी । हमेशा मै उसका हाथ कस के पकड़े रहती थी पर उस दिन मैंने उसका हाथ छोड़ दिया।
विभा ने देखा तो वह उसे पकडने उसके पीछे भागने को हुई । पर मैनें उसका हाथ कस कर पकड़ लिया और उसे पीछे खींच लिया । प्रभा एक बड़ी गाड़ी की चपेट में आ गई । उसके मौत के बाद केस बंद करने के लिए कार वाले ने हमें अच्छा मुआवजा दिया ।
मुआवजे में हमे मिले यह घर व कुछ पैसे ताकि मेरे पति (जो एक प्राइवेट कम्पनी में 10,000/- तनख्वाह पर गार्ड थे) कोई व्यवसाय कर सकें । हमने भी सोचा प्रभा तो अब लौटेगी नहीं कम से कम इस प्रकार उसे उसकी तकलीफ से छुटकारा मिला और हमारे संकट भी दूर हुए। आज उस बिल्ली ने भी शायद वही किया जो छः माह पूर्व मैने किया था। कहते हैं मां जो भी करती है अपने बच्चो को भलाई के लिए ही करती है बस यही सोचकर मन को समझा लेती हूं और खुद से तर्क कर लेती हूं ।
मुआवजे से मिले पैसों से हमने एक टेलर की शॉप खोली है। मैं भी घर पर ही सिलाई करके इनकी सहायता करती हूँ। आज भी प्रभा का खून से सना चेहरा याद आता है तो रूह काँप जाती है ।
मरने से पहले उसने मुझे आँख खोलकर देखा था वह कुछ नहीं बोली पर मैनें सुना कुछ सुना था ।
“मम्मी ....मेरा हाथ क्यों छोड़ा?”
