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Nisha Singh

Inspirational


4.1  

Nisha Singh

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मिशन कोरोना

मिशन कोरोना

7 mins 990 7 mins 990

मिशन ज़ोरों शोरों पर चल रहा था हमारा। सुबह और शाम अपने मिशन पर निकलते थे। लॉकडाउन आगे बढ़ने की पूरी पूरी सम्भावना थी और देश के हालातों में कुछ खास सुधार भी नहीं था। पर प्रयासों में कोई कमीं नहीं छोड़ी जा रही थी ना शासन की तरफ से ना प्रशासन की तरफ से।

अमित नाम है मेरा। उम्र 30 साल है और पेशे से सोफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। आज तक की ज़िंदगी में ऐसे हालात कभी नहीं देखे मैंने। ऐसा लगता है जैसे ये वो जगह है ही नहीं जहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के 30 साल गुज़ारे हैं। बदल गया है सब कुछ। सारी दुनियाँ पर मौत के बादल छाये हैं। सारी दुनियाँ महामारी से जूझ रही है जिससे मेरा देश भी अछूता नहीं है। सारी दुनियाँ ‘कोरोना’ की चपेट में है, मेरा देश भी, मेरा शहर भी।

अभी अभी अपने मिशन से लौट कर आया था। मिशन क्या है जी एक ग्रुप बना लिया है 6-7 लड़कों का (व्हाट्सएप पर नहीं) और नाम दे दिया है ‘मिशन कोरोना’। जितना कर सकते हैं लोगों की मदद करने की कोशिश करते हैं। आज बहुत थक गया था, काफ़ी देर से छत पर खड़े होकर गली में पसरे सन्नाटे को देख सोच रहा था कि जिस मोहल्ले में हर शाम बच्चों के खेलने की आवाज़ें आया करती थीं, जिस मोहल्ले में हर शाम औरतें साथ बैठ कर ठिठोली किया करती थीं उसी मोहल्ले में एक भी मुस्कुराता चेहरा दिखाई नहीं दे रहा। चारों तरफ़ बस मायूसी फैली थी।

वक़्त के साथ सन्नाटा भी गहराता जा रहा था। रात होने को थी। नीले रंग के आसमान ने स्याह रंग भी ओढ़ना शुरू कर दिया था।

ठीक ठीक याद करने की कोशिश करूँ तो जनवरी फरवरी तक तो सब ठीक सा ही था। सुना भर था कि चीन में कोई वायरस आ गया है। लोग भारी संख्या में संक्रमित हो गये हैं। कई मौतें भी हो चुकीं है। पर क्या पता था कि कई किलो मीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलता हुआ ये बवंडर सारी दुनियाँ पे छा जायेगा।

कभी कभी तो बड़ा गुस्सा आता है इन चीनियों पे। अरे खाने वाली चीज़ें खाओ ना। कितना कुछ बनाया है ऊपरवाले ने। पर नहीं, इन्हें तो सांप खाने हैं। अचार समझ के झिंगुर खाने हैं।

मैं तो कहता हूँ खाओ... जो जी में आये खाओ पर दूसरों के लिये मुसीबत तो मत बनो।

“अरे अमित...”

लो जी... मुसीबत का नाम लेते ही मुसीबत आती तो आपने कई बार देखी होगी पर यहाँ तो मुसीबत सोचने भर से मुसीबत आ रही है। आ गया मुसीबत का भंड़ार मेरा पड़ोसी छत पे।

“हाँ भाई...”

“और भाई टाइम पास कैसे हो रहा है? मैं तो घर में पड़े पड़े बोर हो जाता हूँ।”

और सुन लो... यही एक अकेला बोर हो रहा है बाकियों की ज़िंदगी तो बड़ी मस्ती में कट रही है। अरे भई हम भी उसी लॉकडाउन में हैं जिसमें तू है।

मैंने मुस्कुरा के उसे टालने की कोशिश की। पर वो मुसीबत थी ऐसे ही नहीं टलने वाली थी।

“अभी तो 11 दिन और बचे हैं लॉकडाउन ख़त्म होने में। एक एक दिन बोझ सा लगता है।”

और मुझे तू बोझ सा लगता है... ऐसा मैं कहना चाहता था पर कहा नहीं।

“हाँ सो तो है।” कहते हुए मैं अपना फोन उठा कर जाने लगा।

“अरे भाई कहाँ चला?”

हे भगवान इसे कुछ अक्ल दे। मैं लगातार इग्नोर कर रहा हूँ और इसे समझ नहीं आ रहा।

“ममता जी को बताने कि छत पे बहनोई है वो ऊपर ना आये‌...”

“तुझे मज़ाक सूझ रहा है... हे भगवान इसे कुछ अक्ल दे, पता भी है कुछ वो डॉक्टर साहब नहीं रहे।”

“वो डॉक्टर शास्त्री?”

“हाँ वही...”

ये हमारे शहर के लिये बहुत बड़ी चोट थी। एक बहुत काबिल डॉक्टर कोरोना की भेंट चढ़ गया था। उसकी बात सुन कर मैं कुछ उदास हो गया।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं... कब नहीं रहे डॉक्टर साब?”

“शायद 4 दिन पहले।।”

आज पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। 2 चेहरे बार बार आँखों के सामने आ रहे थे। एक शास्त्री जी का... उनकी निष्ठा और कर्तव्यपरायणता भूलने वाली चीज़ है भी नहीं और दूसरा उस झाँसी की रानी का जिससे मैं आज शाम मिला।

आज शाम भी मैं अपने मिशन पर था। किसी को राशन पहुँचाने जा रहा था कि गली के नुक्कड़ पर बनी छोटी सी दुकान, जो आधी बंद और आधी चालू थी, पर खड़ी एक लड़की दुकानदार से बहस किये जा रही थी।

“ये कौन सा तरीका है तुम्हारा? ऐसे वक़्त में भी तुम्हें पैसे कमाने की पड़ी है। 100 रुपये के 150 वसूल रहे हो... वाह जी वाह... कहाँ का हिसाब है ये... थोड़ी सी भी शर्म है कि नहीं, ज़रा सा मौका मिला नहीं कि काला बाज़ारी शुरु कर दी।”

उसकी बहस सुनकर मैं उसकी तरफ़ बढ़ गया।

“क्या हुआ जी?”

मेरे पूछते ही वो मेरी तरफ़ मुड़ी। मास्क से ढंके हुए आधे चेहरे पर सिर्फ़ दो बला की खूबसूरत आँखें ही नज़र आ रही थी। इससे पहले मैं और कुछ नोटिस कर पाता उसने मुझे भी ये कह कर झाड़ दिया कि “लो अब ये और आ गये समाज सेवी...आप अपना काम करो।”

मैंने वहाँ से चुपचाप निकल लेने में ही भलाई समझी।

खैर, हमारे मिशन ने भी अब रफ़्तार पकड़ ली थी। कई और लोग जुड़ गये थे। मदद के लिये भी कई हाथ आगे आ रहे थे। इससे भी अच्छी बात ये थी कि शहर की महिलायें भी बढ़ चढ़ कर अपनी उपस्थिती दर्ज करा रहीं थी। हमने फोन सेवा भी शुरू कर दी थी। मदद करने वालों, मदद चाहने वालों से लेकर साथ चलने वालों तक को फोन की मदद से जोड़ रखा था।

एक दिन अचानक सुबह सुबह मुझे किसी का फोन आया। कोई लड़की थी।

“जी मेरा नाम रागिनी है, आप अमित जी बोल रहे है?” उसने पूछा।

“जी बोल रहा हूँ कहिये...”

“जी मैं भी आपका मिशन कोरोना ग्रुप जोइन करना चाहती हूँ। क्या मैं आज से आ सकती हूँ?”

 रागिनी ने तो आकर जैसे मिशन को पंख ही लगा दिये और शायद मुझे भी। वक़्त से पहले पहुँच कर लोगों की मदद करने लगा था। अब तो थकान भी नहीं होती थी। बल्कि इंतज़ार रहता था सुबह से शाम होने का और शाम से सुबह। वैसे रागिनी वही झाँसी की रानी थी जो मुझे उस दिन लड़ते हुए मिली थी। पर मैंने कभी इस बात का ज़िक्र नहीं किया। ज़रूरी नहीं समझा...

वक़्त के साथ मैं खुद को रागिनी के काफ़ी करीब महसूस करने लगा था। उसकी बातें, उसकी लगन मुझे बहुत आकर्षित करती थी। बहुत अच्छे दिल की लड़की थी, तभी तो जब मैंने उसे शास्त्री जी के बारे में बताया तो उसकी आँखों में आँसू आ गये थे।

लॉकडाउन आगे बढ़ चुका था। इसी बीच रागिनी ने शाम को आना बंद कर दिया। वजह पूछने पर ठीक से बताया भी नहीं। फिर मैंने बात को ज़्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा। किसी के घर राशन का सामान पहुँचाने जाना था सो हम दोनों उसी काम में उलझ गये।

“चलो आज का काम पूरा हुआ।” मैंने मुस्कुराते हुए कहा पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। चेहरे पर अजीब सी शंका की रेखायें उभर आईं।

“क्या हुआ?” मैंने फ़िर पूछा।

“किसी के रोने की आवाज़ आई तुम्हें?”

“हाँ आ तो रही है,पता नहीं कौन रो रहा है?”

“शायद कोई बच्चा है।” कहते हुए वो उसी दिशा में चली गई जहाँ से वो आवाज़ आ रही थी।

“चलो जल्दी करो बच्ची के पेट मे तेज़ दर्द है। घरवाले कोरोना के डर से बता नहीं रहे थे। जैसे तैसे समझा के लाई हूँ।” कहते हुए करीब 8 साल की बच्ची को ले कर मेरी बाइक पर बैठ गई। हमारे पीछे एक बाइक और चलने लगी शायद उस बच्ची का पिता था।

“पर जाना कहाँ है, हॉस्पिटल?”

“नहीं, जहाँ मैं बता रही हूँ वहाँ।

“रुको रुको यहीं रुको...”

पर ये तो डॉक्टर शास्त्री का क्लीनिक था। वे तो अब रहे नहीं अब कौन चला रहा है ये क्लीनिक। शायद उनकी पत्नी... पर वो तो डॉक्टर थी‌ नहीं। शायद उनका बेटा होगा पर वो तो विदेश में था। अपने सवालों के साथ मैं बाहर टहल ही रहा था कि मेरी नज़र क्लीनिक के नये बोर्ड पर गई। मेरे सारे सवालों का एक ही जवाब लिखा था ‘डॉ. रागिनी शास्त्री’। 


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