CRP amit sagar

Tragedy


4.8  

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मेला कपड़ा

मेला कपड़ा

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जीवन में सफाई का बहुत महत्व है, आज के इस दौर में हर ईन्सान साफ सफाई पर विशेष ध्यान देता है खासकार त्यौहार आने पर सभी अपने -अपने घरों की रंगाई पुताई कराते है, जिन्हें समय नहीं मिलता या जो पक्का पैन्ट करवाते है वो झाड़ू पोंचे से घर को चमका देते है। अमीर लोग भी ऐसा ही करते है। एक प्रतिष्ठित कॉलोनी में गुप्ताजी को पैन्ट करवाने का अवसर नहीं मिला जबकि दिवाली नजदीक आ रही थी तो उन्होंने एक दिन पहले अपनी मिसेज को घर की सफाई करने का अॉर्डर दे दिया। गुप्तानी कामवाली बाई को दैर तक रुकने को कहती है ताकि वो घर में अच्छे से सफाई कर सके बाई अपना उपर का काम निपटा कर सफाई के लिए मालकिन से कपड़ा माँगती है। मालकिन अपनी पुरानी साड़ियो मे से एक साड़ी निकालती है और उसमें से आधी साड़ी फाड़कर बाई को दे देती है।

बाई उसी कपड़े से पुरे घर को झाड़ती है फिर पानी में भिगोकर पुरे घर को पोँछा लगाती है। इतनी सफाई करने पर घर तो चमक उठा पर कपड़ा अत्याधिक मेला हो गया। बाई कपडे़ को धोकर तार पर टाँग देती है और घर चली जाती है। चुकि आज घर में बहुत साफ सफाई हुई थी इसलिये सभी घर वाले थक कर सो जाते है। अचानक रात में सभी घर वालो को घर मे बदवू आने लगती है घर सभी व्यक्ति उस बदवू वाली बस्तू की खौज मे लग जाते हैं और उसी कपड़े के पास पहुँच जाते हैं। कपड़ा तार पर टँगा देख गुप्तानी लेक्चर झाड़ने लगती हैं-------इस मन्जू से मैंने कितनी बार कहा है सफाई करने के बाद मेले कपड़े को बाहर फैंक दिया कर कल खबर लेती हूँ मैं इसकी आने दो कल , गुप्तानी अपने बेटे से जा बेटा इसे बाहर फैँक आ।

मै इस सड़े हुए कपड़े को हाथ नहीे लगाऊँगा ये कहता हुआ लड़का अन्दर चला जाता है।

अरे लक्ष्मी तुम खुद क्यों नहीं बाहर फैँक आती इस मेले कपड़े को गुप्ता जी गुप्तानी से कहते हैं 

मैं क्यों फैंक आऊ क्या घर का सारा काम मेरे जिम्मे है। 

अरे ये तुम्हारी साड़ी का तुकड़ा ही तो है कल तक तो तुम इसे बड़े चाव से पहनती थीं गुप्ता जी

जब पहनती थी तब पहनती थी नकनकाकर गुप्तानी अन्दर चली जाती है

हारकर गुप्ताजी को ही उस मेले कपड़े को बाहर फैंकना पड़ता है मेला कपड़ा उन सभी को कोसता है कि पुरे दिन मुझे रगड़ने के बाद फैंक दिया मुझ पर जरा भी दया ना दिखाई जालिमों ने पर इसे ये नहीं मालूम कि बद्नसिबी उसका आगे इन्तेजार कर रही है। 

मेला कपड़ा उड़ता हुआ एक सायर साब के मौड़े पर कोने मे जाकर रुकता है। जिन्हे बदवू के बारे में बहुत कम ज्ञान है सायर साब को पान खाने का बहुत शौक है और थूकने लिए हमेशा बाहर मौड़े पर ही जाते हैं। सायर साब ने रात भर अपनी सायरी और कपडे़ पर थुकाई जारी रखी। सुबहा तक कपड़े का रंग पुरी तरह लाल पड़ चुका था पान का ढैर वो अलग। मेला कपड़ा बार बार सायर साब को बिन मौसम की लाल बारिस करने के लियें गाली देता रहा और अन्त में हवा से उड़कर बीच मौडे़ पर चिपक जाता है। सुबाह को सायर साब बीच मौड़े पर कपड़ा देखते हैं तो आगबबुला हो जाते हैं और कपड़ा फैंकने वाले को भला बुरा कहने लगते हैं 

गुप्ता जी को बुरा लगता है तो वो कहते हैं कपड़ा चाहेँ किसी ने भी फैका हो पर इसपर थूका तो आपने ही है 

इसका जवाब सायर साब सायरी में देते है------

कौन कम्बख्त है जिसने ये कपड़ा फैका है 

क्या किसी ने हमें कपड़े पर थूकते देखा है

काफी विवाद के बाद सायर साब ही उस मेले कपडे़ को डन्डे की सहायता से उछालते है जो कि बीच सड़ज पर जाकर गिरता है और कपड़ा फैंकने वाले को कोेसते हुए चले जाते है

कपडां इस समय बीच सड़क पर पडा़ है सभी पैदल राहगीर उस मेले कपडें को देखकर मुँह सिकौड़ते है और उसी पे थूक कर चले जाते हैं। 9 बजे तक उस पर ढैरो थूक इकट्ठा हो जाता है 10 बजे के बाद साइकिल सवारों ने उसका सारा थूक निचौड़ दिया। कपड़ा अपने आप को अब हल्का महशूस करता है। 12 बजे तक कपड़ा सूख सा गया और सायर साब का दिया हुआ लाल रंग अब हल्का पड़ चुका है। कपड़ा साईकिल सवारों के स्टैण्ड में हिलगता हुआ चौराहे पर पहुँच चुका है .   2 बजे तक बेचारा कपड़ा यूहीँ राहगीरों के चेहरे निहारता रहा और अपने आप को दुसरो से क्षीण मानता हुआ भगवान से अपने लियें मौत माँगता है पर उसके नसीब मे अभी मौत नहीं है। 

3 बजे आसमान मे बादल छा जातें हैं और हल्की बारीस होने लगती है तभी एक पागल भागता हुआ आता है वो चौराहे पर से कपड़ा उठाता है और उसे सिर पर रखकर एक कोने में बैठ जाता है। उस पागल को वो छोटा सा कपड़ा भरापूरा घर प्रातीत लग रहा है। जिसमें बैठकर वो अपने कभी ना पूरे होने वाले आधे अधुरे सपने देख रहा है खैर ख्वाब देखने का हक और शौक सभी को है पूरे बहुत कम लोगों के होते है। 4 बजे वारिस रुक जाती है वारिस के रुकते ही वो पागल कोने से निकलकर फिर से शहन्शाह बन जाता है और उस कपडे़ को वारिस के पानी में फैंक देता है कपड़ा गीला हो जाता है। कुछ दैर बाद सड़क का पानी सूख जाता है परन्तु वो मेला कपड़ा अभी भी गीला है। एक मोटर साइकिल बहुत तेजी से अाती है और जैंसे ही बाईक का पँहिया उस कपड़े पर पड़ता है बाईक का सन्तुलन बिगड़ जाता है और वो फिसल जाती है। बाईक सवार को काफी चौट लगती है आस पास की भीड़ कपडे़ को दौषी ठहराती है। लोगो से अपने लियें कटु वचन सुनकर कपड़ा भागवान से मौत की गुहार लगाता है। कुछ दैर बाद सारी भीड़ अपने अपने काम में मशगुल हो जाती है अन्त में कपड़ा अकेला रह जाता है। तभी एक बुजुर्ग आदमी अपने पोते के साथ वहाँ से गुजरता है। बुजुर्ग देखता हे कि सभी लोग उस कपडे़ पर पाँव रखकर गुजर रहैं हैं और कुछ तो गिरने से भी बच रहे हैं पर कोई उसे रास्ते से नहीं हटा रहा। वो तुरन्त अपने पोते से कपडे़ को कुड़ेदान में फैकने को कहता है और वो एेसा ही करता है। कपडे़ के मुँह से उस बच्चे के लियें लाखों दुआयें निकलती है। कुड़ेदान मे कपड़े को कुछ सुकून है पर शाम 5 बजे के बाद उसके ऊपर कुड़े की बरसात होने लगती है

पर ये बरसात मात्र एक घंटे की थी। दिन भर इस ठोकर मारू संसार से ठोकर खा खाकर वो थक सा गया 7 बजे तक उसकी आँख लग जाती है औेर वो गहरी नींद सौ जाता है हर तरफ शान्ती है कभी कभार कुत्ते भोँकने की अवाज अाती है जिसे वो अनसुना कर देता है। यूहीं रात के तीन बज जाते हैं तभी उसे हल्का शौर सुनाई देता है आँख खोलने पर वो देखता हे कोई आदमी उसके उपर कुछ फैंककर गया है। शौर शराबा खत्म हो जाता है पर कपड़े की बैचेनी बढ़ जाती है क्योंकि उसके शरीर में कुछ चुभ रहा है। खैर रात यूहीं कट जाती है।

लेकिन शुबहा फिर उसके ऊपर कुडे़ की बरसात होती है। कुडे़दान में अत्याधिक कूडा़ भर चुका है। अब तो कपडे़ का दम सा घुटने लगता है। कुछ दैर बाद कुडे़ की गाडी़ आती है और सारा कूडा़ लेकर शहर के बाहर चली जाती है। कूडे़ को बीलों में फैक दिया जाता है। महिनों तक कपड़ा कुडे़ के ढैर में पडा़ रहा और उसकी चुभन बढ़ती गयी। पर एक दिन वो हुआ जो कपडे़ ने सपने में भी नहीं सोचा होगा एक बारहा साल का बच्चा उस कपडे़ को उठाकर घर ले जाता है। जब उसने वो कपड़ा अपने घर वालो को दिखाया तो सभी की आँखे चौंधा गयी। दरअसल उस कपडे़ मे सोने के कुछ गहने थे ये वही गहने है जो उस रात कोई चोर कुडे़दान में फैककर गया था और जो कपड़ा लेकर आया है वो पिन्नी बीनने वाला है। सोने के गहने पाकर सभी लोग उस मेले कपडे़ का गुनगान करते है।

कपडे़ के दिल को भी थोडी़ तसल्ली मिलती है कि उसका जीवन किसी गरीब के काम आया। उस परिवार के लोग कपडे़ को धोकर खिड़की पे टाँग देते है। वो मेला कपड़ा अब उस पिन्नी बीनने वाले के घर की शोभा बडा़ रहा है। मेले कपडे़ का सारा जीवन यूँही सुख दुख के भवर मे फँसते हुए बीत जाता है और अन्त में जब प्राण जाने को होते हैं तो घर वाले उस मेले कपडे़ को उतारकर बाहर फैंक देते है। कपड़ा पूरा गल चुका है औेर काफी बूढा़ भी हो गया् है। बेचारा अब मीट्टी पर पडा़ है तभी ईन्सान की ठोकर से उडी़ धूल उस पर गिरती है कुछ दैर बाद घर का गन्दा पानी आकर कपडे़ पर गिरता है। फिर एक पल के लिए हवा भी रुक जाती है। ये चारो एक दुसरे से दुनिया की अच्छाई और बुराई के बारे चर्चा करते है दुनिया इतनी बुरी क्यों है। तब कपड़ा अपनी कहानी सुनाकर जवाब देता है

संसार बुरा नहीं है बुरा है इन्सान के अन्दर छिपा हुआ अहंकार और लालच। मुझे अपने उपर बहुत घमंड था क्योकि मेरे दाम साधारण साडि़यों से ऊचें थे मै सस्ती साडिंयो मे रहना पसंद नहीं करती थी। गुप्ता की विवी ने मुझे खरीदा और चार साल तक वो हर शादी पार्टी मे मुझे ही पहनकर जाती थी क्योकि मै उसकी शौभा बडा़ताी थी उम्र ढलने पर उसने मेरे दो तूकडे़ कर दिये और पूरे दिन नरख मे रखा। रात को कड़ाके ठन्ड में मुझे बाहर फैंक दिया सायर ने मुझ पर थूक की बरसात की तो राहगिरों ने भी मेरा मजाक बनाया सवार राहगिरों ने मुझे तिल तिल कुचल तो पागल ने भी अपना काम निकालकर मुझे गन्दे पानी मे फैंक दिया ऊपर से ये बाईक वाले गाढी़ तेज खुद चलाते हैं और और चोट लगने पर दौषी मुझे ठहराया। और तो और इस पिन्नी बीनने वाले की किस्मत मेरे कारण ही बदली बूढा़ होने पर इसने भी मुझे बाहर फैक दिया। यूहीं सुख दुख की कहानी सुनते सुनाते धूल की मिट्टी उड़ जाती है पानी सूख जाता है और हवा भी अपने रास्ते चल देती है। अन्त में मेला कपड़ा पूरी तरह गल जाता है और कुछ दिनों बाद उसके चिथडें अलग अलग बिखर जाते है।


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