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sonu santosh bhatt

Drama Tragedy Inspirational


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sonu santosh bhatt

Drama Tragedy Inspirational


मैं शायर हूँ, पागल नहीं

मैं शायर हूँ, पागल नहीं

12 mins 238 12 mins 238

"एक अर्ज करूँगा, जरा गौर फरमाना की कहता जमाना मुझे

की कहता जमाना मुझे

तेरा वजूद कुछ नही, तू तो मिट्टी है रे

फिर अकड़ किस बात की है

मैंने कहा तू भी तो वक्त ही है रे जमाने

गुजर जाएगा दिन रात की तरह

और आएगा नया जमाना" कवि सागर ने सागर की तरह गहरे शब्दों को तोलते हुए कहा।

"वाह वाह वाह, बहुत खूब बहुत खूब" मंच संचालक की माइक से तीन चार लोगों की आवाज आई और साथ मे जनता पागलो की तरह ताली बजा रही थी।

"एक और…. एक और…."

सागर थोड़ा मुस्कराया और अपनी प्रसिद्धि और डिमांड्स पर थोड़ा इतराते हुए बोला- "अगर आप लोग इतना हठ कर रहे हो तो सुना देता हूँ।"

"उसकी किस्मत में मैं नही था

या वो मेरी किस्मत में नही थी।

कुछ तो था जो दोनो की तकदीर में

एक जैसा लिखा था।"

"वाह वाह, ये कमाल था, बेहद उम्दा"

सागर तारीफें बटोरते हुए बहुत खुशी महसूस कर रहा था। आज तो सभी आये हुए कलाकारों में उसने सबसे अच्छी अच्छी रचनाएं सुनाई थी, ये जनता की ताली और शोर से साबित हुआ, वरना मंच संचालक को तो शेर खत्म होते ही वाह वाह बोलने की आदत पड़ चुकी थी, इतनी आदत की एक बार

एक शायर मंच में आया और आकर अपने हाथ की डायरी की पन्ने उलट पलट करते हुए घबराते हुए बोला- " माफ कीजियेगा, मैं आप सबसे माफी मांगता हूं, मैं गलती है नई डायरी ले आया, पुरानी घर मे रह गयी"

"वाह वाह, बेमिसाल….मनमोहक……"

शायर घूरते हुए संचालक की तरफ देखने लगा तो वो अपने मोबाइल में ना जाने के कर रहा था।

शायर दोबारा बोला- "महेश बाबू…. ये कोई शायरी नही मेरी अपनी तकलीफ बतलाई थी।

मैं पुरानी डायरी भूलकर , भूल से ले आया नयी डायरी जो कल मेरी बीवी अपने लिए लायी थी"

"वाह वाह, बहुत सुंदर, अहा! "

उसकी बात सुनकर शायर ने जनता को थेँक्स कहा और मुंह बनाते हुए अपने शीट पर बैठ गया।

जनता जनार्जन ये सब देख हँस रही थी।

आज के दिन मशहूर शायर , कवि और देशभक्त सागर उपाध्याय जी को कवितावादन के लिए सबसे अच्छी कविता कहने के लिए माननीय मंत्री जी और शिक्षा विभाग के प्रमुख अधिकारी ने मिलकर साथ मे दो और व्यक्ति ने , इन चार पांच लोगों ने सम्मान के तौर पर एक ट्रॉफी दिया। और फिर संचालक महेश बाबू एक और लिफाफा लेकर अपनी खुशी जाहिर करते हुए सभी माननीय मेहमान गण और चीफ गेस्ट के साथ सागर को लिफाफा पकड़ाते हुए फोटोशूट कराने लगे। निसंदेह उस लिफाफे में पैसे होंगे सागर सोच रहा था लेकिन अभी लिफाफा उसकी उंगली को छू भी नही पाई थी क्योकि आठ लोगो ने पहले ही उसे पकड़ा था और अपनी गर्दन सब कैमरे की तरफ ताने हुए थे। जिसको लगता कि शायद वो अब भी नही दिख रहा है तो वो अपना गर्दन ऊंट की तरह उठा रहा था, तो कोई दूसरे के गर्दन को नीचे दबाते हुए अपना दिखा रहा था। अंततः उन्होंने लिफाफा सागर को पकड़ा ही दिया।

मंच में फिर से तालियों की गूंज थी और इस गूंज में सागर खुद को गर्वित महसूस कर रहा था।

सागर अब मंच गोष्ठी खत्म करके अपने घर की तरफ निकल पड़ा। उसने लिफाफा खोला भी नही, यही सोचा कि मंत्री लोगो ने दिये है , नोट नही है शायद , शायद कोई चेक होगा, बीस या पच्चीस जितने भी हजार का चेक होगा जाकर शालू के हाथ मे पकड़ा दूँगा, खुश हो जाएगी। वैसे भी अवार्ड भी तो मिला है साथ मे रिवॉर्ड भी। बहुत बोलती थी कि तुम फालतू के कामों में टाइम वेस्ट कर रहे हो, इससे अच्छा नौकरी करते कोई……

इंट्रोडक्शन

सागर एक मिडिल क्लास आदमी है। जिसकी शादी किसी शालिनी नाम की लड़की से चार साल पहले हो चुकी है। सागर के तीन भाई और है जो अलग अलग शहर में रहते है, किसी खास मौके पर सब एक साथ देखे जाते है। माता पिता सबसे बड़े बेटे के साथ रहते है जबकि सागर तीसरे नम्बर का लड़का है। सागर भी पहले नौकरी करता था लेकिन जब भी कही कवि गोष्ठी या कोई रंगमंच का आयोजन होता तो सागर नौकरी से छुट्टी लेने लगता। आसानी से मिल गयी तो ठीक नही तो नौकरी छोड़ देता। क्योकी उसका सपना था बड़ा कवि बनने का। आजकल वो बेरोजगार है लेकिन महीने में दो तीन गोष्ठियां अटेंड कर लेता है। शालू को शिकायत है कि जब कविता उन्हें भरपेट खाना नही दे सकती तो छोड़ क्यो नही देते ऐसी कविता को। लेकिन महाशय जिसके लिए नौकरी छोड़ दे वो भला उसी को कैसे छोड़े।

सागर आज घर खुशी के साथ गया। हालांकि शालू आज भी उदास थी उसके बार बार मना करने पर भी सागर महफ़िल का हिस्सा बनने चले गया था।

"आ गए गढ़े हुए खजाना लेकर, हाथ हिलाते हुए आ रहे हो, राशन ही ले आते कुछ" शालू ने आते ही ताना कसा।

बेरोजगारी सब कुछ सुनने को मजबूर कर देती है और इंसान की सहनशक्ति को भी मजबूत कर देती है। सागर को अब आदत हो चुकी थी ये सब सुनने की- "राशन लाने का अनुभव मुझे नही है प्रिये, मैं तो बस मेडल, पुरस्कार और नाम कमाकर ला सकता हूँ" सागर ने मजाकिया अंदाज में कहा, क्योकि वो आते ही झगड़ा नही करना चाहता था।

"आग लगे तुम्हारे इन मेडलों को, इतने तो मैंने स्कूल में खो-खो , कबड्डी खेलकर भी इकठ्ठे कर ही रखे थे, इन्ही से पेट भर जाता है तो कभी बटोर लाती हूँ मायके से" शालू बोली।

सागर ने बेतुकी सी हँसी हँसते हुए मामला ठंडा करने के लिए कहा- "हहहह, चलो बहुत हो गए हास्यपद, अब मैं थोड़ा विश्राम कर लूँ, तब तक तुम खाना परोसो मैं एक झपकी ले लेता हूँ यही सोफे में, कल रात भर सोया नही"

"क्या खाना…. मैं भी तो इंतजार ही कर रही थी कि तुम आओगे कुछ लेकर, सच मे कर्म फूटे थे जो घरवालो ने यहां शादी कर दी मेरी, क्या देखा तुममें ना जाने, तुम एक झपकी ले लो मैं भी जा रही सोने" शालु ने कहा और रोता हुआ मुंह बनाकर अंदर कमरे की तरफ चली गयी।

सागर सोफे से उठा और भागकर शालू के पीछे गया- "क्या सच में तुमने कुछ नही बनाया?"

शालिनी बिस्तर पर लेट गयी और कुछ नही बोली।

"अरे इस बार खाली ट्रॉफी नही है, मुख्यमंत्री जी ने इनाम भी दिया है। लेकिन तुम सुबह से कुछ तो पका लेती ना, हमेशा थोड़ी खाली हाथ आऊंगा मैं" सागर ने कहा और और जेब से लिफाफा निकाल कर शालू के हाथ मे जबर्दस्ती थमाने लगा, जबकि शालू नाराजगी जाहिर करते हुए पकड़ नही रही थी।

"कहाँ से पकाती कुछ, मेरे पास जो पैसे थे वो भी खत्म हो गए। राशन ही नही है घर मे, आटा नही है दालें नही है। एक किलो चावल पड़े है उन्हें भी उबाले तो क्या नमक के साथ खाएंगे।" शालू बोली।

"टेंशन मत लो तुम, इस बार चेक मिला है, मैंने तो लिफाफा खोला भी नही, क्योकि अगर लक्ष्मी खोलेगी तो ज्यादा लक्ष्मी आएगी। अब शायद मेरी गाड़ी पटरी पर आ रही है। देखना एक दिन हम भी अपनी गाड़ी में घूमेंगे।" सागर ने कहा।

"फिर सपने….फिर सपने…. प्लीज…. पहले ये दुआ करो कि हम बिना उधार किये तीनो टाइम अच्छा खाएंगे, मेरे पास मायके से राखी पर ढाई हजार जमा हुए थे, उसमें से दो हजार तो करयाने वाले को दे दिए पुरानी उधारी, और बाकी के पांच सौ का सामान लायी। उसके बाद फिर 11 सौ का उधार चढ़ गया, मुझे शर्म आती है ऐसे सामान लाने में।" शालू ने कहा।

"बस एक बार सिक्का जम……" सागर कुछ कहता कि शालू गुस्से से बोली- "शटअप…. आपके सिक्के कभी नही जमते…. मैं तो चली जाउंगी अगर ऐसा ही रहा तो, भगवान का लाख लाख शुक्र है कि चार सालों में औलाद देकर एक और जिंदगी नही नरक की, नही तो तुम्हारे पास दूध के भी पैसे नही होते, और जाना पड़ता भीख मांगने बच्चे को गोद मे लेकर"

"प्लीज ऐसी बात मत करो, लिफाफा तो खोलो, मैं भी उत्सुक हूँ, मंत्री जी बड़े दिलवाले है। उन्होंने चाणक्य धाम की रिनोवेशन के लिए चौदह लाख दान किया, और जब हैदराबाद में वो कांड हुआ था, उसपर भी लड़की के घरवालो को 5 लाख रुपये दिए थे।" सागर मंत्री जी के बड़े बड़े फेंके हुए खुद की तारीफों को बटोर कर लाया था और अपनी पत्नी शालु को सुना रहा था।

"तो तुम कौन सा कांड करके आये हो" बीवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा और लिफाफा को एक साइड से फाड़ना शुरू किया। उसे लगा इतने बड़े मंत्री ने दिया है तो कितना जो दे दिया।

शालू को मुस्कराता देख कवि महोदय भी मुस्करा उठे।

शालू ने लिफाफा खोलकर अंदर झांका और गुस्से में लिफाफा सागर की तरफ फेंक दिया और दोबारा से लेट गयी।

सागर ने झुककर फर्श से लिफाफा उठाया तो उसमे तीन नए करारे नॉट थे, दो पांच सौ के और एक सौ का।

"ग्यारह सौ, उन आठ लोगो ने मुझे मिलकर ग्यारह सौ ही रुपये दिए क्या??" सागर ने सोचा।

"देखो मेरा मूड वैसे ही खराब है, अपना लिफाफा और ट्रॉफी लेकर बाहर चले जाओ कमरे से, सोफे में ही जाकर मरो।" शालू ने कहा।

सागर धीरे धीरे बाहर की तरफ चले गया और सोफे पर लेटते हुए सोचने लगा-

"एक लिफाफा, और फ़ोटो में आने की उनकी होड़।

 पहले पता होता लिफाफे में कितना है

तब ही मैं आता उन सबका एक एक करके सिर फोड़।

 समझ के क्या रखा है उन्होंने,

 उस महेश बाबू को तो मैं गीले तौलिए सा दूँ निचोड़

 बेनर पर चिपका दिए, आकर्षक इनाम, लाखो के

ऐसे फ्रॉड तो होने चाहिए पीछे सलाखों के।

"अरे वाह, क्या मस्त सोचा है, लेकिन हम उसे फ्रॉड नही कह सकते, इनाम क्या देना, कितना देना उनकी मर्जी है, इसमे ना मैं कुछ कर सकता ना वो" सागर ने सोचा और संभलते हुए एक करवट ली और सोफे के कोने में सिर छुपा के सो गया।

अभी आंख भी नही लगी थी कि एक आवाज आई- "मैं जा रही हूँ ये घर छोड़कर, मुझे नही रहना यहाँ।"

आवाज की तरफ मुड़कर देखा तो शालू को सामने खड़े देखकर सागर को लगा इसका रोज का ड्रामा शुरू हो गया। - "हां हां ठीक है, जाओ"

"वो लिफाफा तो दे दो इधर, अब मायके जाएंगे तो कुछ लेके तो जाना पड़ेगा" कहते हुए शालू ने सोफे के एक साइड रखा लिफाफा खींचा तो सागर उठ बैठा।

"पागल हो गयी हो क्या?? मेरी मेहनत की कमाई को तुम मायके में उड़ाओगी?" सागर ने जैसे ही कहा शालू ने जवाब देते हुए कहा- "तुम अपने पास ही रखो।

शालू घर से निकल पड़ी। सागर उसके पीछे पीछे जाते हुए बोला- "अरे सुनो…. कहाँ जा रही हो"

शालू बिना जवाब दिए ही दरवाजे की कुंडी सरकाते हुए गली में निकल गयी। आगे आगे शालू चल रही थी पीछे पीछे सागर। गली में हंगामा या बदनामी के डर से सागर ऐसे चल रहा था जैसे खुद छोड़ने जा रहा हो।

"वापस कब आओगी?" सागर ने सवाल किया।

"पता नही, कोई नौकरी करने लग जायेगा मेरा पति तो शायद…."

बुरा शालू को भी लग रहा था इस कदर छोड़कर जाना लेकिन सागर बेशर्म हो चुका था। रोज सुबह शाम वो सागर को इतना भला बुरा कहती थी, इतने उलाहने देती थी, कोई ढंग की नौकरी करने को कहती लेकिन सागर तो जैसे खुद को बहुत बड़ा कवि मान चुका था, भले जेब मे अठ्ठनी भी नही रहती थी।

 

"ऑटो……" गली के बाहर पहुंचते ही आवाज दी। और ऑटो भी आ खड़ी हुई।

"बस स्टेशन तक जाना था भैया" शालू बोली।

ऑटो वाले ने बैठने का इशारा किया तो शालू बैठ गयी, सागर ने शालू को यही से लिफाफा पकड़ाते हुए कहा- "अपना ख्याल रखना, मैं जल्द ही लेने आऊंगा" सागर ने धीमी सी आवाज में शर्मसार होकर कहा।

"जरूरत नही है, अगर नौकरी लग जाओगे तो मैं खुद ही आ जाउंगी" शालू ने कहा और लिफाफा भी नही पकड़ा।

"चलो भैया"

ऑटो वाले ने आर्डर सुनकर ऑटो भगा ली।

सागर वापस घर की तरफ आ रहा था तो उसके दिमाग मे बहुत सी रीलें घूम रही थी। कभी शालू का उसे खरी खोटी सुनाता हुआ चेहरा, तो कभी नौकरी से निकालते हुए सीनियर, कभी मंच में तालियों की गड़गड़ाहट और कभी माइक को चेक करते हुए माइक पर उंगली की दस्तक, कभी शालू का प्यार उसका हाथ पकड़ना तो फिर मुंह फुलाई शालू का ऑटो में चले जाना। सारे दृश्य किसी मिक्सटेप की तरह घूम रही थी। और कदम बढ़ रहे थे घर की तरफ , गली में चप्पल की रगड़ की आवाज के साथ मूर्छित सा लड़का सागर अब अपने कमरे में पहुंचा वापस बैठ गया सोफे पर हाथ मे लिफाफा थामे।

दो साल बाद

"ओए.……. इधर आ…… " एक नौजवान लड़का अपने दोस्तो की टोली में खड़ा था, जिसने अभी एक आदमी को बहुत ही अपमानित तरीके से आवाज दी।

लंबी दाड़ी, बिखरे हुए बाल और फटे पुराने कपड़े…. गले मे एक मैला कुचेला गमछा, आंखों में एक डर….शायद ये डर हर इंसान से उसे लगता था। इस वक्त भी एक डर के साथ वो आदमी आगे बढ़ा क्योकि उसे अच्छे से याद था पिछली बार इनका कहना ना मानने पर इन्होंने उसे मारा था।

"चल वो सुना, जो परसो सुनाया था।" लड़के ने उस आदमी से कहा।

"ककक्या?" आदमी ने सहमी आवाज में कहा।

"अरे वही यार, क्या था वो, बेवफा बेवफा, जो उस दिन सुनाया था वो" लड़के ने कहा।

आदमी हंसने लगा, उसके दांत भी बहुत गंदे थे और पागलो की तरह हँसते हुए अचानक ही उदास हो गया

"मुझे लम्हे तो सारे नही याद

जब उसने साथ निभाया होगा।

अपने किस्मत से ज्यादा मैंने शायद

माँ के बाद उसे पाया होगा।

अभी मैं जिंदा हूँ तो दूर हूँ उससे

बस एक बार मर जाउँ, फिर देखना

उसके संग हर पल मेरा साया होगा"

"वाह वाह, " एक लड़के ने कहा और अपने दोस्त से कहा- "तू वीडियो बना, मैं इस पागल और और बुलवाता हूँ"

"सुन …. एक और…. और सुना दे कोई" लड़के ने कहा।

"चल मेरी किस्मत की कुछ लकीरें

तू अपने हाथ से मिटा जा तो ही सही है।

एक प्यार की , और एक उम्र की

ये दोनो मुझे अपने लिए लगती ही नही है।"

"क्या बात है, क्या बात है, अच्छा बाबाजी, ये बताओ आपकी ये हालत, मतलब आप पागल कैसे हुए" ठिठोली करते हुए मोबाइल वाला लड़का बोला और सब हंसने लगे।

आदमी ने जमीन से एक पत्थर उठाया और सबको घूरते हुए "मैं पागल नही हूँ, कवि हूँ मैं, शायर हूँ, मैं शायर हूँ, पागल नही" बड़बड़ाते हुए वहां से चले गया।

थोड़ी दूर खड़े एक जोड़ा जो शायद शॉपिंग करके घर लौट रहे थे उन्होंने ये सब नजारा देखा तो लड़की बोली- "देखो, अगर तुम नौकरी पर ध्यान ना देकर बस कविता के पीछे रहते तो शायद तुम्हारा भी यही हाल होता"

शालू की बात सुनकर सागर ने मायूसी से कहा- "क्या हालत हो गयी है साहित्य की, क्योकि इसकी कोई कद्र नही है, ये एक साइड आर्ट है, लेकिन इसे बिजनेस सोचकर अपना सबकुछ त्याग देने वाले डॉकर बेरोजगारी के गर्म कढ़ाई में उछलते रहते है। तुम्हारे छोड़कर जाने के बाद मैंने कुछ दिन तो शायरियां और कविताएं लिखी, लेकिन फिर हफ्ते भर में ऊब गया। क्योकि मैं समझ गया था कि आठ दस दिन की मेहनत को दस बारह लोग हाथ लगाकर एक ट्रॉफी देंगे, और अगर इतना कही काम कर लेता तो पांच छह हजार तो मिल ही जाते। मैंने सारे पुरस्कार और कविताओं की डायरी एक बक्शे में बंद की और निकल पड़ा नौकरी की तलाश में।

"अच्छा किया ना, वैसे भी कविता शायरी लिखते तो रहते हो अब भी , कौन सा छोड़े हो" शालू ने कहा।

"वो तो चलता रहेगा, लेकिन किसी मंच के लिए नौकरी नही छोड़ता, छुट्टी वाले दिन चले जाता हूँ" सागर ने कहा।

"अब चलो भी घर" शालू ने कहा और दोनो घर की तरफ निकल पड़े।


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