Nisha Singh

Inspirational

4.5  

Nisha Singh

Inspirational

मैं इश्क़लिखना भी चाहूँ- 5

मैं इश्क़लिखना भी चाहूँ- 5

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95



“अच्छा तो आता हूँ मैं शाम तक।”

सुखदेव: अरे भगत, बापू…

भगत: अरे वो तो दूसरी तरफ जा रहे हैं। यहाँ नहीं आ रहे। बैठा रह चुपचाप।

सुखदेव: यार कॉलेज के दिनों की याद आ गई। उन दिनों भी बापू को देखते ही सिट्टी पिट्टी गुम हो जाया करती थी।

राजगुरू: तुम दोनों तो एक ही कॉलेज में पढ़े हो ना?

सुखदेव: हाँ लाहौर के नेशनल कॉलेज में। लालाजी ने खुलवाया था, हम जैसों के लिये। मैं और भगत तो थे भी एक ही क्लास में। याद है भगत कॉलेज का पहला दिन?

भगत: ये भी कोई भूलने वाली बात है...पहले ही दिन तेरे साथ बिठा दिया था प्रोफेसर साब ने। आख़िरी वक़्त तक पिण्ड नहीं छूटा। 

सुखदेव: क्या कहा तूने?

भगत: अरे कुछ नहीं। मैं तो ये कह रहा था कि तुझे वो राजाराम शास्त्री जी याद हैं?

सुखदेव: वो द्वारकाप्रसाद पुस्तकालय वाले... बिल्कुल याद हैं। वही तो हमारा अड्डा हुआ करता था। सी.आई.डी. की नज़र भी थी उस पे तो। 

आपको पता है... एक दिन तो मर ही गये थे समझो। हुआ क्या, कि शास्त्री जी ने मुझे एक किताब दी पढ़ने के लिये। नाम था ‘अराजकतावादी और अन्य निबंध’। उसके एक अध्याय ‘हिंसा का मनोविज्ञान’ने मुझपे बड़ा गहरा प्रभाव डाला। दरअसल उसमें फ्रांस के एक क्रांतिकारी बेलां का बयान था। अदालत में जज के सामने उसने बताया कि किस तरह फ्रांस के पूंजीपतियों को सुनाने के लिये उसने फ्रांस की असेम्बली में बम धमाका किया था। बहरों को सुनाने के लिये ऊँची आवाज़ की ज़रूरत जो पड़ती है। मुझे उसकी ये बात बहुत अच्छी लगी। बस फिर क्या था, जब मैं उन्हें किताब लौटाने गया तो मैंने इसी बारे में बात करनी शुरू कर दी और बड़े जोश में आ के कहा कि हमें भी बहरों को सुनाने के लिये ऐसा ही कुछ करना चाहिये। मैं तो और भी ना जाने क्या क्या कह जाता अगर उन्होने मुझे चुप नहीं कराया होता। बच गये उस दिन तो।

सुखदेव: अरे, तुझे पता है... एक बार ये घर से भाग गया था।

भगत: बता भी किसे रहा है जो खुद घर से भागा था।

राजगुरू: मैं घर से नहीं भागा। मैंने घर छोड़ा था। भागने में और छोड़ने में फ़र्क होता है। वैसे भगत तू क्यों भागा था?

सुखदेव: अरे मैं बताता हूँ। अपने बापू के डर से। दिन में सो भी नहीं निकला रात में फ़रार हुआ था।

भगत: तो क्या करता? देश की आज़ादी से ज्यादा कुछ ज़रूरी नहीं था मेरे लिये।

सुखदेव: ये सब तो ठीक है यार। पर तेरी बेबे का बड़ा बुरा हाल था तेरे बिना। तुझे ढूंढ़ते ढूंढ़ते लाहौर आये थे दोनों। पर तू होता तब मिलता ना। बेचारी बेबे किसी ज्योतिषी के पास भी गई थी तेरे चक्कर में। पर वो ज्योतिषी तो और कमाल निकला। डरा दिया था बेबे को ये कह कर कि तेरा बेटा या तो तख़्त पे बैठेगा या तख़्त पे झूलेगा।

सच कह रहा है ये। मेरे घर की हालत क्या बताऊँ आपको। मैं तो लाहौर से भाग के कानपुर आ गया और अपना नाम बलवंत सिंह बता के एक अख़बार में काम करने लगा और वहाँ दादी की तबियत खराब हो गई। बापू ने ‘वंदेमातरम’ नाम के अख़बार में मेरे लिये विज्ञापन भी दिया कि मैं लौट आऊँ पर वो मुझ तक पहुँच नहीं पाया। जिस अख़बार के लिये मैं काम करता था उसके एडीटर साहब ने वो विज्ञापन देखा लेकिन तब वो ये नहीं जानते था कि बलवंत सिंह ही भगत सिंह है। इस तरह मुझे कुछ पता नहीं चल पाया।

एक दिन बड़ी बेचैनी सी हो रही थी। घर की बड़ी याद आ रही थी। सो अमरो को चिठ्ठी लिखने बैठ गया। काफ़ी कुछ लिखा फिर लिख के फाड़ दिया। जानता था कि घर चिठ्ठी लिखने का मतलब है झंझट में फंसना। पर मन नहीं माना तो अपने एक दोस्त रामचंद्र को चिठ्ठी लिख दी और घर के हालात पता करने को कहा वो भी बिना मेरा ज़िक्र किये और बिना मेरा पता बताये। पर वो भी कम चालू नहीं था घर में सब को दुखी देख के कानपुर आ गया। पता बता नहीं सकता था, आ तो सकता था। तो आ गया। जैसे तैसे उस वक़्त मैं बचा। पर वो कहाँ मानने वाला था। घर जा के बापू को सब बता दिया। फिर क्या... बापू ने जयदेव के हाथ चिठ्ठी पहुँचाई। लिखा था कि अब वही होगा जो तुम चाहोगे बस घर आ जाओ। 6 महीने बाद घर पहुँचा था मैं।

तो ये थी जी मेरे घर से भागने की कहानी मेरा मतलब छोड़ के जाने की...    


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