मैं भी घर की हूँ
मैं भी घर की हूँ
सुबह से घर में हलचल मची हुई है, खुशी का माहौल है। बड़ी ननद जो घर आने वाली हैं। माँ जी तो खुशी से फूले नहीं समा रहीं। सारी व्यवस्था खुद ही दौड़-दौड़ कर देख रही हैं। ऐसे मैं कुछ करने के लिए कह दूँ तो घुटने का दर्द लेकर बैठ जाएँगी। "अरे बहू! गुलाब के नहीं, रजनीगन्धा के फूलों का गुलदस्ता बनाओ, काव्या को वही पसंद हैं। रोज तो अपने मन का लगाती ही हो और हाँ, खाने में दही-बड़े जरूर बनाना।"
"जी, माँ जी।" सुबह से केवल मैं यही तीन शब्द बोले जा रही थी। आखिरकार वह ऐतिहासिक पल आ ही गया। जब मेरे ननद नन्दोई और उनके बच्चों का गृहप्रवेश हुआ। "कितनी दुबली हो गई हो, रजनी, खाना नहीं खाती क्या? और भाई, तुम्हें क्या हुआ? तुमने भी खाना छोड़ दिया है क्या? क्यों, रजनी, सबको डायटिंग पर डाल रखा है?" और इस तरह उनके तानों का सिलसिला शुरू हो गया जो एक हफ्ते तक चलने वाला था। मैंने भी खुद को तैयार कर रखा था कि इस बार कुछ भी हो जाए मैं किसी की बातों से अपना दिल नहीं दुखाऊँगी। परिवार में तो हल्का-फुल्का तनाव हो ही जाता है, पर उसे समझदारी से सुलझाने की जरूरत रहती है।
तभी सासु माँ के आदेश से मेरी तंद्रा टूटी। "रजनी! चाय, नाश्ते का इन्तज़ाम भी करेगी या ऐसे ही बुत बनी खड़ी रहेगी।" चलो, तबतक तुम लोग भी नहा-धो लो। लम्बा सफर तय कर के आ रहे हो।" सभी उन लोगों के आवभगत में लग गए और मैं रसोई घर में। कहने को पूरा घर मेरा है, पर पता नहीं क्यों रसोई घर ही अपना लगता है। शायद, क्योंकि यही मेरे दुख-सुख का साथी है।" रजनी, सबके लिए चाय लेकर यही आ जाओ।" निखिल ने कहा और बच्चों को लेकर माँ जी के कमरे में चले गए। मैंने भी जल्दी-जल्दी चाय छानी, बिस्किट लिए, ट्रेे में रखा और जाने लगी। कमरे से गप्पें मारने की और हँसी ठहाकों की आवाज़ेंं आ रही थी, इसलिए मुझसे भी इन्तज़ार नहीं हो रहा था।
दो पल के लिए सबके साथ बैठ लूँगी और बातें भी हो जाएंगी।
फिर तो खाना बनाने में लगना है। यही सोचकर मैं कमरे में सबके लिए चाय लेकर गई। "चाय, यहीं रख दे रजनी और खाने की तैयारी कर।अपनी चाय तो लेती जा और हाँ, दरवाजा चिपका देना।" मैं चुपचाप अपनी चाय ले अपने साथी रसोई घर में आ गई और रोते हुए चाय पीने लगी। जो कि मेरे आँसुओं की वजह से नमकीन हो गई थी। किस से क्या कहती, जब निखिल ने कुछ नहीं कहा तो और किसी से क्या उम्मीद करूँ !
क्या मैं केवल खाना बनाने के लिए हूँ ? मुझे हक नहीं है सबके साथ बैठकर चाय पीने का। फिर काव्या दी ही कहेंगी, एक हफ्ते रही पर रजनी के पास तो टाईम ही नहीं है हमसे बात करने का। दिनभर रसोई घर में रहूँगी तो कहाँ से टाईम मिलेगा ? या फिर मैं कोई जासूस हूँ जो इनकी बातें सुन लूँगी तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। शादी के तीन साल पूरे होने को हैं पर शायद अभी भी मैं सबके लिए पराई हूँ। इसलिए मुझे परिवार के साथ चाय पीने का हक़ नहीं है।
मैंने खुद को तैयार कर रखा था, पर आखिर दिल दुख ही गया। मैंने ही समझने में भूल कर दी शायद, क्योंकि समझदारी दोनों तरफ से हो तभी रिश्ता निभाया जा सकता है। वरना ऐसे तो रिश्ते ढोए जाते हैं।
